राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन माउंट आबू अपनी ठंडी वादियों और मशहूर नक्की झील के लिए तो जाना ही जाता है, लेकिन यहां के सबसे लोकप्रिय सनसेट पॉइंट से बस कुछ कदम की दूरी पर एक ऐसी जगह भी है जिसका इतिहास किसी को भी चौंका सकता है. इस जगह का नाम है मूर की गुफा, एक पथरीली गुफा जिसमें 19वीं सदी में ब्रिटिश सेना के एक बड़े अफसर ने अपनी जिंदगी का एक लंबा हिस्सा लगभग पूरी तरह अकेले गुजारा था.
वो अफसर जो अचानक गायब हो गया और गुफा में छोड़ गया अपने संदेश
स्थानीय लोगों और पुराने दस्तावेजों के मुताबिक, बॉम्बे लाइट कैवेलरी के मेजर जनरल आर्थर थॉमस मूर ने 19वीं सदी में इसी गुफा में लंबा वक्त बिताया था. कहा जाता है कि मेजर मूर अपने सैन्य मुख्यालय से अचानक और बेहद रहस्यमयी ढंग से गायब हो गए थे, और लंबे समय तक न तो ब्रिटिश सेना और न ही उनके करीबी लोग उनका कोई सुराग लगा पाए. सेना की नजरों से दूर इस सुनसान गुफा में रहते हुए मेजर मूर ने छैनी और हथौड़े की मदद से गुफा की सख्त पथरीली दीवारों पर कई अनोखे संदेश उकेरे, जो उन्होंने अपने राजा और भगवान की स्तुति में लिखे थे. आज भी कई इतिहासप्रेमी, शोधकर्ता और जिज्ञासु पर्यटक खासतौर पर इन पुराने संदेशों को देखने यहां पहुंचते हैं.
दो सदियों तक गुमनाम रही गुफा, एक पर्यावरणप्रेमी ने दिलाई पहचान
करीब दो सौ साल तक यह ऐतिहासिक गुफा घने जंगलों के बीच पूरी तरह गुमनाम रही और आम इंसानों की पहुंच से बाहर रही. साल 2006 में माउंट आबू के ही एक पर्यावरणप्रेमी डॉ. अरुण कुमार शर्मा ने अपनी लगातार कोशिशों और खोजबीन से इस जगह को स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व विभाग के सामने लाया. इसके बावजूद इस पर आधिकारिक कार्रवाई होने में करीब 7 साल और लग गए. साल 2013 में माउंट आबू के तत्कालीन एसडीएम की खास पहल पर पुरातत्व विभाग ने इस गुफा का वैज्ञानिक तरीके से जीर्णोद्धार करवाया. अब यह पूरी ऐतिहासिक धरोहर वन विभाग की देखरेख में है, और इसी गुफा के ठीक बगल में माताजी का एक बेहद प्राचीन और चमत्कारी मंदिर भी मौजूद है, जो पर्यटकों की आस्था का भी केंद्र है.
बॉम्बे लाइट कैवेलरी से बनी पूना हॉर्स रेजिमेंट
आजादी से पहले जिस सैन्य टुकड़ी को बॉम्बे लाइट कैवेलरी कहा जाता था, वही आज भारतीय सेना की बेहद प्रतिष्ठित पूना हॉर्स रेजिमेंट के नाम से जानी जाती है. इस रेजिमेंट ने आजादी से पहले और आजादी के बाद भी देश की रक्षा में कई बड़ी लड़ाइयां लड़ी हैं और अपनी बहादुरी के लिए पहचानी जाती है. इसी रेजिमेंट के लंबे इतिहास में मेजर जनरल थॉमस मूर को आज भी बड़े सम्मान से एक खास 'संत सिपाही' के तौर पर याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने युद्ध की राह के साथ-साथ आध्यात्म का रास्ता भी चुना था.
यही वजह है कि सनसेट पॉइंट घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए मूर की गुफा और उसके पास का माताजी मंदिर एक ऐसा ठिकाना बन गया है, जहां प्रकृति, इतिहास और आस्था तीनों एक साथ देखने को मिलते हैं.




















