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गोंडा के 8वीं के छात्र दिवांशु ने संभाली किसानी, पढ़ाई के साथ मक्के की खेती से कमा रहे मुनाफासक्सेस स्टोरी
18 सित॰ 2026, 11:19 am (1 दिन पहले)· 1

गोंडा के 8वीं के छात्र दिवांशु ने संभाली किसानी, पढ़ाई के साथ मक्के की खेती से कमा रहे मुनाफा

गोंडा जिले के तरबगंज ब्लॉक के रहने वाले आठवीं के छात्र दिवांशु मौर्य पढ़ाई के साथ मक्के की खेती कर रहे हैं। कम लागत में तैयार होने वाली उनकी इस फसल की बाजार में काफी मांग है और वे अच्छी कमाई कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक किशोर छात्र ने अपनी पढ़ाई के साथ खेती की दुनिया में अनूठी मिसाल पेश की है। जिले के तरबगंज ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले इलाके में रहने वाले आठवीं कक्षा के छात्र दिवांशु मौर्य ने अपनी स्कूली शिक्षा के साथ-साथ मक्के की खेती करने का जिम्मा उठाया है। उनकी फसल की शानदार बढ़वार को देखकर उन्हें इस बार बंपर पैदावार और मजबूत मुनाफे की पूरी उम्मीद है।

दिवांशु मौर्य ने बातचीत के दौरान बताया कि वह आठवीं कक्षा के छात्र हैं और किताबी पढ़ाई के अलावा कृषि कार्यों में उनकी गहरी रुचि है। उनके परिवार में खेती-किसानी का पुराना माहौल रहा है, जिसमें उनके दादा और पिता भी मक्के की खेती करते आए हैं। परिवार की इसी पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने खुद भी खेतों में उतरने का फैसला किया और मक्के की फसल की बुआई की।

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हालांकि, इस युवा सफर में उन्हें कई तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ रहा है। दिवांशु ने साझा किया कि स्कूल में पढ़ने वाले कुछ सहपाठी खेती करने पर उनका मजाक उड़ाते हैं और उन्हें सिर्फ पढ़ाई पर फोकस करने की सलाह देते हैं। इसके विपरीत, कई लोग उनकी इस मेहनत और लगन की जमकर सराहना करते हैं। ऐसे शुभचिंतकों का मानना है कि पढ़ाई के साथ व्यावहारिक किसानी करना एक सकारात्मक कदम है, जिससे उन्हें कम उम्र में ही कृषि का बहुमूल्य अनुभव मिल रहा है।

फिलहाल दिवांशु मौर्य करीब 2 से 3 बीघे के क्षेत्रफल में मक्के की खेती कर रहे हैं और आने वाले समय में अपने इस कृषि क्षेत्र का दायरा और ज्यादा फैलाने का इरादा रखते हैं। उन्होंने लागत का हिसाब देते हुए बताया कि 3 बीघे में मक्के की फसल उगाने के लिए उन्हें लगभग 5 से 7 हजार रुपये का खर्च उठाना पड़ा है।

पैदावार और मुनाफे का गणित

मक्के की उपज और बाजार भाव को लेकर दिवांशु ने स्पष्ट किया कि उनके खेतों में एक बीघे के अंदर लगभग 3 से 4 क्विंटल मक्के का उत्पादन हो जाता है। यदि मक्के को हरे रूप में बाजार में बेचा जाए तो उन्हें 10 से 15 रुपये प्रति किलो तक का दाम मिल जाता है। वहीं दूसरी तरफ, यदि मक्के को अच्छी तरह सुखाकर उसके दाने निकालकर बेचे जाएं तो लगभग 2200 से 2300 रुपये प्रति क्विंटल तक का भाव प्राप्त होता है।

अपनी फसल की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने के लिए वह खेती में रासायनिक खादों का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं और इसके बजाय जैविक खाद का उपयोग ज्यादा करते हैं। उनका कहना है कि जैविक तरीकों से खेती करने के कारण उनके मक्के की गुणवत्ता बेहतरीन रहती है, जिसकी वजह से बाजार में इसकी काफी मांग बनी रहती है। आलम यह है कि कई बार तो फसल को बाजार ले जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती और मक्का खेत से ही हाथों-हाथ बिक जाता है।

क्षेत्र में कृषि का परिदृश्य और भविष्य की योजनाएं

गोंडा जिले में बड़ी संख्या में किसान प्रत्यक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। इस इलाके में पारंपरिक तौर पर धान और गेहूं के अलावा अन्य कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं, जिनमें मक्के की खेती का भी अहम स्थान है। दिवांशु मौर्य जैसे युवा छात्र जब शिक्षा के साथ-साथ कृषि कार्यों में रुचि दिखाते हैं, तो यह ग्रामीण इलाकों में एक नया सकारात्मक संदेश देता है। उनका मुख्य लक्ष्य भविष्य में मक्के की खेती के रकबे को काफी हद तक बढ़ाना और इससे अपने लिए एक मजबूत आर्थिक आमदनी का जरिया तैयार करना है।

सवाल-जवाब

दिवांशु मौर्य कौन हैं और वह कहां के रहने वाले हैं?
दिवांशु मौर्य गोंडा जिले के तरबगंज ब्लॉक के रहने वाले आठवीं कक्षा के एक छात्र हैं।
दिवांशु वर्तमान में कितने क्षेत्र में मक्के की खेती कर रहे हैं?
वह इस समय करीब 2 से 3 बीघे की जमीन पर मक्के की खेती कर रहे हैं।
3 बीघे मक्के की खेती में कुल कितना खर्च आया है?
3 बीघे में मक्का उगाने के लिए उन्हें लगभग 5 से 7 हजार रुपये का खर्च आया है।
मक्के की पैदावार कितनी होती है और उसका क्या भाव मिलता है?
एक बीघे में लगभग 3 से 4 क्विंटल मक्का पैदा होता है। हरा मक्का 10 से 15 रुपये प्रति किलो और सूखा दाना 2200 से 2300 रुपये प्रति क्विंटल बिकता है।
दिवांशु मक्के की फसल में किस प्रकार की खाद का इस्तेमाल करते हैं?
वह रासायनिक खादों का कम उपयोग करते हैं और जैविक खाद का अधिक प्रयोग करते हैं।
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