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पारंपरिक खेती छोड़ सुल्तानपुर के पांच किसानों ने बदला भाग्य, केले की बागवानी से कमाया लाखों का मुनाफासक्सेस स्टोरी
3 घंटे पहले· 0

पारंपरिक खेती छोड़ सुल्तानपुर के पांच किसानों ने बदला भाग्य, केले की बागवानी से कमाया लाखों का मुनाफा

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में धान और गेहूं की पारंपरिक खेती को छोड़कर कई प्रगतिशील किसानों ने केले की खेती अपनाई है, जिससे उन्हें कम लागत में भारी मुनाफा मिल रहा है।

Karan MalhotraKaran MalhotraCrime Correspondent 5 मिनट पढ़ें AI के लिए
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उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में पारंपरिक कृषि पद्धतियों से अलग हटकर एक बड़ा कृषि बदलाव देखने को मिल रहा है। जिले के प्रगतिशील किसान अब धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की खेती के बजाय केले की बागवानी को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह कम निवेश में मिलने वाला शानदार मुनाफा है। इन किसानों ने साबित कर दिया है कि अगर सही दिशा और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाए, तो खेती को एक बेहद मुनाफे वाले व्यवसाय में बदला जा सकता है। सुल्तानपुर के विभिन्न गांवों के पांच किसानों की सफलता की कहानियां इस बात का स्पष्ट उदाहरण हैं कि कैसे बागवानी फसलों ने उनकी आर्थिक स्थिति को बदल दिया है।

विमलेश सिंह: दस एकड़ में केले की खेती से बदली किस्मत

सुल्तानपुर की लंभुआ तहसील के अंतर्गत आने वाले गांव तेरये के रहने वाले किसान विमलेश सिंह इस बदलाव के प्रमुख अगुवा हैं। उन्होंने पारंपरिक धान और गेहूं की खेती में लगने वाली मेहनत और उसके मुकाबले कम मुनाफे को देखते हुए केले की बागवानी करने का फैसला किया। विमलेश सिंह बताते हैं कि केले की खेती शुरू करने के बाद से उनकी लागत काफी कम हो गई है और मुनाफे में भारी बढ़ोतरी हुई है। अपनी कृषि भूमि के एक बड़े हिस्से में अब वे केवल केले की ही खेती कर रहे हैं। विमलेश ने लगभग 10 एकड़ खेत में 12 हजार केले के पौधे लगाए थे। फसल के पूरी तरह तैयार होने तक उनकी कुल लागत 2 लाख रुपये आई थी। जब फसल तैयार हुई, तो उन्होंने अपनी उपज को 5 लाख रुपये में बेचा। इस तरह उन्हें इस बागवानी से बहुत बड़ा आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ है।

चंद्रप्रकाश मिश्रा: आधा हेक्टेयर भूमि से कमाया छह गुना लाभ

सुल्तानपुर के ही रामपुर ग्राम सभा के निवासी चंद्रप्रकाश मिश्रा भी पारंपरिक खेती को पीछे छोड़कर इस मुनाफे वाले सफर में शामिल हो चुके हैं। चंद्रप्रकाश मिश्रा का कहना है कि गेहूं और धान की तुलना में केले की खेती में लागत बहुत कम आती है जबकि आमदनी कई गुना अधिक होती है। इसी मुनाफे को देखते हुए उन्होंने अपने अधिकांश खेतों में केले की फसल लगाना शुरू कर दिया है। उन्होंने अपने पास मौजूद लगभग आधा हेक्टेयर खेत में केले के 1800 पौधे रोपे थे। इस पूरी फसल को तैयार करने में उनकी कुल लागत 1 लाख रुपये आई थी। जब केले पककर तैयार हुए, तो उन्होंने इसे बाजार में 6 लाख रुपये में बेचा। कम क्षेत्रफल में इतने बड़े मुनाफे ने उन्हें पूरी तरह से केले की बागवानी के प्रति आश्वस्त कर दिया है।

