महानगरों की भागदौड़ भरी जिंदगी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी-भरकम वेतन पैकेज को छोड़कर अपने गांव या जिले की ओर लौटना आसान फैसला नहीं होता। अधिकांश युवा जहां बड़े शहरों की सुख-सुविधाओं और ऊंचे ओहदों की तरफ भाग रहे हैं, वहीं गाजीपुर के माधव कृष्ण ने बिल्कुल उल्टी राह चुनी। प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों से उच्च शिक्षा हासिल करने और कॉर्पोरेट जगत में एक लंबा और कामयाब सफर तय करने के बाद उन्होंने अपनी मिट्टी का कर्ज चुकाने की ठानी। आज वे अपने गृह जनपद गाजीपुर में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ के निदेशक के रूप में नई पीढ़ी को आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय संस्कृति, स्वास्थ्य और मानवीय मूल्यों से जोड़ने के मिशन में लगे हुए हैं।
सिंगापुर में बेटे के साथ हुए अनुभव ने बदली सोच
शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखने का विचार माधव कृष्ण के मन में अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे उनके परिवार का एक बेहद निजी अनुभव रहा। कुछ वर्ष पहले उनका बेटा लगभग दो साल तक सिंगापुर में रहा था। उस दौरान उसका मन पढ़ाई में रत्ती भर भी नहीं लगता था और वह किताबों को एक भारी बोझ की तरह देखता था। आम भारतीय अभिभावकों की तरह माधव कृष्ण भी शुरू में बेटे पर गुस्सा होते थे और उसे डांटते-फटकारते थे, यहां तक कि कभी-कभार हाथ भी उठा देते थे।
कुछ समय बाद उन्होंने महसूस किया कि सख्ती से बच्चे सुधरने की बजाय सहम जाते हैं। इसके बाद उन्होंने बेटे पर दबाव बनाना पूरी तरह बंद कर दिया। उन्होंने बच्चे को उसकी पसंद की गतिविधियों की पूरी आजादी दी, जिसमें कॉमिक्स पढ़ना और तैराकी करना शामिल था। इसका परिणाम बेहद सकारात्मक रहा और कुछ ही दिनों में बच्चे की रुचि स्वतः ही पढ़ाई में जागने लगी। इस घटना ने माधव कृष्ण को भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें समझ आया कि किसी भी इंसान की नींव तैयार करने में प्राथमिक शिक्षा का कितना गहरा योगदान होता है और डर के माहौल में सीखने की क्षमता खत्म हो जाती है।
मातृभाषा का सम्मान और रटने की परंपरा से मुक्ति
हमारे देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बढ़ती बाढ़ के बीच भाषा को लेकर एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है। माधव कृष्ण का स्पष्ट मानना है कि अधिकांश कॉन्वेंट या अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में सारा जोर केवल अंग्रेजी भाषा सिखाने पर लगा दिया जाता है। एक बच्चा स्कूल में छह घंटे पूरी तरह अंग्रेजी के माहौल में रहता है, लेकिन घर आते ही अपने माता-पिता और परिजनों के साथ हिंदी अथवा अपनी क्षेत्रीय बोली भोजपुरी में बातचीत करता है। ऐसे दोहरे भाषाई दबाव के कारण बच्चा किसी विषय की मूल अवधारणा को गहराई से नहीं समझ पाता।
माधव कृष्ण के अनुसार, ज्ञान हासिल करने की प्रक्रिया में भाषा को कभी भी रुकावट नहीं बनना चाहिए। बच्चों को पहले उनकी अपनी मातृभाषा और स्थानीय परिवेश से जोड़कर किसी भी विषय का सार समझाया जाना चाहिए। अगर कोई बच्चा किसी सिद्धांत को केवल अंग्रेजी में रटकर परीक्षा पास कर रहा है, तो आगे चलकर उच्च शिक्षा और व्यावहारिक जीवन में उसे गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी वैचारिक दर्शन को धरातल पर क्रियान्वित करने के उद्देश्य से उन्होंने साल 2017 में ‘द प्रेसिडियम इंटरनेशनल स्कूल’ की नींव रखी।
स्कूल का अनूठा माहौल: नाम से पुकारने की परंपरा
गाजीपुर में इस विद्यालय को शुरू करने के पीछे माधव कृष्ण का प्रमुख मकसद बच्चों के सिर से परीक्षा और पढ़ाई के मानसिक खौफ को पूरी तरह खत्म करना था। उन्होंने स्कूल परिसर के भीतर एक बहुत ही आत्मीय और अलग नियम लागू किया। विद्यालय के शिक्षक, प्रधानाचार्य और स्वयं निदेशक बच्चों को उपनाम या रोल नंबर के बजाय हमेशा उनके वास्तविक नाम से पुकारते हैं। इस छोटी सी पहल से हर बच्चे को यह एहसास होता है कि उसकी अपनी एक खास पहचान है, जिससे उसका आत्मसम्मान और आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, वे विद्यार्थियों के माता-पिता के साथ भी निरंतर खुला और सीधा संवाद बनाए रखने को अनिवार्य मानते हैं।
