मध्य प्रदेश के बालाघाट शहर में जय स्तंभ चौक के किनारे एक छोटा-सा ठेला हर रोज लगता है। इस पर साबूदाना के बड़े और खिचड़ी बिकती है, और इसे चलाने वाली हैं सिर्फ 26 साल की द्वारका बंबूरे। उनके चेहरे पर मेहनत की थकान है, पर हिम्मत अब भी कायम है। उनकी जिंदगी एक के बाद एक झटकों से भरी रही, और इन दिनों एक नई परेशानी ने उन्हें घेर लिया है — घर के लिए लिए गए कर्ज की किस्त, जो वे चुका नहीं पा रहीं।
द्वारका खुद अपनी हालत बयान करती हैं, “मैं जब मां के गर्भ में थी तब पिता ने दूसरी शादी कर ली. बचपन कठिनाई में गुजरा फिर कम उम्र में ही शादी हो गई. पति भी शराबी निकला और उनकी मौत हो गई. अब बेटी की पढ़ाई के लिए दुकान चला रही हूं और लोन कंपनी परेशान कर रही है.”
जन्म से पहले ही पिता का साया उठ गया
द्वारका के संघर्ष की शुरुआत उनके पैदा होने से भी पहले हो गई थी। उनके मुताबिक जब वे मां के पेट में महज ढाई महीने की थीं, तभी उनके पिता उनकी मां को छोड़कर दूसरी पत्नी के पास चले गए। मां अपने मायके लौट आईं और वहीं रहने लगीं। यहीं से एक अकेली मां की जद्दोजहद शुरू हुई।
मां ने मजदूरी की, मेहनत की और हर मुश्किल को पार करते हुए बेटी द्वारका को पाला। उन्होंने उसे इतना पढ़ा-लिखा दिया कि वह दफ्तर के छोटे-मोटे काम संभाल सके। फिलहाल द्वारका बालाघाट की एक कॉलोनी में किराए के कमरे में अपनी छोटी बेटी के साथ रहती हैं।
शादी में मिली राहत, फिर शराब ने सब छीन लिया
घर की बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच द्वारका की शादी कम उम्र में ही कर दी गई। यह कोरोना काल का समय था। उन्हें लगा कि अब शायद संघर्ष भरी जिंदगी में थोड़ा सुकून मिलेगा। शुरुआत में हुआ भी ऐसा ही — पति काम-धंधा करते और द्वारका भी एक ऑफिस में नौकरी करतीं। दोनों मिलकर घर चला रहे थे और कुछ साल बाद उनके घर एक प्यारी बेटी ने जन्म लिया।
लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी। द्वारका के पति को शराब की लत लग गई। रोज शराब पीना और घर में झगड़े आम बात हो गए। शराब ने उनके शरीर को भीतर से खोखला कर दिया, इम्यूनिटी इतनी कमजोर पड़ गई कि एक बार बीमार पड़ने पर वे संभल ही नहीं पाते। आखिरकार एक बीमारी ही उनकी जान ले गई। पति की मौत के बाद द्वारका के पास सिर्फ अपनी ढाई साल की बच्ची रह गई।
बेटी के लिए छोड़ी नौकरी, शुरू किया अपना ठेला
द्वारका के सामने अब अपनी ढाई साल की बेटी की परवरिश का सवाल था। दुख में डूबे रहने से कुछ नहीं मिलने वाला था, और वही बच्ची अब उनके जीने की वजह बन गई। बेटी को संभालने और उसे मां के साथ-साथ पिता का प्यार भी देने के लिए द्वारका ने अपनी नौकरी छोड़ दी। फिर एक छोटा-मोटा लोन लेकर उन्होंने साबूदाना की खिचड़ी और बड़े का ठेला शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे वक्त ने जख्मों पर मरहम लगाया। बेटी बड़ी होने लगी और उसी के लिए द्वारका दिन-रात मेहनत करती रहीं।
अपने घर का सपना और कर्ज का बोझ
द्वारका अपनी जिंदगी को कदम-दर-कदम बेहतर बनाना चाहती थीं। उनका सपना था कि किराए के कमरे से निकलकर अपने एक घर में रहें। इसी उम्मीद में उन्होंने नगर पालिका की चल रही आवास योजना का रुख किया, जिसमें 1 लाख 80 हजार रुपये का डिपॉजिट जमा करने पर मकान मिलना था।
उन्होंने सोचा कि कारोबार अच्छा चल रहा है, किस्त आराम से चुकती रहेगी, और इसी भरोसे लगभग उतनी ही रकम का कर्ज ले लिया। लेकिन जिस ठेले के दम पर यह फैसला किया था, बढ़ती गर्मी की वजह से उसकी बिक्री गिर गई। हालत यह हो गई कि अब घर का खर्च भी बड़ी मुश्किल से चल पाता है। ऊपर से लोन कंपनी किस्त के लिए लगातार परेशान कर रही है, जिससे वे मानसिक तनाव में आ गई हैं।
फिर भी द्वारका हार मानने को तैयार नहीं। उन्हें खुद पर भरोसा है — जिसने अब तक इतनी मुश्किलों का सामना किया, वह इस परेशानी से भी जरूर पार पा लेगी।













