उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की आंवला विधानसभा सीट सूबे के राजनीतिक नक्शे पर हमेशा से एक बेहद अहम और चर्चित हलका मानी जाती रही है। पिछले आठ आम विधानसभा चुनावों के नतीजों का विश्लेषण करें तो यह साफ दिखता है कि इस क्षेत्र पर ज्यादातर मौकों पर भारतीय जनता पार्टी का ही दबदबा रहा है। मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम में एक बड़ा मोड़ उस वक्त आया जब आंवला विधानसभा सीट से लगातार जीतते आ रहे मौजूदा विधायक धर्मपाल सिंह को बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार बना दिया। इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि साल 2027 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को यहां से बिल्कुल नया चेहरा मैदान में उतारना पड़ेगा।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी हर हाल में बीजेपी के इस मजबूत विजय रथ को थामने की जुगत में लगी है। आंवला में जहां बीजेपी लगातार चौथी बार विजय पताका फहराने के लक्ष्य के साथ अपनी संगठनात्मक जमीन मजबूत कर रही है, वहीं सपा तीन दशकों से ज्यादा लंबे अरसे के बाद इस सीट पर फिर से अपना परचम लहराने की रणनीति बना रही है। अगर आंवला के सामाजिक ताने-बाने और जातीय अंकगणित पर नजर डालें तो यहां मुस्लिम मतदाता, अनुसूचित जाति (SC) वर्ग, राजपूत बिरादरी और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समूह निर्णायक तादाद में मौजूद हैं। इन्हीं समीकरणों के दम पर आंवला सीट का चुनावी रुख तय होता रहा है।
1991 के चुनाव में श्याम बिहारी सिंह ने लगाई थी जीत की हैट्रिक
तीन दशकों के चुनावी सफर को समझने के लिए साल 1991 के विधानसभा चुनाव पर नजर डालना जरूरी है। उस चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार के तौर पर उतरे श्याम बिहारी सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए आंवला सीट पर लगातार तीसरी बार जीत हासिल की थी। उस दौर के कड़े मुकाबले में श्याम बिहारी सिंह ने जनता दल के उम्मीदवार महिपाल सिंह यादव को 6,960 वोटों के फासले से शिकस्त दी थी। नतीजों के ब्योरे के मुताबिक, श्याम बिहारी सिंह के पक्ष में 26,647 वोट पड़े थे, जबकि उनके नजदीकी प्रतिद्वंद्वी महिपाल सिंह यादव 19,687 वोटों तक ही पहुंच पाए थे। उस समय कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे कल्याण सिंह तीसरे स्थान पर रहे थे और उन्हें महज 13,031 वोटों से संतोष करना पड़ा था।
1993 में सपा और बसपा के गठजोड़ ने तोड़ा था बीजेपी का तिलिस्म
हालांकि 1991 की हैट्रिक के तुरंत बाद, साल 1993 के विधानसभा चुनाव में सियासी परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार महिपाल सिंह यादव ने श्याम बिहारी सिंह के अजेय माने जा रहे विजय रथ को रोक दिया। उस दौर में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का ऐतिहासिक गठबंधन मैदान में था। गठबंधन की ताकत के बूते सपा के महिपाल सिंह यादव ने कुल 46,119 वोट हासिल किए और बीजेपी के श्याम बिहारी सिंह को 6,601 वोटों के अंतर से पराजित किया। इस चुनाव में श्याम बिहारी सिंह को 39,518 वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस पार्टी लगातार दूसरी बार तीसरे पायदान पर खिसक गई, जहां उसकी महिला उम्मीदवार उमन लता सिंह को 19,994 मत प्राप्त हुए थे।
