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पूर्वांचल में बढ़ी मुर्रा भैंस की धाक, प्रतिदिन 35 लीटर दूध और लाखों की कमाई से बन रही पशुपालकों की तकदीरउत्तर प्रदेश
21 सित॰ 2026, 8:45 am (2 घंटे पहले)· 0

पूर्वांचल में बढ़ी मुर्रा भैंस की धाक, प्रतिदिन 35 लीटर दूध और लाखों की कमाई से बन रही पशुपालकों की तकदीर

वाराणसी और पूर्वांचल के जिलों में मुर्रा नस्ल की भैंस पशुपालकों के लिए भारी मुनाफे का जरिया बन रही है, जहां यह रोजाना 35 लीटर तक दूध देकर मोटी कमाई करा रही है।

डेयरी व्यवसाय और पशुपालन के क्षेत्र में उच्च दुग्ध उत्पादन वाली नस्लों को लेकर पशुपालकों का नजरिया तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक पशुपालन की जगह अब ऐसी उन्नत किस्मों पर ध्यान दिया जा रहा है जो सामान्य मवेशियों की तुलना में कहीं अधिक दुग्ध उत्पादन क्षमता रखती हैं। इसी कड़ी में मुर्रा नस्ल की भैंस किसानों और पशुपालकों के बीच समृद्धि का प्रतीक बनकर उभर रही है। अधिक दूध देने और संतानों की भारी बाजार मांग के कारण इसे कई राज्यों में काला सोना भी कहा जाता है। वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल के विभिन्न जनपदों में इस प्रजाति को पालने का चलन काफी तेजी से बढ़ रहा है।

पंजाब की प्रमुख पहचान अब अन्य राज्यों में भी लोकप्रिय

भौगोलिक दृष्टि से मुर्रा भैंस मूल रूप से पंजाब में पाई जाने वाली एक अत्यंत प्रमुख और विख्यात प्रजाति है। हालांकि अब यह केवल अपने मूल क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों सहित देश के कई अन्य राज्यों में भी पशुपालक अपनी आय बढ़ाने के उद्देश्य से इसका पालन कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अकेली भैंस दो सामान्य भैंसों के बराबर दुग्ध उत्पादन करने में सक्षम है। यही वजह है कि इसे पालकर किसान अपनी दैनिक और मासिक कमाई में भारी इजाफा कर पा रहे हैं।

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प्रतिदिन 35 लीटर तक उत्पादन और संतानों की लाखों में कीमत

पशुपालक गुड्डू आजमगढ़ी के अनुसार उनके डेरे पर सैकड़ों गाय और भैंसें मौजूद हैं, लेकिन उनमें मुर्रा भैंस की क्षमता सबसे असाधारण है। यह भैंस सुबह और शाम दोनों वक्त मिलाकर लगभग 16 से 18 लीटर तक दूध उपलब्ध कराती है, जिससे 24 घंटे के भीतर इसका कुल दुग्ध उत्पादन 35 लीटर तक पहुंच जाता है। यह उत्पादन स्तर सामान्य मवेशियों की तुलना में लगभग दोगुना बैठता है। देखभाल के स्तर पर इसे अन्य भैंसों की भांति ही सामान्य रखरखाव की जरूरत होती है, बशर्ते समय पर संतुलित आहार और पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जाए। उचित देखरेख मिलने पर यह भीषण गर्मी के मौसम में भी भारी मात्रा में दूध देती है।

दूध के अतिरिक्त मुर्रा नस्ल की संतानों की बाजार में भारी मांग और कीमत देखने को मिलती है। गुड्डू आजमगढ़ी ने जानकारी दी कि उनकी इस भैंस ने अब तक दो बच्चों को जन्म दिया है। बाजार में मुर्रा भैंस की कटिया अथवा पाड़ी की शुरुआती कीमत लगभग ढाई लाख रुपये के आसपास होती है, जबकि कई मौकों पर पशुपालकों को इससे भी अधिक रकम हासिल हो जाती है। भारी मात्रा में गुणवत्तापूर्ण दूध देने की क्षमता के चलते ही इसे दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट नस्ल का दर्जा हासिल है।

