बिहार के जहानाबाद जिले के बभना गांव से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो यह साबित करती है कि जब जिंदगी में अचानक सब कुछ बिखर जाए, तब भी सही फैसला लेकर नई शुरुआत की जा सकती है। देवकांत पांडे के साथ एक के बाद एक दो बड़े झटके आए, पहले दर्दनाक हादसा और फिर नौकरी से हाथ धोना। लेकिन इसी मुश्किल दौर में उन्हें एक विचार मिला जिसने उनका पूरा भविष्य बदल दिया। आज वो अपने ही गांव में चप्पल बनाने की इकाई चलाते हैं, जिसका सालाना टर्नओवर 5 लाख रुपए तक पहुंच चुका है।
मुंबई में थी अच्छी तनख्वाह, हादसे ने पलटा सारा हिसाब
देवकांत पांडे पहले मुंबई की एक निजी कंपनी में काम करते थे और अच्छी सैलरी पाते थे। अपने साले की शादी में शामिल होने के लिए वो मुंबई से घर लौटे। इसी दौरान बाइक दुर्घटना में उनका पांव बुरी तरह जख्मी हो गया। ठीक होने में लगभग 6 महीने का वक्त लगा। जब वापस कंपनी पहुंचे तो बॉस ने उन्हें फिर से काम पर रखने से साफ मना कर दिया। एक ही झटके में मुंबई में बनाई हुई जिंदगी का पूरा ढांचा ढह गया।
रिश्तेदार के घर ने दिखाई नई राह
नौकरी जाने के बाद कुछ समय तक देवकांत को आगे का कोई रास्ता नहीं सूझा। इसी उलझन भरे दौर में एक रिश्तेदार के यहां जाना हुआ। वहां उन्होंने चप्पल बनाने का काम होते देखा। यह नजारा उनके लिए किसी रोशनी की किरण जैसा था। मन में विचार आया कि क्या यही काम वो भी शुरू कर सकते हैं। घर लौटते ही उन्होंने इस कारोबार की संभावनाएं और तरीके तलाशने शुरू कर दिए।
पीएमईजीपी योजना से मिला 10 लाख का लोन, साथ में 2.5 लाख की सब्सिडी
सबसे बड़ी चुनौती शुरुआती पूंजी की थी। इसी दौरान उन्हें सरकारी लोन योजनाओं की जानकारी मिली। जहानाबाद के उद्योग विभाग के दफ्तर जाकर संपर्क किया। काफी संघर्ष और कोशिशों के बाद पीएमईजीपी योजना के तहत 10 लाख रुपए का कर्ज मिला। इसी राशि में से 2.5 लाख रुपए की सब्सिडी भी मिली। इस पूंजी के बल पर 2022 में अपने ही घर के एक छोटे से कमरे में चप्पल बनाने की इकाई शुरू की।
जहानाबाद और पटना में 50 जगह सप्लाई, 5 लोगों को मिला रोजगार
धीरे-धीरे कारोबार ने रफ्तार पकड़ी। आज जहानाबाद जिले और पटना जिले में मिलाकर करीब 50 जगहों पर उनकी चप्पलें पहुंच रही हैं। थोक भाव में 70 रुपए से 90 रुपए प्रति जोड़ा के हिसाब से माल बाजार में जाता है। इसी से परिवार का खर्च चलता है और सालाना टर्नओवर 5 लाख रुपए तक पहुंच गया है। उनकी इस इकाई में करीब 5 लोग काम करते हैं, जिनके परिवारों का भी इसी कारोबार से गुजारा हो रहा है।
पत्तल और कटोरी की मशीन से भी होती है अतिरिक्त कमाई
देवकांत ने यहीं नहीं रुके। उन्होंने खाने वाले पत्तल, कटोरी और गिलास बनाने वाली एक और मशीन भी लगाई है। शादी-विवाह के आयोजनों में इन चीजों की सप्लाई होती है, जिससे अलग से आमदनी होती है। इस कारोबार को भी आगे बढ़ाने का काम जारी है। देवकांत पांडे की यह यात्रा बताती है कि जब दुर्भाग्य दरवाजा खटखटाए, तो हौसला और सही जानकारी मिलकर उसे भाग्य में बदल देते हैं।













