कंप्यूटर क्लास से सोहराय कला तक: जमशेदपुर की पुनीता कुमारी कैसे बनीं झारखंड की लोककला की पहचानसक्सेस स्टोरी
4 घंटे पहले· 2

कंप्यूटर क्लास से सोहराय कला तक: जमशेदपुर की पुनीता कुमारी कैसे बनीं झारखंड की लोककला की पहचान

जमशेदपुर की पुनीता कुमारी ने कंप्यूटर शिक्षिका से शुरुआत कर शेयर बाज़ार और ट्यूशन तक का सफर तय किया, और अब वे झारखंड की पारंपरिक सोहराय कला को नए रूप में देश-दुनिया तक पहुंचा रही हैं।

जमशेदपुर की पुनीता कुमारी का जीवन इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि उम्र और अनुभव के किसी भी पड़ाव पर नई शुरुआत मुमकिन है। जो हाथ कभी बच्चों को कीबोर्ड और कंप्यूटर की एबीसी समझाते थे, वही हाथ आज रंगों और ब्रश के ज़रिए झारखंड की मिट्टी से जुड़ी सोहराय कला को नई पहचान दे रहे हैं। उनका सफर सीधी सपाट सड़क नहीं, बल्कि कई मोड़ों वाला रास्ता रहा है, और हर मोड़ ने उन्हें कुछ नया सिखाया।

तकनीक से शुरू हुआ करियर

पुनीता ने अपने पेशेवर जीवन की नींव कंप्यूटर शिक्षा से रखी। शुरुआती दौर में वे बच्चों को बेसिक कंप्यूटर कोर्स पढ़ाती थीं और तकनीकी ज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय रहीं। यहीं से उनके भीतर सिखाने का वह भाव पनपा, जो आगे चलकर उनकी पहचान का हिस्सा बन गया। शादी के बाद कुछ समय उन्होंने पंजाब में बिताया, जहां पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के साथ उन्होंने जीवन का एक नया अध्याय शुरू किया।

दिल्ली, शेयर बाज़ार और देवघर का दौर

इसके बाद का दौर बेहद दिलचस्प रहा। वर्ष 2001 से 2009 तक पुनीता दिल्ली में रहीं और इन वर्षों में उन्होंने शेयर मार्केट की दुनिया में भी खूब हाथ आज़माया। नए-नए क्षेत्रों में उतरने और खुद को हर परिस्थिति में ढाल लेने की उनकी क्षमता ही उन्हें लगातार आगे बढ़ाती रही। दिल्ली के बाद उनका ठिकाना देवघर बना, जहां उन्होंने ट्यूशन पढ़ाने के साथ-साथ एक स्कूल में शिक्षक के तौर पर भी ज़िम्मेदारी निभाई।

गांव की दीवारों ने बदली दिशा

जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ वर्ष 2009 के बाद आया। इसी दौरान उनका झुकाव झारखंड की पारंपरिक सोहराय कला की ओर बढ़ने लगा। जब वे राज्य के अलग-अलग गांवों में घूमने निकलीं, तो मिट्टी की दीवारों पर उकेरी गई बेहद खूबसूरत चित्रकारी ने उन्हें ठहरने पर मजबूर कर दिया। यह महज़ सजावट नहीं थी, बल्कि झारखंड की संस्कृति, प्रकृति और परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति थी। यही दृश्य उनके मन में गहरे उतर गया और उन्होंने इस कला को बारीकी से समझने का मन बना लिया।

शौक से जुनून तक

सोहराय पेंटिंग की बारीकियां सीखने के लिए पुनीता ने कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। धीरे-धीरे जो शुरू में एक रुचि थी, वह उनका जुनून बन गई। आज वे खुद तो सोहराय पेंटिंग बनाती ही हैं, साथ ही विभिन्न कार्यशालाओं के माध्यम से बच्चों और युवाओं को भी इस कला से जोड़ रही हैं। उनका मानना है कि झारखंड की यह अनमोल विरासत नई पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए, ताकि इसकी पहचान और मज़बूत हो सके।

कलर एंड ब्रश: कैनवास से आगे की कला

पुनीता का अपना एक रचनात्मक मंच भी है, जिसका नाम है “कलर एंड ब्रश”। इसी प्लेटफॉर्म के ज़रिए वे सोहराय कला को नए और आधुनिक स्वरूप में पेश कर रही हैं। उनकी कला सिर्फ कैनवास तक सीमित नहीं रही। जूट बैग, फाइल फोल्डर, हैंडमेड गिफ्टिंग प्रोडक्ट्स और रोज़मर्रा की कई उपयोगी वस्तुओं पर वे सोहराय पेंटिंग की खूबसूरत झलक उतारती हैं। उनके बनाए हर उत्पाद में झारखंड की संस्कृति, प्रकृति और लोककला की आत्मा साफ़ दिखाई देती है।

आज पुनीता अपनी कला के ज़रिए सिर्फ़ अपनी पहचान ही नहीं गढ़ रहीं, बल्कि झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी नई ऊंचाइयों तक ले जा रही हैं। उनकी यह यात्रा बताती है कि जुनून, मेहनत और अपनी जड़ों से जुड़ाव किसी भी इंसान को एक बिल्कुल नई पहचान दे सकता है।

सवाल-जवाब

पुनीता कुमारी कौन हैं?
जमशेदपुर की रहने वाली पुनीता कुमारी एक कलाकार हैं, जो कभी कंप्यूटर शिक्षिका थीं और अब झारखंड की पारंपरिक सोहराय कला को बढ़ावा दे रही हैं।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कैसे की थी?
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कंप्यूटर शिक्षा से की और बच्चों को बेसिक कंप्यूटर कोर्स पढ़ाती थीं।
उनकी रुचि सोहराय कला की ओर कब बढ़ी?
वर्ष 2009 के बाद, जब वे झारखंड के गांवों में घूमते हुए मिट्टी की दीवारों पर बनी चित्रकारी से प्रभावित हुईं।
कलर एंड ब्रश क्या है?
यह पुनीता का अपना रचनात्मक प्लेटफॉर्म है, जिसके ज़रिए वे जूट बैग, फाइल फोल्डर और हैंडमेड गिफ्टिंग प्रोडक्ट्स पर सोहराय कला को नए रूप में पेश करती हैं।
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