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हैदराबाद के फनकार मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी ने कला और धरोहर संरक्षण में स्थापित की मिसालसक्सेस स्टोरी
12 अक्तू॰ 2026, 1:23 pm (53 मिनट पहले)· 0

हैदराबाद के फनकार मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी ने कला और धरोहर संरक्षण में स्थापित की मिसाल

पारिवारिक विरासत से चित्रकारी सीखने वाले मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और पाश्चात्य यथार्थवादी कला में विशिष्ट पहचान बनाई है। भारी नुकसान के बावजूद निरंतर रियाज के बल पर उन्होंने अपनी कला साधना जारी रखी।

तेलंगाना के हैदराबाद शहर में कला, रंगों और कैनवास को अपनी संपूर्ण जिंदगी समर्पित करने वाले मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी ने चित्रकला जगत में एक खास मुकाम हासिल किया है। वे मात्र एक साधारण या पारंपरिक चित्रकार नहीं हैं, बल्कि उन्होंने हैदराबाद की अनमोल ऐतिहासिक विरासतों और प्राचीन कलाकृतियों के संरक्षण में असाधारण योगदान दिया है। चित्रकला उनके लिए केवल आजीविका का साधन अथवा शौक नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसी खानदानी विरासत है जो उन्हें अपने दादा और पिता से मिली है। उनके परिवार में पीढ़ियों से इस फन की परंपरा चली आ रही थी, जिसे उन्होंने आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

बचपन की तालीम और शुरुआती उपलब्धियां

फारूकी साहब की कलात्मक यात्रा की शुरुआत उनके अपने घर की चौखट से हुई थी। उनकी फूफी उनकी पहली ड्राइंग उस्ताद बनीं, जिन्होंने बचपन के दिनों में उनके नन्हें हाथों में पहली बार कूची थमाई थी। पारिवारिक मार्गदर्शन और प्राकृतिक लगन के संगम से उनकी प्रतिभा बेहद कम उम्र में ही निखरने लगी थी। इस हुनर का ठोस प्रमाण वर्ष 1959 में सामने आया, जब वे प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। उस दौरान उन्हें रोटरी क्लब की राज्यस्तरीय कला प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल से नवाजा गया। प्राथमिक शिक्षा के दौर में मिले इस बड़े सम्मान ने उनके भीतर आत्मविश्वास का नया संचार किया और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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पाश्चात्य यथार्थवाद और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान

मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी की कला साधना का दायरा केवल हैदराबाद या दक्षिण भारत के भूगोल तक सीमित नहीं रहा। अपने लंबे कलात्मक सफर के दौरान उन्होंने बेंगलुरु, मुंबई, नई दिल्ली तथा सऊदी अरब के जेद्दा जैसे प्रमुख शहरों में रहकर अपनी चित्रकारी का लोहा मनवाया। उनकी प्रमुख विशेषता उनकी पाश्चात्य यथार्थवादी शैली रही है। वे इंसानी चेहरों की बारीकियों और प्राकृतिक परिदृश्यों को कैनवास पर इतनी सजीवता और गहराई से उकेरते हैं कि वास्तविक जीवन और पेंटिंग के बीच का अंतर पहचानना कठिन हो जाता है। उन्होंने महान कलाकार लियोनार्डो दा विंची की कालजयी कलाकृति मोना लिसा को भी तीन बार कैनवास पर हूबहू तैयार किया, जिसे कला जगत के विशेषज्ञों ने बेहद सराहा।

निज़ाम म्यूजियम और सालारजंग म्यूजियम में कलाकृतियों का पुनरुद्धार

उनके पेशेवर जीवन का सबसे गौरवशाली और महत्वपूर्ण अध्याय तब शुरू हुआ, जब उन्हें हैदराबाद के ऐतिहासिक निज़ाम म्यूजियम और सालारजंग म्यूजियम में रखी प्राचीन पेंटिंग्स के रेस्टोरेशन यानी पुनरुद्धार का जिम्मा सौंपा गया। सदियों पुरानी कलाकृतियों की टूट-फूट को सुधारना और रासायनिक व भौतिक नुकसान के बावजूद उन्हें उनके मूल ऐतिहासिक स्वरूप में लौटाना अत्यंत जटिल और तकनीकी काम होता है। फारूकी साहब ने अपनी कलात्मक निपुणता और धैर्य से इस दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया। वे आज भी सालारजंग म्यूजियम को अपनी कलात्मक प्रेरणा का सबसे बड़ा और आदरणीय केंद्र मानते हैं।

