पारंपरिक खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं पर होने वाला लगातार बढ़ता खर्च आज कई किसानों की बड़ी परेशानी बन चुका है। ऐसे दौर में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के मिर्जापुर तिवारी पुरवा गांव के किसान बृजेश कुमार ने एक अलग रास्ता चुनकर दिखाया है। आमतौर पर जहां किसान बेहतर पैदावार की उम्मीद में भारी मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं बृजेश कुमार ने अपने दो बीघे खेत में बिना किसी रासायनिक या जैविक खाद की मदद के हरी-भरी फसल खड़ी कर दी है।
केले और धान की सह-फसली खेती की व्यवस्था
बृजेश कुमार ने अपने खेत में केले और धान की सह-फसली खेती की विशेष तकनीक अपनाई है। इस योजना के तहत पूरे खेत में सुनियोजित कतारें बनाई गई हैं। खेत में एक कतार केले के पौधों की लगाई गई है और उन कतारों के बीच की खाली जमीन पर धान की दो से तीन कतारें रोपी गई हैं। इस तरीके से दोनों फसलें एक ही जमीन पर बिना किसी रुकावट के साथ-साथ विकसित हो रही हैं। वर्तमान में दोनों ही फसलों के पौधे पूरी तरह मजबूत और स्वस्थ नजर आ रहे हैं, जिससे जमीन की जगह और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हुआ है।
नाममात्र के खर्च में लगभग जीरो-कॉस्ट का ढांचा
खाद, रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग पूरी तरह बंद करने से बृजेश कुमार का खेती पर होने वाला बड़ा खर्च बच गया है। इस पूरे प्रयास में उनकी जेब से सिर्फ बुनियादी चीजों पर ही नाममात्र का खर्च हुआ। उन्होंने धान के बीज पर ₹600 खर्च किए, जबकि धान की रोपाई कराने में ₹1,500 की मजदूरी लगी। इस प्रकार दो बीघे जमीन पर फसल तैयार करने में उनका कुल खर्च मात्र ₹2,000 से ₹3,000 के बीच आया है। यह आंकड़ा आज की सामान्य खेती की तुलना में बेहद कम है और शून्य लागत खेती का व्यावहारिक उदाहरण पेश करता है।
कृषि अधिकारियों की सलाह और विचार की शुरुआत
इस अनोखे प्रयोग की शुरुआत कैसे हुई, इस पर किसान बृजेश कुमार बताते हैं कि जब कृषि अधिकारी गांव में आकर किसानों को जैविक खेती करने की सीख देते थे, तब उनके दिमाग में एक नया सवाल उठा। उन्होंने सोचा कि यदि खेत में रासायनिक या जैविक किसी भी प्रकार का बाहरी पोषण न डाला जाए, तब फसल का क्या परिणाम होगा। इसी जिज्ञासा और सोच के आधार पर उन्होंने यह कदम उठाया।
बृजेश कुमार का कहना है कि अत्यधिक रासायनिक खादों से तैयार होने वाली फसलों की तुलना में थोड़ा अंतर जरूर नजर आता है, लेकिन जितनी कम लागत इसमें लगी है, उसे देखते हुए पैदावार के नतीजे बेहद संतोषजनक और उत्साहवर्धक हैं। बिना किसी जहरीले रसायन के की जा रही इस खेती की चर्चा अब पूरे इलाके में हो रही है। किसान का मानना है कि फसल पकने पर यह तरीका उन्हें निश्चित तौर पर अच्छा मुनाफा देकर जाएगा।



















