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डायबिटीज से पिता को खोने के बाद इंजीनियर मनीष ने अपनाई केमिकल-मुक्त खेती, अब लाखों में कमाईसक्सेस स्टोरी
5 सित॰ 2026, 2:51 pm (46 दिन पहले)· 3

डायबिटीज से पिता को खोने के बाद इंजीनियर मनीष ने अपनाई केमिकल-मुक्त खेती, अब लाखों में कमाई

बिहार के जहानाबाद के इंजीनियर मनीष कुमार ने पिता की डायबिटीज से हुई मौत के बाद केमिकल-मुक्त खेती का स्टार्टअप शुरू किया, जिसे केंद्र से 20 लाख और बिहार सरकार से 10 लाख रुपए की मदद मिली है।

बिहार के जहानाबाद जिले में रहने वाले मनीष कुमार ने इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद जो राह चुनी, वह अधिकतर युवाओं से अलग है। नौकरी की दौड़ में शामिल होने की बजाय उन्होंने केमिकल-मुक्त खेती को अपना पेशा बनाया और आज इसी मेहनत से उनका सालाना कारोबार लाखों रुपए तक पहुंच चुका है। उनकी कोशिश सिर्फ अपने लिए कमाई करना नहीं, बल्कि किसानों और आम लोगों तक भी सेहतमंद और रसायन रहित खान-पान पहुंचाना है।

इंजीनियरिंग के दिनों में जगा सवाल, फिर पिता के निधन ने दी नई दिशा

मनीष कुमार इंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे हैं। पढ़ाई के दौरान ही उनके मन में यह सवाल उठने लगा कि आखिर केमिकल-मुक्त खेती पर काम क्यों नहीं किया जाए। इसी दौरान वे एक ऐसी जगह पहुंचे, जहां देसी गाय के दूध और घी पर काम हो रहा था। उन्हीं दिनों उनके पिता का डायबिटीज की बीमारी से देहांत हो गया। यह घटना मनीष के लिए बड़ा झटका थी और उन्हें अंदर तक झकझोर गई। वे सोचते रहे कि जब उनके पिता पौष्टिक खाना खाते थे, तो फिर यह बीमारी कैसे हो गई। इसी सवाल का जवाब ढूंढते हुए उन्हें एहसास हुआ कि ज्यादातर बीमारियों की जड़ हमारा खान-पान ही है। इसके बाद उन्होंने अपने पुरखों के खान-पान और उनकी लंबी उम्र के बारे में सोचना शुरू किया। नतीजा यह निकला कि उन्होंने अपनी खाद्य प्रणाली को पुराने जमाने की तरह उगाने और तैयार करने का फैसला किया। यहीं से उनके सफर की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर एक पूरे स्टार्टअप में बदल गई।

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केंद्र और बिहार सरकार से मिली आर्थिक मदद

मनीष कुमार का स्टार्टअप केंद्र सरकार और बिहार सरकार, दोनों के यहां पंजीकृत है। इस स्टार्टअप को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से 20 लाख रुपए की मदद मिली है, जबकि बिहार सरकार ने 10 लाख रुपए का अनुदान दिया है। मनीष अब इसी आर्थिक सहयोग के सहारे अपने कारोबार का विस्तार करने में जुटे हैं। उनका मकसद सिर्फ अपना व्यवसाय खड़ा करना नहीं है, बल्कि पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देकर किसानों और समाज के लिए भी एक बेहतर विकल्प तैयार करना है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग रसायन मुक्त खान-पान अपना सकें।

खजूर और ताड़ से बन रहे कई तरह के उत्पाद

आज मनीष कई तरह के उत्पाद तैयार करवा रहे हैं और उन्हें बाजार तक पहुंचा रहे हैं। इनमें मुख्य रूप से खजूर और ताड़ का गुड़, देसी खांड, ताल मिश्री, कालानमक चावल और गेहूं जैसे उत्पाद शामिल हैं, जो पूरी तरह रासायनिक खाद रहित तरीके से तैयार किए जाते हैं। इन सभी उत्पादों को स्थानीय महिलाओं और पुरुषों के जरिए तैयार करवाया जाता है, जिससे गांव के लोगों को भी सीधा रोजगार मिल रहा है। तैयार माल की बिक्री के लिए मनीष ने अपना खुद का प्लेटफॉर्म बना रखा है। स्थानीय बाजार में ग्राहकों तक कॉल और व्हाट्सएप के जरिए सामान पहुंचाया जाता है, वहीं दूर-दराज के इलाकों में ऑनलाइन वेबसाइट के माध्यम से ऑर्डर भेजे जाते हैं। मनीष का कहना है कि उनके ये उत्पाद देश के कई हिस्सों में पहुंच रहे हैं।

पिता के निधन के बाद बदली रणनीति, अब लाखों में टर्नओवर

मनीष कुमार बताते हैं कि खान-पान से जुड़ा यह काम पिता की बिगड़ती तबीयत और बाद में उनके निधन के बाद शुरू हुआ। वे कहते हैं, "अब कोई और इस तरह की बीमारी का शिकार न हो, ऐसा काम करेंगे।" इसी सोच के साथ उन्होंने पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। मनीष मानते हैं कि कई बीमारियां चीनी की वजह से होती हैं, और यह लगभग हर घर में इस्तेमाल होने वाली चीज है। इसीलिए उन्होंने सोचा कि लोगों को चीनी का एक ऐसा विकल्प क्यों न दिया जाए, जिससे वे बीमारियों से बच सकें। इसी सोच के तहत उन्होंने ताड़ और खजूर से गुड़ बनवाना शुरू किया, और इसी उत्पाद से आगे चलकर कई और चीजें भी तैयार करवाने लगे। मनीष के मुताबिक इन उत्पादों की मांग पूरे देश में है और इसी वजह से उनका टर्नओवर भी अच्छा खासा हो गया है।

सवाल-जवाब

मनीष कुमार कौन हैं और कहां से हैं?
मनीष कुमार बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले इंजीनियरिंग स्नातक हैं जो केमिकल-मुक्त खेती का स्टार्टअप चलाते हैं।
उन्होंने यह काम शुरू करने का फैसला क्यों किया?
पिता के डायबिटीज से निधन के बाद उन्हें लगा कि ज्यादातर बीमारियों की जड़ हमारा खान-पान है, इसी सोच से उन्होंने रसायन मुक्त खेती अपनाई।
उनके स्टार्टअप को सरकार से कितनी मदद मिली?
केंद्र सरकार से 20 लाख रुपए और बिहार सरकार से 10 लाख रुपए का अनुदान मिला है।
वे कौन-कौन से उत्पाद तैयार करवा रहे हैं?
खजूर और ताड़ का गुड़, देसी खांड, ताल मिश्री, कालानमक चावल और गेहूं जैसे रसायन मुक्त उत्पाद।
ये उत्पाद कैसे तैयार और बेचे जाते हैं?
इन्हें स्थानीय महिलाओं और पुरुषों के जरिए तैयार करवाया जाता है और कॉल, व्हाट्सएप तथा ऑनलाइन वेबसाइट के जरिए बेचा जाता है।
उनका मौजूदा टर्नओवर कितना है?
मनीष का सालाना कारोबार अब लाखों रुपए तक पहुंच चुका है।
उनके उत्पादों की मांग कहां-कहां है?
मनीष के मुताबिक उनके उत्पाद देश के कई हिस्सों में पहुंच रहे हैं।
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