शाम के समय चाय की चुस्कियों के साथ जब कुछ नमकीन और कुरकुरा खाने की चाह होती है, तो रसोई में तैयार पारंपरिक नाश्ते का कोई मुकाबला नहीं होता। आमतौर पर घरों में मठरी बनाने के लिए मैदे का प्रयोग सबसे ज्यादा देखा जाता है, लेकिन अगर आप एक बेहतरीन और हल्का विकल्प तलाश रहे हैं, तो बारीक सूजी एक शानदार जरिया बन सकती है। सूजी के इस्तेमाल से बनी यह परतदार नमकीन न केवल बेहद खस्ता बनती है, बल्कि इसमें देसी घी की सौंधी महक और पारंपरिक मसालों का तालमेल स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है। घर पर जब अचानक मेहमान आ जाएं या फिर कई दिनों के लिए कोई सूखा नाश्ता सुरक्षित रखना हो, तो यह तरीका बेहद उपयोगी साबित होता है। इस पूरी तैयारी में रसोई में मिलने वाली आम चीजें ही काम आती हैं, लेकिन अंतिम बनावट को एकदम सही रूप देने के लिए सामग्री मिलाने, गूंथे हुए आटे को वक्त देने और कड़ाही में तलते समय आंच के संतुलन का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
स्वाद बढ़ाने के लिए जरूरी सामग्री और उनकी तैयारी
इस नमकीन नाश्ते को तैयार करने के लिए सबसे प्राथमिक वस्तु बारीक सूजी है। इसके साथ ही खस्तापन लाने के लिए शुद्ध देसी घी, साबुत जीरा, सुगंधित अजवाइन, सूखी कसूरी मेथी, तीखेपन के लिए चिली फ्लेक्स और आवश्यकतानुसार सादा नमक जुटाना होता है। तलने की प्रक्रिया के लिए साफ कुकिंग ऑयल और आटा लगाने के लिए सामान्य पानी की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा मठरी के भीतर अलग-अलग परतें उभारने के लिए थोड़ा सा घी और अलग से रखी गई बारीक सूजी का मिश्रण भी काम आता है। अगर आपके पास घर में केवल मोटी सूजी उपलब्ध है, तो उसे सीधे इस्तेमाल करने के बजाय मिक्सर में डालकर कुछ सेकंड के लिए घुमा लें, जिससे वह बारीक और महीन हो जाए। बारीक कण होने की वजह से आटे को गूंथते समय एकसार खिंचाव मिलता है और बेलते वक्त दरारें नहीं पड़ती हैं। तीखापन यदि कम पसंद हो तो चिली फ्लेक्स को पूरी तरह छोड़ा भी जा सकता है।
मसालों का सूखा मिश्रण तैयार करने का सही ढंग
सबसे पहले किसी फैले हुए गहरे बर्तन या परात में सूजी निकालें। इसके बाद इसमें जीरा, हथेलियों से रगड़ी हुई अजवाइन, कसूरी मेथी, चिली फ्लेक्स और नमक मिलाएं। कसूरी मेथी और अजवाइन को हथेलियों के बीच अच्छी तरह मसलकर डालने से उनका प्राकृतिक तेल और खुशबू पूरे आटे में समान रूप से रच-बस जाती है। पानी या चिकनाई डालने से पहले इस सूखे मिश्रण को हाथों से अच्छी तरह मिला लेना बहुत जरूरी होता है। ऐसा करने से नमक और मसालों का फैलाव पूरे आटे में एक जैसा हो जाता है, जिससे किसी एक मठरी में नमक अधिक और दूसरी में कम होने की आशंका पूरी तरह खत्म हो जाती है। मसालों का अनुपात बहुत ज्यादा तीखा या भारी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि सूजी का अपना एक हल्का कुरकुरा स्वाद होता है जो चाय के साथ बहुत संतुलित लगता है।
देसी घी का मोयन और सख्त आटा गूंथने की तकनीक
