तेलंगाना के हैदराबाद शहर में कला, रंगों और कैनवास को अपनी संपूर्ण जिंदगी समर्पित करने वाले मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी ने चित्रकला जगत में एक खास मुकाम हासिल किया है। वे मात्र एक साधारण या पारंपरिक चित्रकार नहीं हैं, बल्कि उन्होंने हैदराबाद की अनमोल ऐतिहासिक विरासतों और प्राचीन कलाकृतियों के संरक्षण में असाधारण योगदान दिया है। चित्रकला उनके लिए केवल आजीविका का साधन अथवा शौक नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसी खानदानी विरासत है जो उन्हें अपने दादा और पिता से मिली है। उनके परिवार में पीढ़ियों से इस फन की परंपरा चली आ रही थी, जिसे उन्होंने आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
बचपन की तालीम और शुरुआती उपलब्धियां
फारूकी साहब की कलात्मक यात्रा की शुरुआत उनके अपने घर की चौखट से हुई थी। उनकी फूफी उनकी पहली ड्राइंग उस्ताद बनीं, जिन्होंने बचपन के दिनों में उनके नन्हें हाथों में पहली बार कूची थमाई थी। पारिवारिक मार्गदर्शन और प्राकृतिक लगन के संगम से उनकी प्रतिभा बेहद कम उम्र में ही निखरने लगी थी। इस हुनर का ठोस प्रमाण वर्ष 1959 में सामने आया, जब वे प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। उस दौरान उन्हें रोटरी क्लब की राज्यस्तरीय कला प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल से नवाजा गया। प्राथमिक शिक्षा के दौर में मिले इस बड़े सम्मान ने उनके भीतर आत्मविश्वास का नया संचार किया और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पाश्चात्य यथार्थवाद और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान
मोहम्मद अब्दुल लतीफ फारूकी की कला साधना का दायरा केवल हैदराबाद या दक्षिण भारत के भूगोल तक सीमित नहीं रहा। अपने लंबे कलात्मक सफर के दौरान उन्होंने बेंगलुरु, मुंबई, नई दिल्ली तथा सऊदी अरब के जेद्दा जैसे प्रमुख शहरों में रहकर अपनी चित्रकारी का लोहा मनवाया। उनकी प्रमुख विशेषता उनकी पाश्चात्य यथार्थवादी शैली रही है। वे इंसानी चेहरों की बारीकियों और प्राकृतिक परिदृश्यों को कैनवास पर इतनी सजीवता और गहराई से उकेरते हैं कि वास्तविक जीवन और पेंटिंग के बीच का अंतर पहचानना कठिन हो जाता है। उन्होंने महान कलाकार लियोनार्डो दा विंची की कालजयी कलाकृति मोना लिसा को भी तीन बार कैनवास पर हूबहू तैयार किया, जिसे कला जगत के विशेषज्ञों ने बेहद सराहा।
निज़ाम म्यूजियम और सालारजंग म्यूजियम में कलाकृतियों का पुनरुद्धार
उनके पेशेवर जीवन का सबसे गौरवशाली और महत्वपूर्ण अध्याय तब शुरू हुआ, जब उन्हें हैदराबाद के ऐतिहासिक निज़ाम म्यूजियम और सालारजंग म्यूजियम में रखी प्राचीन पेंटिंग्स के रेस्टोरेशन यानी पुनरुद्धार का जिम्मा सौंपा गया। सदियों पुरानी कलाकृतियों की टूट-फूट को सुधारना और रासायनिक व भौतिक नुकसान के बावजूद उन्हें उनके मूल ऐतिहासिक स्वरूप में लौटाना अत्यंत जटिल और तकनीकी काम होता है। फारूकी साहब ने अपनी कलात्मक निपुणता और धैर्य से इस दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया। वे आज भी सालारजंग म्यूजियम को अपनी कलात्मक प्रेरणा का सबसे बड़ा और आदरणीय केंद्र मानते हैं।
दीमक से भारी नुकसान और अटूट कला साधना
प्रत्येक बड़े कलाकार के जीवन में कठिन इम्तिहान आते हैं, और फारूकी साहब के सफर में भी एक अत्यंत पीड़ादायक मोड़ आया। जब वे रोजगार के सिलसिले में पांच वर्षों तक सऊदी अरब में कार्यरत थे, उस दौरान हैदराबाद स्थित उनके कला स्टूडियो में दीमक लग गई। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में उनके बचपन से सहेजे गए दुर्लभ संग्रह, ऐतिहासिक किताबें और जीवन भर के परिश्रम से तैयार की गई सैकड़ों पेंटिंग्स नष्ट हो गईं। अपनी अनमोल कृतियों के विनाश के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे फारसी की एक मशहूर कहावत का उदाहरण देते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि एक सच्चा और सिद्धहस्त फनकार बनने के लिए निरंतर अभ्यास और अनवरत कार्य ही एकमात्र सच्चा मार्ग है।



















