वर्तमान दौर में सोशल मीडिया लोगों के विचारों और धारणाओं को बड़े पैमाने पर आकार दे रहा है। जब किसी गंभीर विषय पर जानकारी बिना किसी पुख्ता प्रमाण के फैलाई जाने लगे, तो यह समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है। इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अनियंत्रित और अपरिपक्व सामग्री की भरमार है, जहां बिना किसी गहरी रिसर्च के कुछ भी प्रसारित कर दिया जाता है। इसी तरह का एक भ्रामक दावा इन दिनों काफी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें यह कहा जा रहा है कि लंकापति रावण के पुतले को जलाने की परंपरा साल 1947 के बाद ही शुरू हुई थी। लेकिन ऐतिहासिक साक्ष्य इस दावे को पूरी तरह से खारिज करते हैं।
ऐतिहासिक दस्तावेज और ब्रिटिशकालीन प्रमाण
दशहरा के पर्व पर रावण दहन की शुरुआत कब हुई, इसका कोई एक सटीक दिन किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ में अंकित नहीं है। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि बाद के साहित्यों में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। मध्यकाल की कई पुस्तकों, ब्रिटिश लाइब्रेरियों के अभिलेखों और भारत सरकार के गजट में दशहरा उत्सव के दौरान रावण दहन की अनेकों तस्वीरें सुरक्षित हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो साल 1920 में क्वेटा में रावण दहन की तस्वीर मिलती है। इसके अलावा 1923 और 1940 में लाहौर, 1943 में एबोटाबाद तथा 1940 में कराची में भी रावण के पुतले जलाने के स्पष्ट प्रमाण और तस्वीरें आज भी मौजूद हैं।
रामलीला मंचन और रावण दहन की परंपरा
तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस को भारतीय समाज में अपार लोकप्रियता मिली। तुलसीदास का जीवनकाल 1532 से 1623 के बीच का माना जाता है, और उन्होंने वर्ष 1574 के आसपास इस महाकाव्य की रचना की थी। उनके शिष्यों ने आम जनमानस को श्रीराम के चरित्र से जोड़ने के लिए इसी कालखंड में रामलीला का मंचन आरंभ किया। यह लोक परंपरा बहुत कम समय में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गई और पड़ोसी देशों जैसे थाईलैंड, कंबोडिया तथा इंडोनेशिया तक पहुंच गई। इसी रंगमंचीय रामलीला के साथ ही रावण दहन की परंपरा भी स्वतः जुड़ती चली गई, हालांकि इसकी शुरुआत की निश्चित तिथि अभी भी शोध का विषय बनी हुई है।
ब्रिटिश शासनकाल और पुरानी दिल्ली के पुख्ता प्रमाण
देश में आज भी ऐसे कई बुजुर्ग मौजूद हैं जिनका जन्म साल 1947 से पहले हुआ था, और उनमें से किसी ने कभी यह नहीं कहा कि यह परंपरा आजादी के बाद शुरू हुई। दिल्ली के लाल किले के निकट श्री धार्मिक रामलीला कमेटी द्वारा रावण दहन का आयोजन लगभग 1800 के आसपास से लगातार किया जा रहा है। ब्रिटिश राज के दौरान के कई लिखित दस्तावेज, सरकारी गजेटियर्स, यात्रा वृत्तांत और तत्कालीन समाचार पत्र इस बात की गवाही देते हैं कि यह आयोजन बहुत पुराना है। वर्ष 1790 में थॉमस ट्विनिंग की पुस्तक 'ट्रैवल्स इन इंडिया इन हंड्रेड इयर्स एगो' में इसका स्पष्ट वर्णन किया गया है। इसके अलावा 1883 से 1884 के दिल्ली के इम्पीरियल गजेटियर में भी इस बात का जिक्र मिलता है कि अश्विन महीने में शाहजहांनाबाद में यमुना नदी के तट पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के बड़े-बड़े पुतले आतिशबाजी के साथ जलाए जाते थे।
आजादी के जश्न का भ्रम और रावण के पुतले
साल 1947 में जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तो 15 अगस्त के दिन से ही पूरे देश में ढोल-नगाड़े और जश्न का माहौल बन गया था। आतिशबाजी का यह दौर महीनों तक चलता रहा। उसी वर्ष जब दशहरा का पर्व आया, तो रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों में पहली बार बड़े पैमाने पर आधुनिक पटाखे और आतिशबाजी को व्यवस्थित रूप से फिट किया गया। संभवतः यही वह मोड़ था जब पहली बार पुतलों में इस तरह की आतिशबाजी का आधुनिक प्रयोग बड़े स्तर पर देखा गया, जिसके कारण कुछ लोगों के मन में यह गलतफहमी पैदा हो गई कि यह परंपरा उसी वर्ष से अस्तित्व में आई।
वाल्मीकि रामायण और अंतिम संस्कार का प्रसंग
भारत में रामायण के कई संस्करण रचे गए हैं, जिनमें महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण को सबसे प्रमाणिक माना जाता है। इसके युद्धकांड के 109वें सर्ग में एक प्रसिद्ध श्लोक आता है, जिसका अर्थ है कि शत्रुता की सीमा केवल मृत्यु तक ही होती है और अब युद्ध का उद्देश्य पूरा हो चुका है। जब विभीषण अपने भाई रावण के शव के पास पहुंचते हैं, तब प्रभु श्रीराम उन्हें समझाते हैं कि रावण का अंतिम संस्कार विधिवत किया जाना चाहिए क्योंकि वह जितना विभीषण का भाई है, उतना ही श्रीराम का भी है। श्रीराम की इस प्रेरणा और आज्ञा के बाद विभीषण ने अपने कुलीन संस्कारों के अनुसार रावण का दाह-संस्कार संपन्न किया था। वहीं दूसरी तरफ, रावण के वध के बाद वानर सेना और समस्त देवी-देवताओं में अत्यधिक प्रसन्नता का स्पष्ट उल्लेख भी वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के 108वें सर्ग में मिलता है।





