सूखे मसाले मिल जाने के बाद सूजी के बीच में देसी घी डाला जाता है। घी को केवल डालकर तुरंत पानी मिलाने की गलती न करें, बल्कि उंगलियों और हथेलियों की मदद से घी को सूजी के एक-एक दाने तक अच्छी तरह रगड़ें। जब घी पूरी तरह मिल जाए, तो मिश्रण को अपनी मुट्ठी में बांधकर जांचें। अगर मुट्ठी बंद करने पर सूजी का लड्डू जैसा आकार बंधने लगे, तो इसका मतलब है कि मोयन का अनुपात बिल्कुल सही बैठा है। इसके बाद थोड़ा-थोड़ा पानी छिड़कते हुए सख्त आटा तैयार करें। यह आटा सामान्य रोटी के आटे की तरह ढीला या मुलायम कतई नहीं होना चाहिए, और न ही इतना सूखा रहे कि आपस में बंध ही न पाए। गूंथने के बाद इस आटे को गीले या सूखे साफ बर्तन से ढककर कम से कम 20 मिनट का विश्राम देना जरूरी है। इस अवधि में सूजी पानी को पूरी तरह सोख लेती है और उसके दाने फूलकर आपस में जुड़ जाते हैं। 20 मिनट बाद यदि आटा जरूरत से ज्यादा कड़ा लगे, तो अपनी हथेलियों को पानी से हल्का सा गीला करके आटे को दोबारा मसल लें।
बेलने की विधि और घी-सूजी से परतें उभारने का हुनर
विश्राम के बाद तैयार आटे को बराबर आकार के पेड़ों में बांट लें। चकले पर एक हिस्सा रखकर बेलन की मदद से रोटी जैसा बेलें। इसे बहुत ज्यादा पतला कागज जैसा करने की जरूरत नहीं होती। अब इस बेली हुई सतह पर उंगली या ब्रश से देसी घी की एक बेहद पतली परत लगाएं और ऊपर से थोड़ी सी बारीक सूजी छिड़क दें। यह सूजी और घी का लेप परतों को आपस में चिपकने से रोकता है। ध्यान रखें कि घी या सूजी का लेप मोटा न हो, केवल हल्की परत ही काफी होती है। अब इस रोटी को एक सिरे से धीरे-धीरे मोड़ते हुए रोल करें। यदि जरूरत महसूस हो, तो मोड़े हुए हिस्से की खुली सतह पर फिर से हल्का सा घी और सूजी लगाकर दोबारा मोड़ लें। इसके बाद बेलन से हल्के हाथों से इसे थोड़ा लंबा बेल लें। बेलते समय बहुत अधिक दबाव न डालें, अन्यथा आंतरिक परतें आपस में दब जाएंगी और तलते समय खुलेंगी नहीं।
मनचाहा आकार और कड़ाही में तलने का तापमान
बेलने के बाद एक तेज धार वाले चाकू की सहायता से आटे को लंबी पट्टियों या छोटे चौकोर टुकड़ों में काट लें। कोशिश करें कि सभी टुकड़ों की मोटाई लगभग एक जैसी रहे, जिससे कड़ाही में वे सभी एक समान समय में और एक जैसी गर्मी पाकर पक सकें। बाकी बचे हुए पेड़ों से भी इसी तरह मठरियां काटकर एक थाली में रख लें और तलने की बारी आने तक उन्हें सूखे कपड़े से ढककर रखें ताकि हवा से वे सूखें नहीं। अब एक भारी तले की कड़ाही में तलने के लिए तेल गर्म करें। तेल का तापमान जांचने के लिए आटे का एक छोटा सा टुकड़ा तेल में डालकर देखें। अगर वह तुरंत जलकर ऊपर आने के बजाय तले में हल्का सा ठहरकर धीरे-धीरे बुलबुलों के साथ ऊपर तैरने लगे, तो तेल की आंच बिल्कुल सही है। अगर टुकड़ा डालते ही काला या गहरा भूरा हो जाए, तो आंच अधिक तेज है और उसे धीमा करना होगा।
धीमी आंच पर पकाना और सही भंडारण के नियम
कड़ाही में एक बार में बहुत अधिक मठरियां न भरें, क्योंकि इससे तेल का तापमान गिर जाता है और वे तेल सोखने लगती हैं। इन्हें धीमी से मध्यम आंच पर ही धीरे-धीरे पकने दें और बीच-बीच में कलछी से हल्के हाथों से पलटते रहें। तेज आंच पर पकाने से बाहरी परत तो जल्दी सुनहरी हो जाएगी लेकिन भीतर से आटा कच्चा रह जाएगा। जब दोनों तरफ से हल्का सुनहरा और बादामी रंग आ जाए, तो जालीदार कलछी से मठरियों को निकाल लें और अतिरिक्त तेल निथारने के लिए किसी साफ प्लेट पर फैला दें। पहली खेप ठंडी होने के बाद एक मठरी तोड़कर भीतर का कुरकुरापन जांच लें। पूरी तरह ठंडी हो जाने के बाद ही इन्हें किसी साफ, सूखे और एयरटाइट डिब्बे में बंद करके रखें, ताकि बाहरी नमी से इनका खस्तापन खराब न हो।

