शारीरिक तंदुरुस्ती और पारंपरिक भारतीय खेल
शिक्षा का मतलब केवल किताबों के पन्नों को पलटना नहीं है। माधव कृष्ण का यह दृढ़ विश्वास है कि एक अस्वस्थ या कमजोर शरीर कभी भी एक तेज और उर्वर दिमाग को विकसित नहीं कर सकता। अगर शरीर सुस्त रहेगा तो उसका सीधा नकारात्मक असर मानसिक एकाग्रता पर पड़ेगा। इसी कारण उनके स्कूल में विद्यार्थियों को केवल चारदीवारी और किताबों तक सीमित नहीं रखा जाता।
स्कूल में बच्चों को मिट्टी और मैदान से जोड़ने के लिए कबड्डी तथा खो-खो जैसे पारंपरिक भारतीय मैदानी खेलों का नियमित प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा, स्कूल के दैनिक रूटीन की शुरुआत ही सामूहिक रूप से 12 सूर्य नमस्कार के अभ्यास के साथ होती है। इस दैनिक योगाभ्यास का प्राथमिक लक्ष्य विद्यार्थियों के शारीरिक सौष्ठव और मानसिक संतुलन को एक साथ मजबूत बनाना है।
बीमारी से जूझने के दौरान योग और दर्शन से जुड़ाव
अपनी जीवन यात्रा को याद करते हुए माधव कृष्ण अपने छात्र जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू भी साझा करते हैं। बचपन के दिनों में खेलकूद के दौरान उनकी नाक पर गंभीर चोट लग गई थी। इस पुरानी चोट के कारण आगे चलकर उन्हें साइनोसाइटिस की गंभीर बीमारी ने घेर लिया। जब वे एनआईटी राउरकेला से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनकी सेहत लगातार नासाज रहती थी। वे नियमित रूप से जिम जाकर व्यायाम करते थे, लेकिन इसके बावजूद उनके शरीर में अत्यधिक थकान बनी रहती थी और वे चाहकर भी पढ़ाई में पूरा ध्यान नहीं लगा पाते थे।
शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान होने के इसी दौर में उनका परिचय श्री श्री रवि शंकर के ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ संस्थान से हुआ। वहां उन्होंने योग, प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया की बारीकियों को समझा और अपने दैनिक जीवन में उतारा। योग के नियमित अभ्यास से उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे पूरी तरह ठीक हो गया। शारीरिक कायाकल्प के बाद उनकी रुचि भारत के गहरे आध्यात्मिक चिंतन की तरफ मुड़ी और वे रामकृष्ण परमहंस के दार्शनिक विचारों के सान्निध्य में आए। इसके बाद उन्होंने प्राचीन वेदों, उपनिषदों, अद्वैत वेदांत, श्रीमद्भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र का गहन और व्यवस्थित अध्ययन किया।
स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा और गाजीपुर वापसी
प्राचीन भारतीय वांग्मय के अध्ययन के दौरान माधव कृष्ण स्वामी विवेकानंद के ओजस्वी विचारों से गहरे रूप से प्रभावित हुए। उनका मानना है कि स्वामी विवेकानंद ने लगभग 150 वर्ष पूर्व जिस आधुनिक, वैज्ञानिक और खुले विचारों वाली शिक्षा प्रणाली की बात कही थी, उसकी प्रासंगिकता आज इक्कीसवीं सदी में और भी ज्यादा बढ़ गई है। अपने भीतर आए इस गहरे आध्यात्मिक और बौद्धिक परिवर्तन के उपरांत उन्होंने गाजीपुर के सुप्रसिद्ध बाबा गंगाराम दास आश्रम से विधिवत दीक्षा ग्रहण की।
आज माधव कृष्ण आधुनिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लुभावने ऑफर्स और सुख-सुविधाओं से दूर होकर अपने गृह जनपद गाजीपुर के बच्चों का भविष्य संवारने में तल्लीन हैं। वे एक ऐसा शैक्षिक मॉडल खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं जिसमें आधुनिक विज्ञान और सूचना तकनीक के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, नैतिक संस्कार और उत्कृष्ट शारीरिक स्वास्थ्य का बेहतरीन संगम हो।



















