आज के दौर में जहां ज्यादातर युवा कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी कॉर्पोरेट कंपनी या सरकारी नौकरी के लिए जद्दोजहद करते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक युवक ने एक बिल्कुल अलग और प्रेरणादायक रास्ता चुना है। राघवेंद्र मिश्रा ने पारंपरिक नौकरी की दौड़ से बाहर निकलकर अपनी शिक्षा और ऊर्जा को कृषि क्षेत्र में लगाने का फैसला किया। आधुनिक और पूरी तरह से जैविक खेती की तकनीकों को अपनाकर, उन्होंने अरबी (जिसे घुईया भी कहा जाता है) उगाने का सफल प्रयोग किया है, जिसने उनकी छोटी सी जमीन को एक बेहद लाभदायक व्यवसाय में बदल दिया है।
रासायनिक खेती से दूरी और नई शुरुआत
राघवेंद्र मिश्रा का परिवार पहले से ही पारंपरिक खेती से जुड़ा हुआ था। लेकिन उन्होंने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता वाली पारंपरिक खेती से मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और फसल की गुणवत्ता भी गिर रही है। कुछ नया और बेहतर करने की चाह में, उन्होंने अपने परिवार की कृषि पद्धतियों को पूरी तरह से जैविक तरीके में बदल दिया। महंगे और नुकसानदायक रसायनों को खरीदने के बजाय, वह अपने खेतों की मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए प्राकृतिक विकल्पों का उपयोग करते हैं। वह मुख्य रूप से सड़ी हुई गोबर की खाद, पोषक तत्वों से भरपूर वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का इस्तेमाल करते हैं। यह बदलाव न केवल रसायनों से मुक्त और सुरक्षित फसल की गारंटी देता है, बल्कि लंबे समय तक जमीन की प्राकृतिक उर्वरता को भी बनाए रखता है।
फसल चक्र और जैविक तरीके के फायदे
जैविक तरीके से अरबी की खेती करने में धैर्य और सटीक देखभाल की जरूरत होती है। राघवेंद्र मिश्रा बताते हैं कि इस फसल को पूरी तरह से तैयार होने और कटाई के लायक बनने में लगभग छह से सात महीने का समय लगता है। इस पूरी अवधि के दौरान खेतों का लगातार ध्यान रखना पड़ता है। वह समय पर सिंचाई सुनिश्चित करते हैं और खेत में नियमित रूप से निराई गुड़ाई करते हैं ताकि खरपतवार मुख्य फसल को नुकसान न पहुंचा सकें। इसके अलावा, वह पौधों को कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए समय समय पर प्राकृतिक जैविक घोल का छिड़काव भी करते हैं। राघवेंद्र मिश्रा कहते हैं, "इन प्राकृतिक तरीकों से पौधों का विकास बहुत अच्छा होता है और बीमारियों का खतरा भी काफी कम हो जाता है।" उनका मानना है कि रासायनिक चीजों का उपयोग न करने से खेती की कुल लागत में भारी कमी आती है और मिट्टी आने वाले कई सालों तक खेती के लिए उपयुक्त बनी रहती है।
कम लागत में बंपर पैदावार और शानदार मुनाफा
इस जैविक खेती के वित्तीय आंकड़े विशेष रूप से ध्यान खींचने वाले हैं। राघवेंद्र मिश्रा पिछले 4 वर्षों से अरबी की खेती कर रहे हैं और वर्तमान में लगभग आधा बीघा जमीन पर यह फसल उगा रहे हैं। जब उन्होंने पहली बार शुरुआत की थी, तब उनकी शुरुआती लागत बेहद कम थी, जो केवल 300 से 400 रुपये के बीच थी। आज, उनके बार बार होने वाले खर्चे लगभग न के बराबर हैं क्योंकि वह हर नई बुवाई के मौसम के लिए घर पर ही अपने बीजों को शोधित और तैयार करते हैं। उनका एकमात्र चालू खर्च निराई गुड़ाई और खेत के सामान्य रखरखाव से जुड़ा हुआ मामूली लेबर खर्च है।
भविष्य के लिए बड़ी योजनाएं
इतने कम निवेश पर मिलने वाला रिटर्न बहुत ही उत्साहजनक रहा है। राघवेंद्र मिश्रा अपने आधा बीघा खेत से लगातार 8 से 9 क्विंटल अरबी की शानदार पैदावार प्राप्त करते हैं। बाजार में जैविक रूप से उगाई गई सब्जियों की भारी मांग है, जिसके कारण आम अरबी की तुलना में उन्हें अपनी फसल के लिए प्रीमियम दाम मिलते हैं। उनकी यह शुद्ध जैविक अरबी बाजार में आसानी से 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक जाती है। इस शानदार कीमत के चलते उन्हें एक बड़ी और स्थिर आय प्राप्त हो रही है, जो कि इतने ही आकार के खेत में पारंपरिक खेती करने से होने वाली कमाई से कहीं अधिक है। अपनी इस लगातार बढ़ती आर्थिक सफलता और खेती के पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से उत्साहित होकर, राघवेंद्र मिश्रा आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर अपने जैविक खेती के व्यवसाय का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं।


















