इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने वाले प्रमुख कोचिंग संस्थान एफआईआईटीजेईई लिमिटेड और उसके शीर्ष प्रबंधन के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) के लखनऊ जोनल कार्यालय ने कानूनी शिकंजा कस दिया है। जांच एजेंसी ने 15 अक्टूबर 2026 को गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए (PMLA) अदालत में अभियोजन शिकायत यानी चार्जशीट दाखिल की है। इस शिकायत में कंपनी के प्रबंध निदेशक दिनेश कुमार गोयल और निदेशक मोनिला गोयल को नामजद करते हुए अदालत से कठोर सजा देने की अपील की गई है। इसके साथ ही जांच के दौरान एजेंसी द्वारा अस्थायी रूप से अटैच की गई और जब्त की गई 71.88 करोड़ रुपये मूल्य की चल-अचल संपत्तियों को स्थायी तौर पर जब्त करने की गुहार भी लगाई गई है।
एफआईआर और पुलिस चार्जशीट के आधार पर शुरू हुई थी मनी लॉन्ड्रिंग जांच
प्रवर्तन निदेशालय ने यह वित्तीय जांच उत्तर प्रदेश के नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा और मध्य प्रदेश के भोपाल में दर्ज कुल चार प्राथमिकियों (FIR) के आधार पर शुरू की थी। इन मामलों में पीड़ित अभिभावकों और छात्रों ने गंभीर धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे। दर्ज शिकायतों के अनुसार, एफआईआईटीजेईई ने जेईई जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए छात्रों से दो से चार साल की अवधि वाले लंबे कोचिंग प्रोग्राम के नाम पर भारी-भरकम रकम वसूली थी। प्रत्येक छात्र से 2.8 लाख रुपये से लेकर 3.5 लाख रुपये तक की पूरी फीस अग्रिम तौर पर ली गई थी। संस्थान ने दाखिले के वक्त वादा किया था कि तय समय सीमा तक पूरी पढ़ाई कराई जाएगी। हालांकि जमीनी हकीकत इसके उलट निकली, क्योंकि संस्थान में शिक्षकों को कई महीनों से वेतन नहीं दिया जा रहा था। वेतन न मिलने से परेशान होकर फैकल्टी सदस्यों ने सामूहिक रूप से संस्थान छोड़ दिया, जिसके बाद बिना किसी पूर्व चेतावनी के कई सेंटर अचानक बंद कर दिए गए।
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर बात यह रही कि जब शिक्षक संस्थान छोड़कर जा चुके थे और प्रबंधन को भली-भांति ज्ञात था कि पाठ्यक्रम पूरा करा पाना अब कतई संभव नहीं है, तब भी नए छात्रों से धड़ल्ले से भारी भरकम फीस वसूली जाती रही। स्थानीय स्तर पर नोएडा पुलिस इस मामले में अपनी विस्तृत चार्जशीट पहले ही दाखिल कर चुकी है। पुलिस ने दिनेश कुमार गोयल और मोनिला गोयल को मुख्य आरोपी बनाया है। पुलिस जांच में करीब 300 पीड़ित छात्रों और अभिभावकों के बयान दर्ज किए गए हैं। इसके अतिरिक्त कोचिंग सेंटर के स्थानीय संचालकों, अन्य गवाहों के बयानों, फीस की रसीदों और दस्तावेजों को ठोस डिजिटल व दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में शामिल किया गया है।
32 सेंटर अचानक बंद, 14411 छात्रों का भविष्य अधर में
प्रवर्तन निदेशालय की पीएमएलए जांच में यह कड़वी सच्चाई सामने आई कि एफआईआईटीजेईई ने मई 2024 से फरवरी 2025 के बीच देश भर में अपने 32 कोचिंग सेंटर अचानक बंद कर दिए। इस मनमाने फैसले से संस्थान में नामांकित कुल 14,411 छात्रों की पढ़ाई सीधे तौर पर प्रभावित हुई। लाखों रुपये की मोटी फीस पूरी तरह अग्रिम चुकाने के बावजूद इन छात्रों को अधूरा पाठ्यक्रम छोड़कर बीच मझधार में छोड़ दिया गया। जांच में यह भी उजागर हुआ कि कंपनी वित्तीय संकट से जूझने के बावजूद मार्च 2029 तक चलने वाले दीर्घकालिक पाठ्यक्रमों के लिए भी नए छात्रों का दाखिला लगातार ले रही थी। प्रबंधन यह पूरी तरह जानता था कि इन आगामी वर्षों के बैचों को पूरा कराने की क्षमता कंपनी के पास नहीं बची है।
