उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद जब रोजगार के दरवाजे बंद नजर आएं, तो सही मार्गदर्शन जिंदगी की दिशा बदल सकता है। बिहार के पूर्णिया जिले में रहने वाले किशोर कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। पोस्ट ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी करने के बावजूद जब उन्हें नौकरी की तलाश में लगातार निराशा हाथ लगी, तो उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपने पिता के व्यावहारिक अनुभवों और सुझावों पर भरोसा जताते हुए उन्होंने स्वरोजगार का रास्ता चुना। आज वह न केवल एक स्थापित कारोबारी बन चुके हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रहे हैं।
नौकरी की कोशिशों में लगातार असफलता
किशोर कुमार ने अपनी परास्नातक स्तर तक की औपचारिक पढ़ाई लगन से पूरी की थी। डिग्री हासिल करने के बाद उनका प्राथमिक लक्ष्य एक सुरक्षित नौकरी पाना था। उन्होंने अलग-अलग संस्थानों और प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए रोजगार हासिल करने के कई गंभीर प्रयास किए। हालांकि, तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें मनचाही सफलता नहीं मिल सकी। जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, रोजगार न मिलने की चिंता बढ़ने लगी। निरंतर मिलने वाली असफलताओं ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि केवल नौकरी के भरोसे बैठे रहने के बजाय खुद का उद्यम शुरू करना ज्यादा व्यावहारिक कदम हो सकता है।
संकट के दौर में पिता का मिला मार्गदर्शन
जब किशोर अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे थे, तब उन्होंने अपने परिवार और खासतौर पर पिता से खुलकर चर्चा की। कोरोना काल की वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच जब नौकरियां और भी दुर्लभ हो रही थीं, तब उनके पिता ने उन्हें निजी काम शुरू करने की राह दिखाई। पिता का मानना था कि दूसरों के अधीन काम तलाशने से बेहतर है कि छोटे स्तर पर ही सही, अपना कोई कारोबार खड़ा किया जाए। पिता की इस सलाह ने किशोर का आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्होंने व्यापारिक क्षेत्र में कदम रखने का पक्का मन बना लिया।
उधार की पूंजी और किराये के कमरे से शुरुआत
व्यवसाय शुरू करने का निर्णय तो ले लिया गया, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती प्रारंभिक पूंजी की थी। किशोर कुमार ने अपने मित्रों से संपर्क किया और 10 हजार रुपये नकद उधार जुटाए। इस सीमित राशि के साथ परिवार ने भी उनका पूरा सहयोग किया। उन्होंने पूर्णिया के विकास बाजार बस स्टैंड क्षेत्र में एक छोटा कमरा किराये पर लिया। इसी छोटी सी जगह से उन्होंने जूते और चप्पलों की एक बुनियादी दुकान की नींव रखी। सीमित साधनों में शुरू हुआ यह सफर उनके संकल्प की वास्तविक परीक्षा था।
शुरुआती अड़चनें और बाजार की समझ
व्यापार की दुनिया में किशोर बिल्कुल नए थे, इसलिए शुरुआती दिन काफी चुनौतीपूर्ण रहे। उन्हें बाजार के तौर-तरीकों, थोक खरीद और स्थानीय ग्राहकों की पसंद-नापसंद का बिल्कुल अंदाजा नहीं था। बिना पूर्व अनुभव के ग्राहकों को आकर्षित करना और सही उत्पादों का चयन करना मुश्किल साबित हो रहा था। लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय हर दिन सीखने का दृष्टिकोण अपनाया। धीरे-धीरे उन्होंने स्थानीय मांग का बारीकी से अध्ययन किया और यह समझा कि किस वर्ग के ग्राहक किस प्रकार के फुटवियर पसंद करते हैं। ग्राहकों की प्राथमिकताओं के आधार पर उन्होंने धीरे-धीरे अपनी दुकान के स्टॉक को पुनर्गठित करना शुरू कर दिया।
हर वर्ग के लिए विस्तृत रेंज और 20 फीसदी मार्जिन
कड़ी मेहनत और सही योजना के दम पर आज उनका प्रतिष्ठान सिटी शूज हाउस के नाम से विकास बाजार बस स्टैंड के समीप एक मुकम्मल पहचान बना चुका है। उनकी दुकान में अब बच्चों, युवाओं, महिलाओं से लेकर बुजुर्गों तक सभी आयु वर्गों के लिए जूते-चप्पलों की विविध किस्में मौजूद हैं। किशोर लगातार अपने संग्रह में नए डिजाइन और टिकाऊ उत्पाद जोड़ते रहते हैं ताकि ग्राहकों की बदलती मांग को पूरा किया जा सके। इस व्यवसाय से उन्हें लगभग 20 फीसदी तक का सीधा मुनाफा मिल जाता है। सीमित संसाधनों और 10 हजार रुपये की उधारी से शुरू हुआ यह सफर यह साबित करता है कि सही सलाह, धैर्य और सीखने की तत्परता से किसी भी छोटे उद्यम को लाभकारी बनाया जा सकता है।



















