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नंदुरबार की कलेक्टर मिताली सेठी ने महंगे प्ले स्कूल छोड़ सरकारी आंगनवाड़ी में कराया जुड़वां बेटों का दाखिलासक्सेस स्टोरी
4 अक्तू॰ 2026, 1:30 pm (29 मिनट पहले)· 0

नंदुरबार की कलेक्टर मिताली सेठी ने महंगे प्ले स्कूल छोड़ सरकारी आंगनवाड़ी में कराया जुड़वां बेटों का दाखिला

महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल जिले नंदुरबार की कलेक्टर मिताली सेठी ने अपने 3 साल के जुड़वां बेटों को महंगे निजी प्ले स्कूल के बजाय स्थानीय सरकारी आंगनवाड़ी में भेजकर अनूठी मिसाल कायम की है। डेंटिस्ट से आईएएस बनीं मिताली सेठी का यह फैसला जमीनी संवेदनशीलता और सादगी की मिसाल पेश करता है।

प्रशासनिक सेवाओं के शीर्ष पदों पर आसीन अधिकारियों के रहन-सहन और उनके बच्चों की शिक्षा को लेकर आमतौर पर एक खास तरह की धारणा बनी रहती है। लोगों का मानना होता है कि बड़े अफसरों के परिवार केवल फाइव स्टार सुविधाओं, महंगे इंटरनेशनल स्कूलों और एलीट कॉन्वेंट संस्थानों को ही प्राथमिकता देते हैं। समाज की इस आम सोच को पूरी तरह दरकिनार करते हुए महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले की कलेक्टर मिताली सेठी ने एक असाधारण कदम उठाया है। उन्होंने अपने जुड़वां बेटों को किसी फैंसी प्ले स्कूल में भेजने के बजाय सीधे सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र में दाखिल कराया है।

फैंसी प्ले स्कूल की जगह आंगनवाड़ी केंद्र का चयन

नंदुरबार एक आदिवासी बहुल जिला है, जहां मिताली सेठी प्रशासनिक मुखिया के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं। जब उनके जुड़वां बेटे 3 साल के हुए, तब उनके सामने बच्चों की शुरुआती शिक्षा और परवरिश को लेकर निर्णय लेने का समय आया। ऐसे वक्त में जहां कई लोग नामी प्राइवेट संस्थानों की ओर रुख करते हैं, वहीं उन्होंने अपने बच्चों के लिए सरकारी आंगनवाड़ी को चुना। परिवार और सगे-संबंधियों के बीच शुरुआत में इस फैसले को लेकर हिचकिचाहट और असमंजस का माहौल बना, लेकिन उन्होंने अपने निर्णय पर अडिग रहने का संकल्प लिया।

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तौलने वाली अनोखी झोली ने जीता कलेक्टर का भरोसा

इस फैसले के पीछे का कारण कोई दिखावा या पब्लिसिटी हासिल करना बिल्कुल नहीं था, बल्कि एक सच्चा जमीनी अनुभव था। बच्चों का एडमिशन कराने से पहले मिताली सेठी खुद आंगनवाड़ी केंद्र के कामकाज और हालात का मुआयना करने पहुंची थीं। निरीक्षण के दौरान उन्होंने देखा कि छोटे बच्चों का शारीरिक वजन नापने के लिए कपड़े की एक पारंपरिक झोली का उपयोग किया जाता था। उस झोली में अक्सर बच्चे असहज महसूस करते थे और रोने लगते थे।

वहां कार्यरत एक आंगनवाड़ी वर्कर ने बच्चों की इस परेशानी को बहुत बारीकी से समझा। उसने किसी सरकारी टेंडर या लंबी कागजी प्रक्रियाओं का इंतजार किए बिना अपनी सूझबूझ से एक स्थानीय दर्जी से ऐसी आरामदायक झोली तैयार करवाई, जिसमें बैठकर बच्चे खेल-खेल में बिना रोए अपना वजन करवा सकें। जब वर्कर ने सादगी से बताया कि बच्चों की सुविधा के लिए उसने यह काम खुद सेवाभाव से कराया है, तो इस समर्पण ने महिला कलेक्टर को भीतर तक प्रभावित कर दिया।