जांच एजेंसी के अनुसार, छात्रों से ली गई इस फीस का इस्तेमाल उस दौर में किया गया जब कंपनी लगातार गंभीर वित्तीय घाटे में चल रही थी। एजेंसी ने छात्रों की फीस के उस हिस्से का आकलन 85.79 करोड़ रुपये किया है जिसे कंपनी ने अपने पास रोककर अवैध रूप से दुरुपयोग किया। प्रवर्तन निदेशालय ने इस पूरी 85.79 करोड़ रुपये की रकम को मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत अपराध से अर्जित आय (Proceeds of Crime) करार दिया है।
कर्मचारियों का वेतन रोका, खुद लिए 24.92 करोड़ रुपये
जांच में कंपनी के प्रमोटर निदेशकों दिनेश कुमार गोयल और मोनिला गोयल के व्यक्तिगत वित्तीय लाभ को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। वित्तीय वर्ष 2022-23 के बाद की समयावधि में दोनों निदेशकों ने खुद को वेतन के रूप में कुल 24.92 करोड़ रुपये की भारी रकम का भुगतान किया। एजेंसी के मुताबिक, गोयल परिवार के पास कंपनी की 86.31% की भारी शेयरधारिता है। इसी भारी हिस्सेदारी के चलते दोनों निदेशकों ने बिना किसी स्वतंत्र बोर्ड निगरानी या कॉरपोरेट गवर्नेंस नियमों की परवाह किए अपने मनमाने वेतन को खुद ही मंजूरी दी।
एक तरफ जहां संस्थान के वास्तविक आधार यानी शिक्षकों और अन्य जमीनी कर्मचारियों को महीनों तक वेतन नहीं दिया जा रहा था या उनके वेतन में लगातार देरी की जा रही थी, वहीं निदेशकों ने प्राथमिकता के आधार पर सबसे पहले खुद को भारी-भरकम भुगतान सुनिश्चित किया। जांच में पाया गया कि दिनेश कुमार गोयल का मासिक वेतन लगभग 56 लाख रुपये था। वहीं दूसरी निदेशक मोनिला गोयल का मासिक वेतन 25 लाख रुपये से अधिक निर्धारित था। पूछताछ के दौरान मोनिला गोयल ने स्वीकार किया कि वह नियमित रूप से कार्यालय तक नहीं जाती थीं और घर पर रहकर ही केवल चेकों पर हस्ताक्षर करती थीं। एजेंसी के मुताबिक, जब एक के बाद एक कोचिंग सेंटर बंद हो रहे थे और छात्र सड़कों पर थे, उस समय भी मोनिला गोयल को नियमित वेतन का भुगतान निर्बाध रूप से जारी रहा।
छापेमारी, संपत्तियों की जब्ती और अदालत में मुकदमा
मामले की गहराई से छानबीन के लिए जांच एजेंसी ने 24 अप्रैल 2025 को दिल्ली-एनसीआर समेत कुल सात ठिकानों पर सघन तलाशी अभियान चलाया था। इस छापेमारी के दौरान एजेंसी ने 10 लाख रुपये नकद और 4.86 करोड़ रुपये मूल्य के कीमती सोने-हीरे के आभूषण बरामद कर जब्त किए थे। इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई करते हुए 9 अक्टूबर 2026 को एजेंसी ने आरोपियों की 66.92 करोड़ रुपये की संपत्तियों को प्रोविजनल तौर पर अटैच किया था। अब 15 अक्टूबर 2026 को गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत में औपचारिक अभियोजन शिकायत दाखिल कर दी गई है, जिसमें अटैच और जब्त की गई कुल 71.88 करोड़ रुपये की संपत्तियों को स्थायी रूप से सरकारी नियंत्रण में जब्त करने तथा दोनों निदेशकों को कानूनी दंड दिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।























