उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में मेंथा यानी पिपरमेंट की खेती अब किसानों की जिंदगी का रंग बदल रही है। इसी कड़ी में क्षेत्र के किसान रघुवीर एक बड़ा नाम बनकर उभरे हैं, जो बीते 20 साल से बड़े पैमाने पर मेंथा उगा रहे हैं। उनके लिए यह फसल कोई नई बात नहीं है, क्योंकि उनके दादा और पिता भी यही खेती करते आए हैं और इसी माहौल में पले-बढ़े रघुवीर को बचपन से ही इस फसल की बारीकियां समझ में आ गई थीं। इस साल उन्होंने अपने 6 एकड़ खेत में मेंथा की खास गोल्डन वैरायटी लगाई है, जो इन दिनों किसानों के बीच तेजी से पसंद की जा रही है।
गोल्डन वैरायटी क्यों बनी किसानों की पहली पसंद
रघुवीर का कहना है कि इस गोल्डन किस्म की असली ताकत इसका जबरदस्त तेल उत्पादन है। मेंथा की बाकी किस्मों से जहां एक बीघे में करीब 5 किलो तेल ही हाथ लगता है, वहीं गोल्डन वैरायटी से 8 से 9 किलो तक तेल बड़े आराम से निकल आता है। तेल की मात्रा लगभग दोगुनी हो जाने का सीधा मतलब है किसान की जेब में दोगुना मुनाफा। यही वजह है कि अब इलाके के ज्यादातर किसान इसी किस्म को अपनाने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
जनवरी-फरवरी में बुवाई और बीज का झंझट खत्म
रघुवीर खेती का तरीका बताते हुए कहते हैं कि मेंथा की बुवाई जनवरी के आखिरी दिनों या फरवरी के पहले हफ्ते में शुरू होती है। इसकी सबसे राहत भरी बात यह है कि इसके लिए बाजार से महंगे बीज खरीदने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। यह फसल पुरानी फसल की बची हुई जड़ों से ही तैयार हो जाती है। इन जड़ों को खेत में लगा दिया जाता है और कुछ ही दिनों में नए, तंदुरुस्त पौधे फूटने लगते हैं। एक बार जड़ें जम जाएं तो पौधे तेजी से बढ़ते हैं और बीज का सारा खर्च अपने आप बच जाता है।
3 से 4 महीने में कटाई के लिए तैयार
यह फसल करीब 90 से 120 दिन यानी तीन से चार महीने में पूरी तरह कटाई के लायक हो जाती है। मौसम और देखभाल के हिसाब से कटाई का समय थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है। फसल तैयार होने पर पौधों को काटकर कुछ देर धूप में सुखाया जाता है और फिर तेल निकालने के लिए इसे डिस्टिलेशन यूनिट यानी पेराई टंकी में डाला जाता है। रघुवीर ने अपनी खुद की यूनिट लगा रखी है, जिससे उनका तेल निकालने का काम और भी आसान हो गया है।
मामूली लागत, कई गुना मुनाफा
लागत के सवाल पर रघुवीर बताते हैं कि मेंथा में सबसे ज्यादा ध्यान सिंचाई, निराई-गुड़ाई और खाद पर देना होता है। कुल मिलाकर एक बीघा मेंथा उगाने में करीब 3 से 4 हजार रुपये का खर्च आता है। लेकिन इतनी छोटी लागत के बदले मिलने वाला फायदा कई गुना ज्यादा होता है। इसी वजह से रामपुर और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में किसान इस नकदी फसल की ओर बढ़ रहे हैं।
फिलहाल बाजार में मेंथा तेल का भाव करीब 1000 रुपये प्रति किलो चल रहा है। हालांकि उतार-चढ़ाव वाले इस बाजार में रघुवीर अपना तेल 1700 रुपये प्रति किलो के ऊंचे दाम पर भी बेच चुके हैं। ऐसे में अगर उत्पादन अच्छा हो और भाव मजबूत मिल जाए तो किसान एक ही सीजन में बंपर कमाई कर लेते हैं। मेंथा का तेल दवाइयों, टूथपेस्ट, पान मसाला, कॉस्मेटिक्स और तमाम तरह के प्रोडक्ट बनाने वाले बड़े उद्योगों में काम आता है, इसलिए इसकी मांग बाजार में कभी कम नहीं पड़ती।
तेल के बाद बचा अवशेष भी कमाल का
इस खेती की एक और खूबी यह है कि तेल निकलने के बाद बची पत्तियां और डंठल भी बेकार नहीं जाते। किसान इस बचे अवशेष को सुखाकर अपनी टंकी में ईंधन की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं या फिर इसे सीधे खेत में डाल देते हैं, जहां यह बढ़िया जैविक खाद का काम करता है। इससे रासायनिक खाद का भारी खर्च तो बचता ही है, साथ ही खेत की उपजाऊ ताकत भी प्राकृतिक रूप से बनी रहती है।