किताबी ज्ञान से परे मानवीय संवेदनाओं की सीख

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के इस अपनत्व और कर्तव्यनिष्ठा को देखकर मिताली सेठी आश्वस्त हो गईं कि उनके बच्चों को महंगे विज्ञापनों और फैंसी इमारतों से ज्यादा जरूरी मानवीय स्नेह और अपनापन यहीं मिलेगा। नजदीकी लोगों के संशय और शुरुआती हिचकिचाहट के बावजूद उन्होंने बच्चों को आंगनवाड़ी भेजना शुरू किया। अब उनके बेटे 4 साल के हो चुके हैं और वे बड़े गर्व और उत्साह के साथ आंगनवाड़ी जा रहे हैं। उनका मानना है कि इतनी छोटी उम्र में बच्चों पर पढ़ाई का बोझ लादने से बेहतर है कि वे अपने आस-पास के माहौल, सामान्य लोगों और मानवीय संवेदनाओं को करीब से महसूस करें।

डेंटल सर्जरी से यूपीएससी में 56वीं रैंक तक का सफर

आईएएस अधिकारी मिताली सेठी की व्यक्तिगत जीवन यात्रा भी काफी प्रेरणादायक रही है। पंजाब के जालंधर के एक संभ्रांत परिवार में जन्मीं मिताली पढ़ाई में हमेशा आगे रहीं। उन्होंने अमृतसर से डेंटल सर्जरी में बैचलर डिग्री (BDS) पूरी की। इसके बाद उन्होंने चेन्नई के एक प्रसिद्ध संस्थान से ऑर्थोडॉन्टिक्स में मास्टर डिग्री (MDS) हासिल की और एक सफल डेंटिस्ट के तौर पर करियर शुरू किया। उस दौर में मेडिकल की पढ़ाई में पूरी तरह व्यस्त रहने के कारण उन्हें आईएएस की दुनिया और इसकी प्रक्रियाओं की बुनियादी जानकारी तक नहीं थी।

चिकित्सा क्षेत्र में काम करते हुए उनके मन में समाज और राष्ट्र के लिए बड़े स्तर पर योगदान देने का विचार आया। उन्होंने अपनी मेडिकल प्रैक्टिस छोड़कर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने की ठान ली। शुरुआत के 2 प्रयासों में नाकामी मिलने के बाद भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और निरंतर मेहनत जारी रखी। आखिरकार साल 2017 की यूपीएससी परीक्षा में उन्होंने देश भर में 56वीं रैंक हासिल की। वर्तमान में वह महाराष्ट्र कैडर में अपनी संवेदनशीलता और निष्ठा के साथ सेवाएं दे रही हैं। उनके पति भी प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं और पूरा परिवार अपनी सादगी व व्यावहारिक जीवनशैली के लिए जाना जाता है।

सवाल-जवाब

मिताली सेठी कौन हैं और वह वर्तमान में किस पद पर हैं?
मिताली सेठी 2017 बैच की आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल नंदुरबार जिले में कलेक्टर के पद पर कार्यरत हैं।
उन्होंने अपने जुड़वां बच्चों का दाखिला कहां कराया है?
उन्होंने अपने 3 साल के जुड़वां बेटों का दाखिला किसी महंगे निजी प्ले स्कूल के बजाय स्थानीय सरकारी आंगनवाड़ी केंद्र में कराया है।
आंगनवाड़ी में ऐसा क्या हुआ जिसने महिला कलेक्टर का दिल जीत लिया?
निरीक्षण के दौरान उन्होंने देखा कि वजन तौलते समय बच्चों के रोने की समस्या को हल करने के लिए एक आंगनवाड़ी वर्कर ने खुद दर्जी से आरामदायक झोली बनवाई थी।
आईएएस बनने से पहले मिताली सेठी किस पेशे में थीं?
सिविल सेवा में आने से पहले वह एक प्रशिक्षित डेंटिस्ट थीं और उन्होंने ऑर्थोडॉन्टिक्स में मास्टर डिग्री (MDS) पूरी की थी।
यूपीएससी परीक्षा में मिताली सेठी को कौन सी रैंक मिली थी?
शुरुआती 2 प्रयासों में असफल होने के बाद उन्होंने साल 2017 की यूपीएससी परीक्षा में ऑल इंडिया 56वीं रैंक हासिल की थी।
अब उनके बच्चों की उम्र कितनी है और क्या वे अब भी आंगनवाड़ी जा रहे हैं?
उनके बच्चे अब 4 साल के हो चुके हैं और वे आज भी पूरे गर्व के साथ आंगनवाड़ी केंद्र में जा रहे हैं।
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