1996 में धर्मपाल सिंह के जरिए बीजेपी की जोरदार वापसी
साल 1993 के झटके से उबरते हुए बीजेपी ने 1996 के विधानसभा चुनाव में जोरदार वापसी की, जब पार्टी ने नए चेहरे के रूप में धर्मपाल सिंह पर दांव लगाया। धर्मपाल सिंह ने इस सीट पर भगवा परचम लहराते हुए सपा के महिपाल सिंह यादव को 21,262 वोटों के भारी अंतर से करारी शिकस्त दी। आंकड़ों के मुताबिक, धर्मपाल सिंह को 51,985 वोट मिले थे, जबकि सपा उम्मीदवार महिपाल सिंह यादव महज 30,723 वोटों पर सिमट कर रह गए थे। 1996 के इस चुनाव में भी कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही और उसके प्रत्याशी अतुल शर्मा को 24,784 वोट मिले। इसके अलावा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे मुन्ने खान ने भी 12,426 वोट हासिल कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी।
2002 का सबसे रोमांचक मुकाबला: महज 263 वोटों से तय हुई थी जीत
अगर 1991 से लेकर 2022 तक के पूरे चुनावी इतिहास की पड़ताल करें, तो साल 2002 का विधानसभा चुनाव सबसे ज्यादा सांसें रोक देने वाला साबित हुआ था। इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस चुनाव में हार-जीत का फैसला केवल 263 वोटों के बेहद बारीक अंतर से हुआ था। बीजेपी के धर्मपाल सिंह ने कड़े संघर्ष के बाद 43,345 वोट हासिल करके जीत दर्ज की, जबकि समाजवादी पार्टी के टिकट पर उतरे श्याम बिहारी सिंह 43,082 वोटों के साथ मामूली अंतर से चूक गए। इस त्रिकोणीय संघर्ष में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी बुलाकीराम मौर्या ने भी 29,704 वोट हासिल कर मुकाबले को बेहद कांटेदार बना दिया था।
2007 में बसपा की आंधी और राधा कृष्ण की ऐतिहासिक जीत
साल 2007 के विधानसभा चुनाव के दौरान पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की जबर्दस्त सियासी लहर देखने को मिली थी। इस लहर का असर आंवला सीट पर भी साफ दिखा, जहां बसपा ने अपने इतिहास में पहली बार इस सीट पर कब्जा जमाया। बसपा उम्मीदवार राधा कृष्ण ने सपा के बुलाकीराम मौर्य को 9,379 वोटों के स्पष्ट अंतर से हराकर ऐतिहासिक विजय हासिल की। इस चुनाव में राधा कृष्ण को 40,129 वोट मिले थे, जबकि सपा के बुलाकीराम मौर्य 30,750 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे। इस दौर में बीजेपी तीसरे स्थान पर लुढ़क गई थी और उसके उम्मीदवार धर्मपाल सिंह केवल 29,291 वोट ही जुटा सके थे। वहीं मौलाना तौकीर रजा खान की पार्टी इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के प्रत्याशी ऋषि पाल सिंह ने भी 11,464 वोट झटके थे।
2012 के सपा लहर वाले दौर में भी धर्मपाल सिंह ने बचाई सीट
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे सूबे में समाजवादी पार्टी की आंधी चल रही थी और अखिलेश यादव के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, उस वक्त भी आंवला सीट पर बीजेपी ने अप्रत्याशित रूप से वापसी कर ली थी। यहां बेहद कड़ा और त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला था। बीजेपी के धर्मपाल सिंह ने 50,782 वोट हासिल किए और अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी सपा के महिपाल सिंह यादव को 4,408 वोटों के नजदीकी अंतर से हरा दिया। महिपाल सिंह यादव को कुल 46,374 वोट मिले थे। इस मुकाबले में बसपा के साजिद अली खान तीसरे नंबर पर रहे और उन्होंने 41,082 वोट प्राप्त किए। कांग्रेस की उम्मीदवार अनुपमा मौर्य चौथे स्थान पर रहीं और उन्हें 15,715 वोटों पर ही संतोष करना पड़ा था।