दलजीत वर्मा: सह-फसली खेती और नर्सरी से दोहरी आमदनी

सुल्तानपुर के हरिपुर बनवा के रहने वाले दलजीत वर्मा ने बागवानी में एक नया और अनूठा तकनीकी मॉडल पेश किया है। उनके पास केले के लगभग 670 से अधिक पौधे हैं, जिससे वे बहुत अच्छी कमाई कर रहे हैं। लेकिन दलजीत केवल केले की फसल तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने खाली जगह का कुशल प्रबंधन करते हुए केले के पौधों के नीचे बची हुई जमीन पर सब्जियों की नर्सरी तैयार कर ली है। इस तकनीकी कृषि विधि के कारण उन्हें एक ही समय में दो अलग-अलग फसलों का दोहरा लाभ मिल रहा है। वे केले की खेती के साथ-साथ गोभी, मिर्च, लौकी और नेनुआ जैसी सब्जियों का उत्पादन भी कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, वे अपनी नर्सरी में तैयार किए गए सब्जी के छोटे पौधों को स्थानीय बाजार में बेचकर अतिरिक्त मुनाफा भी कमा रहे हैं।

अनुपम यादव: युवा सोच और उद्यान विभाग का तकनीकी सहयोग

खेती को एक सफल करियर के रूप में चुनने वाले सुल्तानपुर के युवा किसान अनुपम यादव नई पीढ़ी के लिए एक बड़ी प्रेरणा हैं। उन्होंने नौकरी के पीछे भागने के बजाय केले की खेती को ही अपनी आजीविका का जरिया बनाया है। अनुपम यादव के पास वर्तमान में 5 हजार से अधिक केले के पौधे हैं, जो लगभग 2.5 एकड़ से अधिक के क्षेत्र में फैले हुए हैं। उन्होंने इन पौधों को सरकारी उद्यान विभाग से मंगवाया था। अनुपम बताते हैं कि उनकी इस पूरी खेती में केवल 40 हजार रुपये की लागत आई है, लेकिन इस मामूली निवेश के बदले वे कई गुना अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी इस सफलता में उद्यान विभाग के सहायक उद्यान निरीक्षक दिनेश सिंह का मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण रहा है। अनुपम के अनुसार, केले की फसल को पूरी तरह तैयार होने में लगभग 12 महीने का समय लगता है। उन्होंने यह तकनीकी जानकारी भी साझा की कि बेहतर पैदावार के लिए एक केले के पौधे से दूसरे पौधे के बीच की दूरी लगभग 6 फीट रखी जानी चाहिए।

कृष्ण कुमार सिंह: सरकारी सब्सिडी और प्रशासनिक मार्गदर्शन से मिली सफलता

सुल्तानपुर जिले की बल्दीराय तहसील के अंतर्गत आने वाले एक गांव के रहने वाले कृष्ण कुमार सिंह ने भी अपने खेतों में धान और गेहूं की जगह केले की बागवानी को जगह दी है। कृष्ण कुमार सिंह बताते हैं कि परंपरागत खेती की तुलना में केले की बागवानी में उन्हें बहुत कम लागत में शानदार मुनाफा हासिल हो रहा है, जिसके कारण अब वे अपनी अधिकांश कृषि भूमि पर केले की ही खेती कर रहे हैं। उन्होंने अपनी 1 एकड़ जमीन पर केले के 1100 पौधे लगाए थे। इस फसल को तैयार करने में उनका कुल खर्च 1 लाख रुपये आया था और उन्होंने इस फसल को बाजार में 3 लाख रुपये में बेचा। कृष्ण कुमार सिंह के अनुसार, उन्हें इस आधुनिक खेती के लिए जिला उद्यान विभाग से निरंतर प्रोत्साहन मिलता है। साथ ही, केले के पौधे लगाने के लिए उन्हें सरकार की तरफ से वित्तीय सब्सिडी भी प्रदान की जाती है। इस सहयोग और मार्गदर्शन के लिए उन्होंने जिला उद्यान अधिकारी रणविजय सिंह और सहायक उद्यान निरीक्षक दिनेश सिंह के प्रति आभार भी व्यक्त किया है।

