मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले स्थित लवकुश नगर की रहने वाली आकांक्षा दीप्ति सिंह परिहार ने संघर्ष, त्याग और अटूट दृढ़ निश्चय की एक अद्भुत मिसाल पेश की है। महज तेईस साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर का प्रतिष्ठित पद हासिल कर अपने परिवार के साथ-साथ पूरे इलाके का नाम रोशन किया है। यह शानदार सफलता उन्हें रातों-रात या किसी किस्मत के सहारे नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे पिछले बीस सालों से केवल दो कमरों के एक छोटे से किराए के मकान में रहने वाले पूरे परिवार का भारी त्याग छिपा है। पुलिस की वर्दी पहनने का सपना देखने वाली आकांक्षा ने अपनी पारिवारिक गरीबी और अभावों को कभी भी अपनी पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया। अपने माता-पिता के संघर्षों को देखकर बड़ी हुई यह बेटी अब अपनी इस पहली बड़ी कामयाबी के दम पर अपने माता-पिता के लिए एक अपना पक्का मकान बनवाने का सबसे बड़ा सपना पूरा करने जा रही है। उनकी यह कहानी अभावों में पलकर भी बड़े सपने देखने और उन्हें सच कर दिखाने का एक जीवंत उदाहरण है।
संघर्ष के दिन और माता-पिता का सर्वोच्च त्याग
आकांक्षा की इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे उनके माता-पिता का बहुत बड़ा और मूक बलिदान है। बचपन से ही उन्होंने अपने घर में आर्थिक तंगी का वह दौर देखा है, जिसने उन्हें समय से पहले परिपक्व बना दिया। आकांक्षा उस दौर को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं जब घर में केवल पाव भर दूध ही आ पाता था। उस मामूली सी मात्रा को भी माता-पिता खुद पीने के बजाय अपने तीनों बच्चों में बराबर बांट देते थे, ताकि उनके बच्चों को थोड़ा बहुत पोषण मिल सके। बच्चों को बेहतर माहौल और अच्छी शिक्षा देने की खातिर उनके पिता गोविंद सिंह परिहार ने अपना पैतृक गांव हमेशा के लिए छोड़ दिया था और लवकुश नगर में आकर किराए के घर में बस गए थे। आकांक्षा गहराई से यह महसूस करती हैं कि उनके माता-पिता ने खुद कई बार भूखे रहकर और अपनी इच्छाओं को मारकर भी बच्चों की जरूरतों को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। इसी जीवन भर के संघर्ष ने उनके भीतर जल्द से जल्द एक पक्की सरकारी नौकरी हासिल करने की एक ऐसी आग पैदा की, जो उन्हें दिन-रात मेहनत करने के लिए प्रेरित करती रही। अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने मुख्य रूप से वन डे परीक्षाओं पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया।
शैक्षणिक उत्कृष्टता और खाकी वर्दी का चुनाव
शैक्षणिक मोर्चे पर आकांक्षा शुरुआत से ही बेहद मेधावी और परिश्रमी छात्रा रही हैं। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कक्षा नौवीं से लेकर बारहवीं तक वह लगातार अपने स्कूल की टॉपर बनी रहीं। अपनी स्कूली शिक्षा शानदार अंकों के साथ पूरी करने के बाद उन्होंने महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। वहां से उन्होंने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया और फिर अपनी पढ़ाई का स्तर बढ़ाते हुए गणित जैसे कठिन विषय में मास्टर्स की डिग्री भी सफलतापूर्वक हासिल की। हालांकि, उनका अंतिम लक्ष्य भविष्य में यूपीएससी और राज्य सिविल सेवा जैसी सर्वोच्च परीक्षाओं को पास कर अधिकारी बनना है, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें फिलहाल एक सुरक्षित नौकरी की सख्त जरूरत थी। इस मुकाम तक पहुंचने से पहले उन्होंने पुलिस कांस्टेबल की परीक्षा भी दी थी, लेकिन उस वक्त किस्मत ने साथ नहीं दिया और अंतिम सूची में उनका नाम नहीं आ सका था। इसके बावजूद उन्होंने बिल्कुल भी हार नहीं मानी और अपनी तैयारी जारी रखी। अंततः उनकी मेहनत रंग लाई और वह यूपी पुलिस सब-इंस्पेक्टर के पद पर चयनित हो गईं। आकांक्षा स्पष्ट तौर पर कहती हैं कि उन्हें हमेशा से ही फील्ड की सक्रिय नौकरी पसंद थी और बंद कमरों वाला ऑफिस कल्चर उन्हें कभी रास नहीं आया। वह दृढ़ता से मानती हैं कि लड़कियों के लिए पुलिस की नौकरी सबसे सुरक्षित और सशक्त होती है। उनका मानना है कि जब एक लड़की पुलिस की वर्दी में होती है, तो समाज का कोई भी असामाजिक तत्व उसे गलत नजर से देखने या छूने की हिम्मत नहीं कर सकता। इसके साथ ही, यह पेशा उन्हें समाज की अन्य मजलूम बेटियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए भी कानूनी रूप से सक्षम बनाता है।
एक पिता की लंबी तपस्या और खुद के पक्के घर का सपना
बेटी की इस शानदार उपलब्धि को देखकर आकांक्षा के पिता गोविंद सिंह परिहार की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े हैं। पेशे से एक बेहद साधारण वकील गोविंद सिंह बताते हैं कि लवकुश नगर की अदालत में वकालत करना तो उनके लिए जीवन यापन का केवल एक बहाना भर था। उनका असली मकसद तो किसी भी तरह अपने बच्चों को सही दिशा देना और उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराना था। उनकी तीन संतानों में से उनके सबसे छोटे बेटे ने सबसे पहले सरकारी नौकरी हासिल कर परिवार को पहली खुशी दी थी, जब उसका चयन एमपी पुलिस कांस्टेबल के पद पर हुआ था। अब बेटी के भी यूपी पुलिस में सीधे सब-इंस्पेक्टर बन जाने पर पिता भावुक होकर कहते हैं कि उनके जीवन की सालों की तपस्या आखिरकार आज सफल हो गई है। बेटी की इस अभूतपूर्व सफलता ने समाज में पूरे परिवार का मान और सम्मान कई गुना बढ़ा दिया है। वहीं, आकांक्षा की मां भी अपनी बेटी की इस कामयाबी से बेहद गदगद हैं। उनका मानना है कि छोटे बेटे के बाद अब बेटी की भी इतनी अच्छी सरकारी नौकरी लग गई है, जिससे अब उनके परिवार का बरसों पुराना अपने खुद के घर का सपना बहुत जल्द सच हो जाएगा। बीस सालों से किराए के मकान में रहने के दर्द को बयां करते हुए वह एक बड़ी बात कहती हैं कि किराए का घर हमेशा किराए का ही रहता है और अपना घर ही असल में अपना होता है। अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करते हुए आकांक्षा ने तय किया है कि अपनी पहली सैलरी मिलने पर वह सबसे पहले भगवान को प्रसाद चढ़ाएंगी और फिर अपने माता-पिता और भाई के लिए एक नया और पक्का घर बनवाने की दिशा में काम शुरू करेंगी।




















