त्योहारी सीजन में रोशनी और सजावट के सामान की मांग कई गुना बढ़ जाती है, और इसी समय को हुनरमंद हाथों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बनाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में दिव्यांग महिला और पुरुष मिलकर सैकड़ों अलग-अलग डिजाइनों में बेहद खूबसूरत मोमबत्तियां तैयार कर रहे हैं। आम तौर पर मोमबत्ती को एक बहुत छोटा और सीमित उत्पाद समझा जाता है, जिसके बाजार में केवल एक या दो साधारण रूप ही दिखाई देते हैं। इस सोच को बदलते हुए यहां प्रशिक्षण ले रहे प्रतिभागी नई तकनीकों के दम पर आकर्षक और आधुनिक मोमबत्तियां गढ़ रहे हैं, ताकि वे आत्मनिर्भर बनकर सम्मान के साथ अपनी आजीविका चला सकें।
दीपावली के पर्व पर डिजाइनर कैंडल्स की बढ़ती मांग
दीपावली का त्योहार करीब आते ही घरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और धार्मिक स्थलों पर मोमबत्तियों और दीपकों की आवश्यकता बड़े पैमाने पर महसूस होती है। इस अवसर को ध्यान में रखते हुए इस कार्यशाला में प्रतिभागियों को कपल्स, फ्लावर्स, बॉल्स और कई अन्य नए और आधुनिक आकारों की कैंडल्स तैयार करना सिखाया जा रहा है। यह कला न केवल स्थानीय दुकानों पर बिक्री के लिए उपयुक्त है, बल्कि इसे इंटरनेट के माध्यम से भी काफी अच्छे दामों पर बेचा जा सकता है। कलात्मक रूप से तैयार इन मोमबत्तियों से होने वाली आय दिव्यांगजनों को आर्थिक संबल देगी और समाज में एक मजबूत स्तम्भ के रूप में स्थापित होने में मदद करेगी।
सस्ते उत्पाद से बड़े मुनाफे का नया नजरिया
कार्यशाला में सीख रहे प्रतिभागियों के लिए यह अनुभव कई भ्रांतियों को दूर करने वाला साबित हुआ है। प्रशिक्षण ले रही प्रतिभागी रहमानी ने इस अनुभव को साझा करते हुए स्पष्ट किया कि पहले वे समझती थीं कि मोमबत्ती केवल एक ही तरह की होती है, लेकिन यहां अपने हाथों से ढेरों डिजाइनों में इसे बनता देखकर उनका नजरिया बदल गया है। उन्हें यह भी लगता था कि मोमबत्ती बेहद सस्ती चीज है, परंतु अब समझ में आ रहा है कि इस काम में बचत और लाभ की बहुत बड़ी संभावनाएं छिपी हुई हैं।
मोम और जेल के जरिए होटल और रेस्तरां के लिए खास उत्पाद
कैंडल निर्माण की तकनीकी बारीकियों पर प्रकाश डालते हुए ट्रेनर कुसुम कश्यप ने बताया कि विभिन्न प्रकार के वैक्स और जेल का उपयोग करके कई तरह के डिजाइन तैयार करने का अभ्यास कराया जा रहा है। उनका कहना है कि इस हुनर को सीखकर कोई भी व्यक्ति अपना स्वतंत्र कारोबार शुरू कर सकता है। ऐसी फैंसी मोमबत्तियों की मांग बड़े गिरजाघरों, होटलों और रेस्टोरेंट में बहुत ज्यादा रहती है, जहां वे काफी ऊंची कीमतों पर बिकती हैं। इस उत्पाद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लंबे समय तक रखे रहने पर भी खराब नहीं होता और व्यापारी को किसी भी तरह के नुकसान का जोखिम नहीं उठाना पड़ता।
शेखपुरा कदीम में स्वरोजगार और ऑनलाइन बिक्री का पाठ
इस पूरे प्रशिक्षण अभियान की व्यवस्था सहारनपुर के शेखपुरा कदीम गांव में की गई है। कार्यक्रम से जुड़े अमित कुमार चौबे ने जानकारी दी कि यह विशेष प्रशिक्षण इनेबल इंडिया के सहयोग से पंजाब नेशनल बैंक ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान द्वारा संचालित किया जा रहा है। इसका प्राथमिक उद्देश्य दिव्यांगजनों को स्वरोजगार से जोड़ना है ताकि वे स्वयं को कभी बेसहारा न महसूस करें। भारत की समृद्ध धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कृति के चलते पूजा-पाठ और उत्सवों में दीपकों और मोमबत्तियों की मांग हमेशा बनी रहती है। कार्यशाला में आए प्रतिभागी अपने घर पर बैठकर ही इन वस्तुओं का निर्माण कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्हें यह भी सिखाया जा रहा है कि इन उत्पादों को विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऑनलाइन कैसे बेचा जाए, ताकि उनका बाजार स्थानीय सीमाओं से बाहर निकल सके।



















