बिहार के भोजपुर जिले में एक किसान ने खेती का पूरा नजरिया बदल कर रख दिया है। आशुतोष पांडेय ने प्रो-ट्रे तकनीक अपनाई और आज उनके यहां तैयार सब्जियों के पौधे बिहार के कई जिलों से होते हुए पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों तक पहुंच रहे हैं। जो काम परंपरागत तरीके से महीनों में भी पूरा नहीं होता था, वो अब केवल 21 दिनों में हो जाता है।
क्या है प्रो-ट्रे तकनीक?
इस तकनीक में छोटी-छोटी कोशिकाओं वाली विशेष ट्रे में पौधे उगाए जाते हैं। पॉलीहाउस और शेडनेट के भीतर नियंत्रित वातावरण में तैयार होने की वजह से इन पौधों में रोगों और कीटों का खतरा बेहद कम रहता है। पौधे मजबूत और स्वस्थ निकलते हैं। 21 दिन में तैयार होने के बाद इन्हें सीधे खेत में रोपा जा सकता है, जिससे किसानों का करीब एक महीने का समय बच जाता है। इस बचत का सीधा फायदा यह होता है कि फसल बाजार में दूसरों से पहले पहुंचती है और किसान को अच्छा दाम मिलता है।
किन सब्जियों के पौधे होते हैं तैयार?
आशुतोष पांडेय की नर्सरी में टमाटर, मिर्च, बैंगन, पत्ता गोभी, खीरा, करैला और नेनुआ समेत कई तरह की सब्जियों के पौधे बनाए जाते हैं। शुरुआत छोटे स्तर से हुई थी, लेकिन पौधों की गुणवत्ता की वजह से मांग लगातार बढ़ती गई। अब हालत यह है कि बिहार के अलग-अलग जिलों से ऑर्डर आने के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों से भी मांग आ रही है।
किसानों को मिलते हैं ये अहम फायदे
पारंपरिक नर्सरी में जहां किसानों को बार-बार सिंचाई करनी पड़ती है, नर्सरी की लगातार निगरानी रखनी होती है और कभी-कभी बीज भी खराब हो जाते हैं, वहीं प्रो-ट्रे तकनीक इन सभी परेशानियों से राहत देती है। पौधे खेत में लगाने के लिए पूरी तरह तैयार होते हैं, इसलिए किसान को अलग से नर्सरी तैयार करने में वक्त और पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। फसल जल्दी पकती है और किसान बाजार में सबसे पहले अपनी उपज लेकर जा सकता है।
कम लागत, कम जगह, ज्यादा मुनाफा
इस तकनीक की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें न ज्यादा जमीन चाहिए और न भारी पूंजी निवेश की जरूरत है। कम लागत में, सीमित जगह में और कम समय में बेहतर मुनाफा कमाना संभव हो जाता है। यही वजह है कि आसपास के अधिक से अधिक किसान अब प्रो-ट्रे नर्सरी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।
हजारों किसानों के लिए बनी मिसाल
आशुतोष पांडेय की यह सफलता सिर्फ उनकी अपनी कमाई तक नहीं रुकी है। उनके तरीके और अनुभव से प्रेरणा लेकर आसपास के हजारों किसान आधुनिक खेती की राह पर चलने लगे हैं। अगर इसी तरह किसान नई तकनीकों को अपनाते रहे, तो खेती केवल जीवनयापन का साधन नहीं बल्कि एक मजबूत और टिकाऊ कारोबार बन सकती है।