दीमक से भारी नुकसान और अटूट कला साधना

प्रत्येक बड़े कलाकार के जीवन में कठिन इम्तिहान आते हैं, और फारूकी साहब के सफर में भी एक अत्यंत पीड़ादायक मोड़ आया। जब वे रोजगार के सिलसिले में पांच वर्षों तक सऊदी अरब में कार्यरत थे, उस दौरान हैदराबाद स्थित उनके कला स्टूडियो में दीमक लग गई। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में उनके बचपन से सहेजे गए दुर्लभ संग्रह, ऐतिहासिक किताबें और जीवन भर के परिश्रम से तैयार की गई सैकड़ों पेंटिंग्स नष्ट हो गईं। अपनी अनमोल कृतियों के विनाश के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे फारसी की एक मशहूर कहावत का उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि एक सच्चा और सिद्धहस्त फनकार बनने के लिए निरंतर अभ्यास और अनवरत कार्य ही एकमात्र सच्चा मार्ग है।

सवाल-जवाब

मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी कौन हैं?
वे हैदराबाद के एक प्रसिद्ध चित्रकार और कला संरक्षक हैं, जिन्होंने अपनी कला साधना के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहरों के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
फारूकी साहब को चित्रकारी की शुरुआती प्रेरणा कहां से मिली?
चित्रकारी उनकी खानदानी विरासत थी, जो उनके दादा और पिता से जुड़ी थी। बचपन में उनकी पहली ड्राइंग उस्ताद उनकी फूफी बनीं, जिन्होंने उन्हें पहली बार ब्रश थमाया था।
उन्हें अपने बचपन में कौन सा बड़ा सम्मान मिला था?
साल 1959 में, जब वे प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे, तब उन्हें रोटरी क्लब की राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था।
फारूकी साहब की चित्रकारी की मुख्य शैली क्या है?
उनकी सबसे प्रमुख पहचान उनकी पाश्चात्य यथार्थवादी (वेस्टर्न रियलिस्टिक) शैली है, जिसमें वे इंसानी चेहरों और प्राकृतिक दृश्यों को अत्यंत सजीवता से उकेरते हैं।
उन्होंने किस विश्वप्रसिद्ध पेंटिंग को कैनवास पर उतारा है?
उन्होंने महान चित्रकार लियोनार्डो दा विंची की विश्व प्रसिद्ध पेंटिंग मोना लिसा को तीन बार कैनवास पर हूबहू तैयार किया है।
हैदराबाद के किन संग्रहालयों में उन्होंने पेंटिंग्स का रेस्टोरेशन किया?
उन्होंने हैदराबाद के प्रसिद्ध निज़ाम म्यूजियम और सालारजंग म्यूजियम में रखी प्राचीन और ऐतिहासिक पेंटिंग्स का रेस्टोरेशन किया है।
उनके स्टूडियो में किस कारण से बड़ा नुकसान हुआ था?
जब वे पांच साल के लिए सऊदी अरब में काम कर रहे थे, तब हैदराबाद स्थित उनके स्टूडियो में दीमक लगने से सैकड़ों पेंटिंग्स और दुर्लभ संग्रह नष्ट हो गए थे।
इस बड़े नुकसान के बाद भी उनका कला के प्रति क्या दृष्टिकोण रहा?
उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक फारसी कहावत का उल्लेख करते हुए माना कि एक अच्छा फनकार बनने के लिए लगातार अभ्यास और काम करते रहना ही एकमात्र रास्ता है।
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