बिहार के गया जिले के मानपुर प्रखंड क्षेत्र में रहने वाले शशि कुमार की सफलता की कहानी कृषि क्षेत्र में नए रास्ते तलाश रहे युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी है। कभी साइकिल से शहद का कारोबार संभालने वाले और तंबू में रातें गुजारने वाले शशि आज राज्य के प्रमुख मधुमक्खी पालकों में गिने जाते हैं। उनके इस व्यवसाय का सालाना टर्नओवर अब 10 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच चुका है। उनके पास आज तीन चार पहिया गाड़ियां और एक बड़ा घर है, जबकि उनके बच्चे भी अच्छी नौकरियों में कार्यरत हैं।
शुरुआती सफर और खेती से गहरा लगाव
शशि कुमार मूल रूप से जहानाबाद जिले के विर्रा गांव के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उन्हें बचपन से ही खेतों में काम करने का शौक था और उन्होंने पारंपरिक खेती को बहुत करीब से समझा था। जब वे 15 वर्ष के थे, तब पढ़ाई करने के इरादे से गया पहुंचे और वहीं से केमिस्ट्री विषय में डिग्री हासिल की। उच्च शिक्षा के बावजूद उनका मन नौकरी करने के बजाय कृषि और उससे जुड़े कार्यों में ही लगा रहा। वे कोई ऐसा उद्यम शुरू करना चाहते थे जिसमें कम पूंजी की जरूरत पड़े और लाभ की बेहतर संभावनाएं हों। इसी सोच ने उन्हें मधुमक्खी पालन की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
हालांकि शुरुआती दौर में उन्हें इस काम में अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल सकी। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और वर्ष 1996 में पूरे समर्पण के साथ दोबारा मधुमक्खी पालन की शुरुआत की। उन्होंने 30 साल पहले महज 10 हजार रुपये की प्रारंभिक लागत लगाकर 10 बॉक्स के जरिए इस व्यवसाय की नींव रखी थी। उस समय उन्हें खुले आसमान के नीचे तंबू तानकर रातें काटनी पड़ती थीं और आने-जाने का एकमात्र साधन साइकिल ही हुआ करता था।
प्रशिक्षण का विस्तार और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान
अपने अनुभव को मजबूत करने के बाद शशि कुमार ने वर्ष 1998 में खादी बोर्ड से जुड़कर अन्य किसानों को भी प्रशिक्षित करने का बीड़ा उठाया। वे देश के कई राज्यों में किसानों को ले जाकर आधुनिक मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिलाने लगे। इसी साल यानी 1998 में उन्हें धारवाड़ विश्वविद्यालय की ओर से प्रोग्रेसिव बी कीपर्स का अवार्ड मिला, जबकि गया स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ उद्यमी पुरस्कार से नवाजा।
मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा ने उन्हें वर्ष 1999, 2003, 2007 और 2009 में प्रगतिशील किसान के सम्मान से सम्मानित किया। इसके अलावा वर्ष 2004 में एपिडा और नेशनल बी बोर्ड दिल्ली द्वारा उन्हें प्रगतिशील पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2008 में उन्हें एनजी रंगा फार्मर अवॉर्ड फॉर डायवर्सिफाइड एग्रीकल्चर भी प्राप्त हुआ। कृषि क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता के कारण वे वर्ष 2013 से 2015 तक बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर, भागलपुर के सदस्य भी रहे।
शिवा एग्रो की स्थापना और 200 से अधिक किसानों का नेटवर्क
कारोबार को आधुनिक रूप देने के क्रम में शशि कुमार ने वर्ष 1997 में एक लाख रुपये का बैंक कर्ज लिया, जिससे उन्होंने एक पैकेजिंग इकाई स्थापित की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2004 में शिवा एग्रो नेचुरल प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से अपनी कंपनी पंजीकृत की। इस परियोजना की कुल लागत 45 लाख रुपये थी।
इस पूंजी से उन्होंने शहद के प्रसंस्करण, गुणवत्ता परीक्षण और पैकेजिंग के लिए एक आधुनिक संयंत्र तैयार किया और शिवा एग्रो ब्रांड के तहत अपने उत्पादों का विपणन शुरू किया। आज उनके साथ बिहार के 200 से अधिक मधुमक्खी पालक किसान सीधे तौर पर जुड़कर काम कर रहे हैं। वर्तमान में उनकी इकाई में सालाना 35 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन हो रहा है, जिससे उनका कुल वार्षिक कारोबार 10 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है।


















