कोरोना वैश्विक महामारी के दौर में जब देश भर के लाखों कामकाजी युवाओं को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था, उस विपरीत समय में बिहार के पूर्णिया जिले के एक युवा ने अपनी निराशा को नए संकल्प में बदल दिया। कस्बा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले देवधा गांव के निवासी मोहम्मद असरार आलम ने शहर की नौकरी छूटने के बाद हार नहीं मानी। अपने पैतृक गांव वापस लौटकर उन्होंने परंपरा और आधुनिकता का ऐसा मेल बैठाया कि आज वे पशुपालन के क्षेत्र में एक सफल उद्यमी बनकर उभरे हैं।
नौकरी की तलाश छोड़ चुना पैतृक गौपालन का मार्ग
लगभग चार वर्ष पूर्व जब कोविड-19 महामारी अपने चरम पर थी, तब बाहर रहकर काम कर रहे मोहम्मद असरार आलम की नौकरी चली गई थी। गांव लौटने पर अधिकांश लोग दोबारा शहरों की ओर रुख करने या नई नौकरियों की तलाश में भटकते हैं, लेकिन असरार ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने किसी अन्य कंपनी में आवेदन करने के बजाय अपने ही गांव में स्वरोजगार की ठोस बुनियाद रखने का फैसला किया। असरार के परिवार में लंबे समय से पारंपरिक गौपालन की प्रथा चली आ रही थी। बचपन से ही पशुपालन के तौर-तरीकों को देखने के कारण उनके पास इस क्षेत्र का बुनियादी अनुभव पहले से मौजूद था। इसी व्यावहारिक ज्ञान को उन्होंने एक व्यवस्थित और बड़े पैमाने के व्यापारिक स्वरूप देने की योजना बनाई।
'देसी गौपालन विकास योजना' से मिली कारोबारी गति
अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए असरार आलम ने व्यवस्थित तरीके से कदम बढ़ाए। उन्होंने स्थानीय पूर्णिया जिला गव्य विकास कार्यालय का संपर्क किया और सरकार द्वारा संचालित 'देसी गौपालन विकास योजना' के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस योजना के अंतर्गत उन्हें न केवल आवश्यक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई, बल्कि पशु प्रबंधन से जुड़ी आधुनिक तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया गया। सरकारी मदद का बेहतर उपयोग करते हुए असरार ने भारतीय नस्ल की सर्वश्रेष्ठ गायों में शुमार गिरी और साहीवाल नस्ल की 15 गायों की खरीद के साथ अपने डेयरी फार्म का औपचारिक शुभारंभ किया।
प्रतिदिन 100 लीटर दूध उत्पादन और बाजार नेटवर्क
असरार आलम के डेयरी फार्म में आज उच्च आनुवंशिक क्षमता वाली गिरी और साहीवाल गायें मौजूद हैं, जिनकी समुचित देखभाल और संतुलित आहार का पूरा ध्यान रखा जाता है। इस बेहतर प्रबंधन के बल पर उनके फार्म से वर्तमान में रोजाना औसतन 100 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। उत्पादित दूध का एक बड़ा हिस्सा वे प्रतिष्ठित सुधा डेयरी फार्म को आपूर्ति करते हैं, जबकि शेष दूध को स्थानीय कस्बा और पूर्णिया के नजदीकी बाजारों में बेचा जाता है। मिलावट रहित, ताजा और उच्च गुणवत्ता वाला दूध होने के कारण स्थानीय ग्राहक उन्हें सामान्य दरों से बेहतर और प्रीमियम मूल्य देने में संकोच नहीं करते, जिससे उनकी दैनिक आय मजबूत हुई है।
वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स से बढ़ाया मुनाफे का दायरा
केवल कच्चा दूध बेचने तक खुद को सीमित रखने के बजाय असरार आलम ने अपने व्यापार में विविधता लाने की सोच अपनाई। उन्होंने दूध के प्रसंस्करण पर ध्यान केंद्रित किया और खुद ही वैल्यू एडेड डेयरी प्रोडक्ट्स तैयार करना शुरू कर दिया। अब वे अपने फार्म के दूध से गाढ़ा दही, मक्खन और पारंपरिक विधि से तैयार शुद्ध देसी घी का निर्माण करते हैं। इन प्रसंस्कृत उत्पादों की बाजार में भारी मांग है और इनमें मुनाफा भी कच्चे दूध की तुलना में काफी अधिक होता है। वैल्यू एडिशन की इस रणनीति और लगन के कारण आज असरार आलम अपने डेयरी व्यवसाय से प्रतिवर्ष 10 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित कर रहे हैं।
ग्रामीण युवाओं के लिए नई दिशा और प्रेरणा
मोहम्मद असरार आलम की यह अभूतपूर्व सफलता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि सही दिशा, कड़ी मेहनत और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का समुचित समन्वय हो, तो अपने गांव की मिट्टी में रहकर भी सम्मानजनक और लाभदायक रोजगार खड़ा किया जा सकता है। महानगरों की ओर पलायन करने के बजाय स्वदेशी संसाधनों का सही दोहन करके स्वावलंबी बनने की उनकी कहानी आज पूर्णिया और आसपास के क्षेत्रों के ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बनी हुई है।



