2017 में फिर हुआ त्रिकोणीय घमासान, धर्मपाल सिंह ने मारी बाजी
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में जब सूबे में सत्ता परिवर्तन की बयार बही, तब आंवला सीट पर एक बार फिर तीन प्रमुख ताकतों के बीच जबर्दस्त भिड़ंत हुई। इस कड़े मुकाबले में बीजेपी के धर्मपाल सिंह ने सपा प्रत्याशी सिद्धराज सिंह को 3,546 वोटों के अंतर से मात देकर अपनी सीट बरकरार रखी। चुनाव परिणाम में धर्मपाल सिंह को 63,165 वोट हासिल हुए, जबकि सपा के सिद्धराज सिंह 59,619 वोटों तक पहुंचे। तीसरे नंबर पर रहे बसपा के उम्मीदवार अगम कुमार मौर्य ने 54,192 वोट पाकर मुकाबले को बेहद कड़ा बनाए रखा था। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का राज्यव्यापी गठबंधन था, जिसके चलते कांग्रेस ने आंवला सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था।
2022 में धर्मपाल सिंह की जीत की हैट्रिक और सबसे बड़ा जनादेश
साल 2022 के पिछले आम विधानसभा चुनाव में बीजेपी के धर्मपाल सिंह ने अपनी जीत की शानदार हैट्रिक पूरी की। धर्मपाल सिंह ने 88,956 वोट प्राप्त करके समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी पंडित राधा कृष्ण शर्मा को 18,424 वोटों के भारी अंतर से पराजित किया। पंडित राधा कृष्ण शर्मा को 70,532 वोट ही मिल सके थे। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर तीसरे पायदान पर रही और उसके उम्मीदवार लक्ष्मण प्रसाद को मात्र 18,773 मत हासिल हुए।
तीन दशकों का रिपोर्ट कार्ड और 2027 के सियासी समीकरण
1991 से 2022 के बीच हुए कुल 8 आम विधानसभा चुनावों का ब्योरा देखें तो बीजेपी ने कुल 6 बार परचम लहराया है, जबकि सपा और बसपा के खाते में केवल एक-एक जीत आई है। इस पूरे दौर में कांग्रेस पार्टी एक बार भी आंवला की चुनावी दहलीज पार नहीं कर सकी। व्यक्तिगत स्तर पर धर्मपाल सिंह इस सीट के सबसे सफल नेता साबित हुए, जिन्होंने 1996, 2002, 2012, 2017 और 2022 में कुल पांच बार विधानसभा का चुनाव जीता। इस सीट पर सबसे बड़ी जीत 1996 में धर्मपाल सिंह की 21,262 वोटों की रही थी, जबकि सबसे कम अंतर की जीत 2002 में महज 263 वोटों की रही थी।
अब 2027 के चुनावी समीकरणों की बात करें तो मैदान में एक तरफ बीजेपी होगी, जबकि दूसरी तरफ सपा और कांग्रेस के गठबंधन की चुनौती रहने की संभावना है। हालांकि 2022 के चुनाव में अलग लड़ी कांग्रेस के प्रत्याशी ओमवीर को केवल 2,306 वोट ही मिले थे। वहीं साल 2024 के लोकसभा चुनाव के रुझान भी इस सीट के लिए बेहद दिलचस्प संकेत देते हैं। बरेली लोकसभा क्षेत्र में सपा-कांग्रेस गठबंधन मिलकर लड़ा था। उस चुनाव में जब आंवला विधानसभा क्षेत्र के वोटों की गिनती हुई, तो बीजेपी के सांसद प्रत्याशी धर्मेंद्र कश्यप समाजवादी पार्टी के नीरज मौर्य से 8,488 वोटों से आगे रहे थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में रहे 18,424 वोटों के अंतर के मुकाबले यह बढ़त करीब 10 हजार वोट घट गई थी। साफ है कि 2027 का मुकाबला बेहद कांटेदार रहने वाला है और जीत-हार का दारोमदार नए चेहरों के चयन तथा सामाजिक जातियों की लामबंदी पर ही निर्भर करेगा।



















