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बालोद में कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर धनंजय ढीमर ने संभाला पुश्तैनी ठेला, अब बाजार वाले दिन कमाते हैं 8 हजार रुपयेसक्सेस स्टोरी
20 अग॰ 2026, 10:01 am (71 दिन पहले)· 2

बालोद में कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर धनंजय ढीमर ने संभाला पुश्तैनी ठेला, अब बाजार वाले दिन कमाते हैं 8 हजार रुपये

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में धनंजय ढीमर ने आर्थिक तंगी के कारण कॉलेज छोड़कर पिता का स्नैक्स का ठेला संभाला। आज वे बुधवारी बाजार में हर कार्य दिवस पर 7 से 8 हजार रुपये की आमदनी कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के बालोद शहर में लगने वाला बुधवारी बाजार हर सप्ताह बुधवार और रविवार को खरीदारों की भारी भीड़ से जगमगा उठता है। इसी बाजार में मरार पारा निवासी धनंजय ढीमर का पारंपरिक व्यंजनों का ठेला लोगों के बीच खास लोकप्रिय है। धनंजय अपने परिवार के 30 साल से भी अधिक पुराने पुश्तैनी कारोबार को तीसरी पीढ़ी के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। घर पर तैयार किए गए देसी नमकीन और पारंपरिक स्नैक्स बेचकर वे बुधवारी बाजार के हर कार्य दिवस पर करीब 7 से 8 हजार रुपये तक की बेहतरीन कमाई कर रहे हैं।

आर्थिक तंगी के कारण कॉलेज छोड़कर संभाला परिवार का कारोबार

आज सफलता का उदाहरण बने धनंजय का यह सफर काफी संघर्षों से भरा रहा है। एक समय वे कॉलेज में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे, लेकिन उसी दौरान उनके परिवार के सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया। उनके पिता अकेले इस छोटे से व्यापार को संभालने में कठिनाई महसूस कर रहे थे। घर की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए धनंजय ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने का कठिन निर्णय लिया। उन्होंने अपने पिता के साथ ठेले पर काम शुरू किया और धीरे-धीरे पूरे कारोबार की बारीकियां सीखीं। पिता के निधन के बाद अब धनंजय अकेले ही इस पूरे काम की बागडोर संभाल रहे हैं और परिवार का मुख्य सहारा बने हुए हैं।

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30 साल से चला आ रहा पारंपरिक स्वाद और विविधता

धनंजय के ठेले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ मिलने वाला हर सामान घर पर ही पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है। पिछले तीन दशकों से उनका परिवार इसी प्रामाणिक स्वाद को लोगों तक पहुंचा रहा है। उनके ठेले पर ग्राहकों के लिए मुरकु, पापड़, सादा मुर्रा, फ्राई मुर्रा, नड्डा, मिक्चर, पापड़ी और चिप्स जैसे कई व्यंजन उपलब्ध रहते हैं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में खैरी चना के नाम से मशहूर फूटा चना, हरा मटर चना, पीला चना और भुनी हुई मूंगफली भी ग्राहकों की पहली पसंद बनी हुई है।

बारिश के मौसम में मांग और ग्राहकों का अटूट विश्वास

मानसून के दिनों में इस ठेले पर ग्राहकों की भीड़ काफी बढ़ जाती है। बारिश के मौसम में विशेष रूप से फूटा चना और मिक्चर की बिक्री सबसे ज्यादा होती है। बाजार में खरीदारी करने आने वाले स्थानीय लोग इन पारंपरिक पकवानों को नाश्ते के रूप में स्वाद लेकर खरीदते हैं। धनंजय का कहना है कि किसी भी पुश्तैनी काम को लंबे समय तक चलाने के लिए केवल पुरानी पहचान काफी नहीं होती, बल्कि दिन-रात की मेहनत और ग्राहकों का विश्वास बनाए रखना बेहद जरूरी है। तीन पीढ़ियों से चला आ रहा यह छोटा सा प्रयास आज न केवल उनके परिवार का संबल बना हुआ है, बल्कि स्थानीय स्वाद को भी सहेजे हुए है।

सवाल-जवाब

धनंजय ढीमर कहां के रहने वाले हैं और वे क्या कारोबार करते हैं?
धनंजय ढीमर छत्तीसगढ़ के बालोद स्थित मरार पारा के निवासी हैं और वे बुधवारी बाजार में पारंपरिक स्नैक्स का ठेला चलाते हैं।
धनंजय को कॉलेज की पढ़ाई बीच में क्यों छोड़नी पड़ी?
परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने और पिता के अकेले काम न संभाल पाने के कारण धनंजय ने पढ़ाई छोड़कर पुश्तैनी काम संभाला।
बुधवारी बाजार कब लगता है और धनंजय की रोजाना की आमदनी कितनी है?
बुधवारी बाजार हर सप्ताह बुधवार और रविवार को लगता है, जहां धनंजय को बाजार वाले दिन करीब 7 से 8 हजार रुपये की आमदनी होती है।
धनंजय के ठेले पर कौन-कौन से पारंपरिक खाद्य पदार्थ मिलते हैं?
यहाँ घर पर तैयार मुरकु, पापड़, सादा व फ्राई मुर्रा, नड्डा, मिक्चर, पापड़ी, चिप्स, खैरी चना (फूटा चना), हरा व पीला चना और भुनी मूंगफली मिलती है।
किस मौसम में धनंजय के ठेले पर सबसे ज्यादा बिक्री होती है?
बारिश के मौसम में उनके ठेले पर फूटा चना (खैरी चना) और मिक्चर की बिक्री सबसे ज्यादा होती है।
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