पूर्णिया के चंद्रही गांव के रहने वाले पंकज कुमार साह ने संघर्ष और मेहनत की ऐसी मिसाल पेश की है जो दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकती है। जब लोग उनकी मां को ताना मारते थे और पूछते थे कि बेटे को इतना पढ़ाकर क्या प्रोफेसर बनाओगी, तब मां चुपचाप उन बातों को सुन लेती थीं। लेकिन उन तानों ने पंकज के भीतर कुछ कर दिखाने की एक मजबूत जिद पैदा कर दी। उन्होंने अपने जीवन की हर बाधा को पीछे छोड़ते हुए आखिरकार असिस्टेंट प्रोफेसर बनकर अपनी मां के उस सपने को हकीकत में बदल दिखाया, जिसके लिए उन्हें ताने सुनने पड़ते थे। आज उनकी इस कामयाबी की चर्चा हर तरफ हो रही है।
साधारण किसान परिवार से ताल्लुक
पंकज कुमार साह पूर्णिया जिले के धमदाहा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले चंद्रही गांव के निवासी हैं। वह एक बेहद साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं जिनके घर की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा मजबूत नहीं थी। उनके परिवार में चार भाई और एक बहन हैं, जिनका पालन-पोषण काफी तंगी के माहौल में हुआ। इसके बावजूद उनके माता-पिता ने कभी भी बच्चों की शिक्षा में कोई कमी नहीं आने दी और पढ़ाई को हमेशा अपने जीवन में सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनकी मां के मन में हमेशा से यही इच्छा थी कि उनका बेटा पढ़-लिखकर एक दिन प्रोफेसर बने। गांव के लोगों की बातें सुनकर शायद किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि यही ताने आगे चलकर इस युवा की सबसे बड़ी ताकत बन जाएंगे।
मां के निधन का गहरा सदमा और चुनौतियों का दौर
पंकज की जिंदगी में एक ऐसा वक्त भी आया जब उन्हें सबसे बड़ा मानसिक और भावनात्मक झटका लगा। जिस मां ने उन्हें पढ़ाने और प्रोफेसर बनाने का सपना देखा था, उनका अचानक निधन हो गया। मां के इस दुनिया से चले जाने के बाद पंकज के सामने बहुत बड़ा खालीपन आ गया और वह अपनी मां को अपनी सफलता की मंजिल तक पहुंचते हुए देखने से वंचित रह गए। हालांकि इस दुखद पल में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी मां के अधूरे सपने को अपना मकसद बनाया और अपनी पढ़ाई पूरी लगन के साथ जारी रखी। मास्टर डिग्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने NET की कठिन परीक्षा की तैयारी में खुद को झोंक दिया।
बार-बार की असफलता के बाद भी नहीं मानी हार
NET की तैयारी के दौरान पंकज के लिए राह आसान नहीं थी। उन्होंने कई बार इस परीक्षा में सफलता तो हासिल की, लेकिन आगे की चयन प्रक्रिया में उन्हें निराशा हाथ लगी और वह सफल नहीं हो सके। लगातार मिलने वाली असफलताएं किसी को भी तोड़ सकती हैं, लेकिन पंकज ने इससे हार नहीं मानी। उनके लिए यह सिर्फ एक नौकरी पाने की सामान्य लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह उनकी दिवंगत मां से किए गए वादे को हर हाल में पूरा करने की एक जिद्द थी। इसी दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने अपनी असफलताओं से सीख ली और अपनी तैयारियों में और अधिक सुधार किया।
नौकरी के साथ जारी रखी पढ़ाई की कठिन तपस्या
अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पंकज ने पूर्णिया जिला समाहरणालय परिसर में सामान्य प्रशासन विभाग के अंतर्गत करीब चार वर्षों तक लिपिक के पद पर जिम्मेदारी संभाली। नौकरी की लंबी और थका देने वाली ड्यूटी के बाद भी उन्होंने कभी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। वह अपनी नौकरी के बीच मिलने वाले हर खाली समय का सदुपयोग अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में करते थे। एक तरफ घर की जिम्मेदारियां, दूसरी तरफ नौकरी का दबाव और इन सबके बीच पढ़ाई का सिलसिला जारी रखना किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं था। लेकिन उनका लक्ष्य पूरी तरह स्पष्ट था और आखिरकार उनकी इस लंबी तपस्या का सकारात्मक परिणाम सामने आया।
उनकी अथक मेहनत और समर्पण का ही परिणाम रहा कि उनका चयन अंततः असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हो गया। वर्तमान समय में वह पूर्णिया विश्वविद्यालय के अधीन आने वाले रुपौली-बिरौली स्थित कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और विद्यार्थियों को शिक्षित कर रहे हैं।
ग्रामीण बच्चों के भविष्य को संवारने का नया संकल्प
अपनी इस शानदार सफलता के बाद पंकज अपनी इस उपलब्धि का पूरा श्रेय अपनी कड़ी मेहनत और अपने माता-पिता के आशीर्वाद को देते हैं। उनका साफ तौर पर कहना है कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में कभी भी परिस्थितियों के आगे घुटने टेकना नहीं सीखा। जिन तानों ने कभी उन्हें बेचैन किया था, आज वही उनके संघर्ष और सफलता की कहानी का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं। पंकज का मानना है कि मां का सपना पूरा होने से मिलने वाली खुशी उनके लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है।
अब उनकी निगाहें केवल अपनी वर्तमान नौकरी तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका दायरा और भी बड़ा है। वह अपने गांव और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता को बेहतर बनाने का बीड़ा उठाना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि बच्चों के भीतर पढ़ाई के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि कोई भी बच्चा संसाधनों की कमी या मार्गदर्शन के अभाव में पीछे न छूटे। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि देश के ग्रामीण इलाकों के बच्चों को सही समय पर सही मार्गदर्शन और उचित अवसर मिल जाएं, तो वे भी बड़ी से बड़ी मंजिल को आसानी से हासिल कर सकते हैं।



