इसका आप पर असर

  • भारत में: देश के पारंपरिक किसानों के लिए यह कहानी एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे पारंपरिक फसलों (गेहूं-धान) से हटकर बागवानी फसलों को अपनाने से कम भूमि में भी कई गुना अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है।
  • सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) में: स्थानीय किसानों को जिला उद्यान विभाग की सहायता, सब्सिडी और तकनीकी प्रशिक्षण का लाभ उठाकर अपनी आय दोगुनी करने और केले की खेती को एक सफल करियर विकल्प के रूप में अपनाने की प्रेरणा मिलेगी।

प्रेरणा और सीख

  • जोखिम लेने की क्षमता: पारंपरिक गेहूं और धान की खेती की पुरानी लीक से हटकर नए व्यावसायिक विकल्प (केले की बागवानी) को अपनाने का साहस दिखाना सफलता की पहली सीढ़ी है।
  • सीमित संसाधनों का सही उपयोग: दलजीत वर्मा की तरह सह-फसली खेती (इंटरक्रॉपिंग) तकनीक का उपयोग करके कम जमीन में केले के साथ सब्जियों की नर्सरी उगाना और दोहरी कमाई करना।
  • सरकारी योजनाओं और सब्सिडी का लाभ: अपनी लागत कम करने के लिए जिला उद्यान विभाग जैसी सरकारी संस्थाओं से मदद लेना और सब्सिडी योजनाओं का सही समय पर लाभ उठाना।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: पौधों के बीच 6 फीट की दूरी और 12 महीने के फसल चक्र जैसी तकनीकी बारिकियों को समझकर वैज्ञानिक ढंग से कृषि कार्य करना।

सवाल-जवाब

सुल्तानपुर के किसान पारंपरिक फसलों को छोड़कर केले की खेती क्यों अपना रहे हैं?
किसान धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों को इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि केले की खेती में लागत कम आती है और इसके बदले में बाजार से कई गुना अधिक मुनाफा प्राप्त होता है।
केले के पौधों को आपस में कितनी दूरी पर रोपा जाना चाहिए?
युवा किसान अनुपम यादव के अनुसार, बेहतर पैदावार और पौधों के विकास के लिए एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच की दूरी लगभग 6 फीट होनी चाहिए।
केले की फसल को पूरी तरह तैयार होने में कितना समय लगता है?
केले की बागवानी में पौधों को लगाने के बाद फसल को पूरी तरह पककर तैयार होने में लगभग 12 महीने यानी एक साल का समय लगता है।
क्या सरकार केले की खेती के लिए कोई वित्तीय सहायता प्रदान करती है?
हाँ, किसान कृष्ण कुमार सिंह के अनुसार, जिला उद्यान विभाग द्वारा केले की खेती करने के लिए किसानों को सरकार की तरफ से सब्सिडी (वित्तीय सहायता) उपलब्ध कराई जाती है।
सह-फसली खेती (इंटरक्रॉपिंग) से किसान दलजीत वर्मा कैसे अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं?
दलजीत वर्मा ने केले के पौधों के नीचे खाली पड़ी जमीन पर गोभी, मिर्च, लौकी और नेनुआ जैसी सब्जियों की नर्सरी लगाई है, जिससे वे दोहरी फसल का लाभ ले रहे हैं।
#सक्सेस स्टोरी#सुल्तानपुर#उत्तरप्रदेश#केलेकीखेती#कृषिसमाचार#प्रगतिशीलकिसान#बागवानीविभाग#सरकारीसब्सिडी

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