छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में स्थित भंडारडीगी गांव में हाल ही में बने तनावपूर्ण माहौल के बीच एक महत्वपूर्ण सामाजिक घटनाक्रम सामने आया है। गांव में धर्म परिवर्तन को लेकर पिछले कुछ समय से लगातार विवाद की स्थिति बनी हुई थी। इस गतिरोध के बीच तीन परिवारों के 18 सदस्यों ने स्वेच्छा से अपने मूल धर्म में लौटने का निर्णय लिया। इस निर्णय के बाद गांव के लोगों ने एकजुट होकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार उनका स्वागत किया और पूरे गांव में सौहार्दपूर्ण वातावरण देखने को मिला।
पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न हुआ घर वापसी का कार्यक्रम
भंडारडीगी गांव में दोनों पक्षों और समाज के प्रबुद्धजनों की उपस्थिति में एक विशेष सामाजिक सभा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में आदिवासी समाज के वरिष्ठजनों और ग्रामीणों की मौजूदगी में तय धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं का पूरी तरह पालन किया गया। रीति-रिवाजों के अनुसार शुद्धिकरण और स्वागत की औपचारिकताएं पूरी कराई गईं, जिसके बाद इन 18 सदस्यों को समाज की मुख्यधारा में पुनः शामिल कर लिया गया। इस पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन और पारंपरिक मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखा गया।
नवाखाई पर्व और ढोल-मांदर की थाप पर झूमे ग्रामीण
घर वापसी की इस प्रक्रिया के साथ ही गांव में आदिवासी समुदाय का प्रमुख लोकपर्व नवाखाई भी पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। नवाखाई पर्व नई फसल के आगमन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक बेहद पावन अवसर होता है। मूल धर्म में लौटे परिवारों के सदस्य भी इस उत्सव में पूरे उत्साह के साथ सम्मिलित हुए। गांव के चौराहे और चौपालों पर मांदर और ढोल की थाप गूंज उठी, जहां ग्रामीणों ने पारंपरिक लोकगीत गाते हुए सामूहिक नृत्य किया और एक-दूसरे को पर्व की बधाई दी।
संस्कृति के संरक्षण और मामले की जांच पर ग्रामीणों की नजर
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि नवाखाई जैसे पारंपरिक पर्व समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों और ऐतिहासिक पहचान को जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे सामूहिक आयोजनों के माध्यम से युवा पीढ़ी को भी अपनी प्राचीन विरासत, मूल्यों और सामाजिक परंपराओं से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है। दूसरी ओर, धर्म परिवर्तन को लेकर गांव में पहले उपजे विवाद और उससे जुड़े विभिन्न आरोपों के संदर्भ में अलग-अलग स्तरों पर जांच की प्रक्रिया जारी है, ताकि स्थिति की पूरी वास्तविकता स्पष्ट हो सके।





















