दौड़ती-भागती दुनिया में करियर, पद, पैकेज और भौतिक उपलब्धियों को लेकर हर कोई एक अंधी प्रतिस्पर्धा में फंसा महसूस करता है। साथी कर्मियों के प्रमोशन, नए घर की खरीद अथवा सोशल मीडिया पर चमकती लाइफस्टाइल को देखकर अक्सर लोगों के भीतर यह चिंता घर कर जाती है कि वे अपने साथियों से बहुत पीछे छूट रहे हैं। इसी मानसिक दबाव और तुलना की आदत के बीच टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने जीवन को देखने का एक बेहद व्यावहारिक नजरिया पेश किया है। चेन्नई में साई यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि मानवीय जीवन वास्तव में दूसरों को पछाड़ने की कोई सौ मीटर वाली दौड़ नहीं है, बल्कि यह एक लंबी मैराथन की तरह है।
मैराथन अनुभव से निकला जीवन दर्शन
एन चंद्रशेखरन केवल कॉरपोरेट जगत का नेतृत्व ही नहीं करते, बल्कि वे पिछले करीब 18 वर्षों से नियमित लंबी दूरी की दौड़ लगा रहे हैं। मैराथन धावक के तौर पर अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने युवाओं के सामने जीवन और खेल की गहरी समानताओं को रेखांकित किया। उनके अनुसार सफलता का पैमाना इस बात से तय नहीं होता कि आपने कितने लोगों को पीछे छोड़ दिया, बल्कि इससे आंका जाना चाहिए कि आप हर गुजरते दिन के साथ खुद को कितना बेहतर बना पाए हैं। इसके लिए व्यवस्थित तैयारी, अनवरत मेहनत, असीम धैर्य और अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को सहजता से स्वीकार करना ही सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला है।
तुलना की होड़ त्यागकर स्वयं के विकास पर दें ध्यान
आजकल सोशल मीडिया के दौर में हर व्यक्ति दूसरों की कथित कामयाबियों से अपनी प्रगति की तुलना करने लगता है। कोई विदेश यात्रा कर रहा है, कोई नया कारोबार शुरू कर रहा है अथवा किसी को बड़ा पद मिल गया है, तो यह देखकर हताश होना एक आम मानवीय कमजोरी बन चुका है। चंद्रशेखरन का मानना है कि असल मुकाबला बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर से होना चाहिए। आपका प्राथमिक ध्यान केवल इस बात पर केंद्रित होना चाहिए कि आप आज अपने बीते हुए कल की तुलना में कुछ नया सीख पाए हैं या नहीं। व्यक्तिगत सुधार की यह दैनिक प्रक्रिया ही इंसान को दीर्घकालिक तौर पर सशक्त बनाती है।
उतार-चढ़ाव को सफर का स्वाभाविक हिस्सा समझें
कठिन समय हर व्यक्ति की जिंदगी में आता है, जहां कई बार अटूट मेहनत के बावजूद मनचाहे नतीजे हाथ नहीं आते और रिश्तों या कामकाजी जीवन में तनाव उत्पन्न हो जाता है। ऐसे पलों में घबराने या भागने के बजाय हालात का डटकर सामना करना आवश्यक है। मैराथन का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि लंबी दौड़ का प्रत्येक किलोमीटर एक समान और सरल नहीं होता। किसी मोड़ पर थकान के कारण गति धीमी करनी पड़ती है, तो कहीं चढ़ाई पर अपनी पूरी शारीरिक व मानसिक ऊर्जा झोंकनी पड़ती है। जीवन में भी जब विपरीत परिस्थितियां आएं, तो उन्हें खेल का सामान्य नियम मानकर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
उपलब्धियों पर गर्व करें, लेकिन अहंकार से बचें
करियर में तेजी से सफलता प्राप्त होने के बाद आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है, परंतु यदि यही विश्वास अहंकार का रूप ले ले, तो व्यक्ति के पतन का मार्ग भी वहीं से शुरू हो जाता है। चंद्रशेखरन ने युवाओं को आगाह किया कि अच्छे दौर में अपनी जमीन और जड़ों से जुड़े रहना सबसे बड़ी खूबी होती है। अपनी मेहनत और उपलब्धियों पर गर्व अवश्य करें, लेकिन इसे दूसरों को नीचा दिखाने या स्वयं को सर्वोपरि मानने का जरिया न बनने दें। विनम्रता ही वह गुण है जो बड़ी सफलताओं को लंबे समय तक टिकाए रखती है।
अंतिम परिणाम से अधिक बुनियादी तैयारी को दें महत्व
आधुनिक समय में तात्कालिक परिणाम चाहने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ी है, जहां लोग कार्य शुरू करते ही त्वरित सफलता की अपेक्षा करने लगते हैं। लंबी दौड़ का सबसे बड़ा सबक यही है कि बिना गहन तैयारी के कोई भी व्यक्ति फिनिश लाइन तक नहीं पहुंच सकता। केवल जीत की लालसा रखने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि उस मुकाम तक पहुंचने के लिए की गई पूर्व तैयारी और इच्छाशक्ति ही सबसे ज्यादा मायने रखती है। यदि आपकी नींव और अभ्यास मजबूत है, तो मार्ग में आने वाली विषम से विषम बाधाओं के बीच भी मैदान में टिके रहना बेहद सहज हो जाता है।
तनाव और दबाव से घबराने के बजाय उन्हें स्वीकारें
पारिवारिक जिम्मेदारियां हों, उच्च शिक्षा का बोझ अथवा दफ्तर का चुनौतीपूर्ण माहौल, किसी न किसी रूप में दबाव हर मनुष्य की दिनचर्या का अंग बन जाता है। इस मानसिक दबाव से पलायन करना कोई स्थायी समाधान नहीं है। युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि चुनौतियों से डरने के बजाय उन्हें अपनी वास्तविक क्षमता व सामर्थ्य को परखने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जब व्यक्ति कठिन जिम्मेदारियों को आगे बढ़कर स्वीकार करता है, तभी उसके नेतृत्व और धैर्य की सच्ची परीक्षा होती है।
अपनी गति स्वयं तय करें, दूसरों की राह से न भटकें
प्रत्येक इंसान की पारिवारिक पृष्ठभूमि, आंतरिक सामर्थ्य, व्यक्तिगत चुनौतियां और जीवन के लक्ष्य पूरी तरह से अलग होते हैं। ऐसे में किसी दूसरे की प्रगति या रफ्तार को देखकर अपनी दिशा बदलना अथवा विचलित होना सर्वथा अनुचित है। धावक के रूप में उन्होंने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों के अनुकूल ही अपनी दौड़ की गति निर्धारित करनी चाहिए। जीवन की इस लंबी यात्रा में वही व्यक्ति टिका रहता है जो निरंतरता और संतुलन के महत्व को समझता है। तेज भागने के उन्माद के बजाय बिना रुके लगातार कदम बढ़ाते रहना ही अंततः स्थायी सफलता दिलाता है।



















