कर्नाटक के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले श्रीकांत एस एन ने साबित कर दिया है कि अगर दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत हो तो वित्तीय तंगी और संसाधनों की कमी कभी सफलता की राह में रोड़ा नहीं बन सकती। बेंगलुरु के गारमेंट कारखाने में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों के बेटे श्रीकांत ने बिना किसी महंगे कोचिंग संस्थान का सहारा लिए देश की कठिनतम परीक्षाओं में शुमार जेईई मेन को सफलता पूर्वक पास किया है। उनकी इस उपलब्धि ने ना केवल उनके माता-पिता का नाम रोशन किया है, बल्कि सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए भी प्रेरणा की नई मिसाल पेश की है।
दिहाड़ी मजदूरी से जुड़ा पारिवारिक संघर्ष और सहारा
श्रीकांत का पारिवारिक ढांचा आर्थिक रूप से काफी संघर्षपूर्ण रहा है। उनके पिता शेखरप्पा और माता जयश्री बेंगलुरु शहर के पीन्या औद्योगिक क्षेत्र में स्थित एक गारमेंट फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। रोजाना की दिहाड़ी से होने वाली सीमित कमाई से परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी चुनौतीपूर्ण होता था। ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद श्रीकांत के माता-पिता ने कभी भी आर्थिक तंगी का असर अपने बेटे की पढ़ाई पर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने अपने सीमित साधनों में भी श्रीकांत को हमेशा आगे पढ़ने और बड़े सपने देखने के लिए प्रोत्साहित किया।
सरकारी स्कूल से शुरुआती शिक्षा और डाउट क्लियरिंग की आदत
श्रीकांत की प्रारंभिक शिक्षा की नींव रायचूर जिले के एक सरकारी स्कूल में रखी गई थी। बुनियादी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई मोरारजी देसाई रेजिडेंशियल स्कूल और उसके बाद सरकारी पीयू कॉलेज से पूरी की। स्कूल के दिनों से ही वे एक बेहद अनुशासित, शांत और लगनशील छात्र के रूप में जाने जाते थे। उनके शिक्षकों का कहना है कि श्रीकांत कक्षा समाप्त होने के बाद भी स्कूल परिसर में रुककर अध्यापकों से अपने सारे संशय और डाउट्स दूर करते थे। घर लौटने के बाद भी वे देर रात तक बिना थके अपनी किताबों के साथ पढ़ाई में जुटे रहते थे।
बिना महंगी कोचिंग, एनसीईआरटी और यूट्यूब से की तैयारी
वर्तमान समय में जेईई जैसी इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में सफलता पाने के लिए छात्र लाखों रुपये की फीस देकर बड़ी-बड़ी कोचिंग अकादमियों में दाखिला लेते हैं। हालांकि श्रीकांत के परिवार के पास इतने वित्तीय संसाधन नहीं थे कि वे ऐसी किसी महंगी कोचिंग का खर्च उठा पाते। श्रीकांत ने इस कमी को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय अपनी सबसे बड़ी ताकत में तब्दील किया। उन्होंने पूरी तैयारी पूरी तरह से सेल्फ स्टडी पर आधारित रखी। श्रीकांत ने एनसीईआरटी (NCERT) की पाठ्यपुस्तकों को अपनी तैयारी का मुख्य आधार बनाया। इसके अलावा, जिन विषयों में जटिलता आती थी, उन्हें समझने के लिए उन्होंने इंटरनेट पर मौजूद मुफ्त अध्ययन सामग्री और यूट्यूब (YouTube) के शैक्षणिक वीडियो का सहारा लिया।
जेईई मेन में शानदार रैंक और IIITDM कांचीपुरम में दाखिला
श्रीकांत की लगातार कई सालों की अटूट मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब जेईई मेन परीक्षा के नतीजे घोषित हुए। उन्होंने एसटी (ST) वर्ग में 1,975वीं रैंक हासिल कर हर किसी को चकित कर दिया। इस बेहतरीन प्रदर्शन के आधार पर उन्हें प्रतिष्ठित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, डिजाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग (IIITDM), कांचीपुरम में बीटेक (B.Tech) पाठ्यक्रम में प्रवेश मिल गया है। श्रीकांत की इस कामयाबी से उनके गृह क्षेत्र और स्कूल में बेहद खुशी का माहौल है। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर पूर्व शिक्षा मंत्री ने खुद उनके घर पहुंचकर उन्हें शुभकामनाएं और बधाई दी।
भविष्य का लक्ष्य: माता-पिता के कष्ट दूर करना और जरूरतमंदों की मदद
अपनी इस बड़ी सफलता से उत्साहित श्रीकांत का लक्ष्य भविष्य में एक कुशल और सफल इंजीनियर बनना है। वे अपनी पेशेवर सफलता के जरिए अपने माता-पिता के वर्षों के शारीरिक और आर्थिक संघर्षों को पूरी तरह समाप्त करना चाहते हैं। इसके साथ ही, वे समाज के उन गरीब और साधनहीन बच्चों के लिए एक मार्गदर्शक और सहायक बनना चाहते हैं जो केवल पैसों के अभाव में अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ देते हैं। श्रीकांत की यह कहानी देश भर के उन लाखों विद्यार्थियों के लिए एक जबरदस्त प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में भी ऊंचे मुकाम हासिल करने का जज्बा रखते हैं।


















