बेंगलुरु के वित्तीय क्षेत्र में 9 से 5 की बंधा-बंधाया नौकरी करते हुए जब रांची की श्वेता झा को दिनचर्या में घुटन महसूस होने लगी, तो उन्होंने एक साहसिक फैसला लिया। कला और शिल्प के प्रति अपने पुराने लगाव को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने सुरक्षित बैंकिंग करियर छोड़ दिया। दक्षिण भारत में बिताए समय के दौरान उन्होंने आंध्र प्रदेश की समृद्ध कलमकारी कला की बारीकियाँ सीखीं और इसी पारंपरिक विधा को अपनी नई व्यावसायिक पहचान बनाने का निश्चय किया। आज उनका यह रचनात्मक उद्यम वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है और उनके बनाए उत्पादों की मांग विदेशों तक पहुंच चुकी है।
सिल्क परिधानों पर पारंपरिक कलमकारी का अनूठा संग्रह
श्वेता झा के संग्रह में शुद्ध सिल्क के कपड़ों पर उकेरी गई खूबसूरत कलमकारी कलाकृतियां शामिल हैं। उनके पास पुरुषों की शर्ट और जैकेट से लेकर महिलाओं के विभिन्न प्रकार के सलवार सूट और उत्कृष्ट साड़ियां उपलब्ध हैं। उनके संग्रह की एक साड़ी की औसत कीमत लगभग 25,000 रुपये है। इस कीमत की मुख्य वजह इसका दुर्लभ और विशिष्ट होना है, क्योंकि प्रत्येक डिजाइन का केवल एक ही पीस तैयार किया जाता है। दूसरा पीस कभी नहीं बनाया जाता, जिससे हर परिधान अपने आप में पूरी तरह अनूठा और एक्सक्लूसिव बना रहता है। एक साड़ी को पूरी तरह तैयार करने में कम से कम 2 महीने का लंबा वक्त लगता है।
23 जटिल चरणों और दूध के शोधन से तैयार होती है हर साड़ी
कीमत के पीछे छिपी अथक मेहनत के बारे में बताते हुए श्वेता स्पष्ट करती हैं कि यह पूरी प्रक्रिया बेहद श्रमसाध्य है। सबसे पहले शुद्ध सिल्क के कपड़े को दूध में डुबोकर संसाधित किया जाता है। इसके उपरांत कुशल कारीगर कपड़े पर पूरी तरह हाथों से डिजाइन की रूपरेखा तैयार करते हैं। केवल हाथ से चित्र उकेरने की इस आरंभिक ड्राइंग में ही 15 से 20 दिन का समय लग जाता है। इसके बाद रंगों को भरने, सुखाने और धोने का दौर शुरू होता है। इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराया जाता है। एक संपूर्ण परिधान तैयार करने में कुल 23 विभिन्न चरण और प्रक्रियाएं शामिल होती हैं, जो कपड़े को टिकाऊपन और रंगत प्रदान करती हैं।
आध्यात्मिक प्रसंग और हजारों साल पुरानी कला परंपरा
कलमकारी हजारों साल पुरानी एक ऐतिहासिक और पारंपरिक कला है। श्वेता के परिधानों में यह मौलिक रूप स्पष्ट रूप से झलकता है। उनके डिजाइनों में भगवान शिव, भगवान कृष्ण और भव्य मंदिरों की नक्काशीदार आकृतियां प्रमुखता से दिखाई देती हैं। उन्होंने रामायण के प्रसंगों को भी पूरी तरह हाथ से चित्रों और दृश्यों के माध्यम से सिल्क पर उतारा है, जिसे पूरा करने में 3 महीने का समय लगा था। प्राचीन काल में जिस प्रामाणिक ढंग से आध्यात्मिक गाथाओं को चित्रों में ढाला जाता था, वही मूल स्वरूप इन वस्त्रों में संजोया गया है।
120 महिलाओं को रोजगार और वैश्विक बाजार में पहचान
श्वेता के इस व्यावसायिक प्रयास ने सामाजिक बदलाव की एक मजबूत नींव भी रखी है। आज उनके साथ 120 महिलाओं का समूह जुड़ा हुआ है, जो इस काम से सम्मानजनक आजीविका कमा रही हैं। इसमें 40 से 50 महिलाओं का एक समर्पित एंब्रॉयडरी समूह भी शामिल है। श्वेता बताती हैं कि जिन महिलाओं के घरों की छतें कभी टपकती थीं, वे आज आत्मनिर्भर होकर एक बेहतर जीवन जी रही हैं। उनके इन उत्पादों की लोकप्रियता अब यूरोप से लेकर जापान तक पहुंच चुकी है। जापान के खरीदारों ने इस कला को विशेष रूप से सराहा है। वित्तीय सफलता के साथ-साथ दुनिया भर के विभिन्न संस्कृतियों वाले लोगों से मिलना और ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाना श्वेता के लिए सबसे बड़ा संतोष है।



