प्रतियोगिताओं में जीतीं कई ट्रॉफियां और ढाई लाख का नकद इनाम

यह विशेष मुर्रा भैंस अपनी शारीरिक बनावट और दुग्ध क्षमता के दम पर विभिन्न राज्यों में आयोजित पशु मेलों और प्रतियोगिताओं में कई प्रतिष्ठित ट्रॉफियां भी जीत चुकी है। हाल ही में वाराणसी के भीतर आयोजित ‘रंगीलो’ मेले में इसने दुग्ध प्रतियोगिता के दौरान पहला स्थान हासिल किया और ढाई लाख रुपये का नकद पुरस्कार अपने नाम किया। प्रतियोगिता स्थल तक पहुंचने के लंबे सफर और थकान के बावजूद इस भैंस ने वहां 30 लीटर दूध दिया, जबकि सामान्य और शांत दिनों में इसका दैनिक उत्पादन 35 से 36 लीटर तक दर्ज किया जाता है।

सवाल-जवाब

मुर्रा नस्ल की भैंस 24 घंटे में कितना दूध देती है?
पशुपालक गुड्डू आजमगढ़ी की मुर्रा भैंस 24 घंटे में कुल मिलाकर 35 लीटर तक दूध देती है, जिसमें सुबह और शाम 16 से 18 लीटर उत्पादन शामिल है।
मुर्रा भैंस के बच्चे यानी पाड़ी की शुरुआती बाजार कीमत क्या है?
मुर्रा भैंस के बच्चे की शुरुआती बाजार कीमत लगभग ढाई लाख रुपये होती है, जो गुणवत्ता के आधार पर और अधिक भी हो सकती है।
मूल रूप से मुर्रा भैंस किस राज्य की नस्ल मानी जाती है?
मुर्रा भैंस मूल रूप से पंजाब में पाई जाने वाली भैंस की एक प्रमुख और विख्यात प्रजाति है।
वाराणसी के 'रंगीलो' मेले में इस भैंस ने कितना पुरस्कार जीता?
वाराणसी में आयोजित 'रंगीलो' मेले में इस मुर्रा भैंस ने दुग्ध प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल कर ढाई लाख रुपये का नकद पुरस्कार जीता।
मुर्रा भैंस को 'काला सोना' क्यों कहा जाता है?
यह भैंस अकेले दो सामान्य भैंसों के बराबर दूध देती है और इसकी संतानों की भारी कीमत मिलती है, जिससे मोटी कमाई होने के कारण इसे काला सोना कहा जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Aisha Khan@aisha-khan·29 मिनट पहले

यह खबर दर्शाती है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक पशुपालन अब केवल जीवनयापन का साधन नहीं रहे, बल्कि एक उच्च-लाभकारी व्यावसायिक मॉडल में बदल रहे हैं। जिस तरह पंजाब की मुर्रा नस्ल पूर्वांचल में 35 लीटर दूध और लाखों की बिक्री के साथ 'काला सोना' साबित हो रही है, उससे कृषि-पत्रकारिता में एक नया ट्रेंड जुड़ गया है। यह शहरी पाठकों के बीच भी ग्रामीण उद्यमिता, पशु मेलों के बढ़ते क्रेज और कृषि-मनोरंजन जैसे पॉप कल्चर विषयों को बढ़ावा देने का एक बेहतरीन एंगल है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·51 मिनट पहले

यह खबर दर्शाती है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन अब केवल जीवनयापन का साधन नहीं, बल्कि व्यावसायिक आय का एक बड़ा जरिया बन रहा है। पूर्वांचल में मुर्रा नस्ल का प्रसार इस बात का संकेत है कि किसान अब पारंपरिक तरीकों से हटकर उच्च उत्पादकता वाली नस्लों को अपना रहे हैं। सरकारी नीतियों और ऋण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से इस तरह के सफल मॉडल ग्रामीण रोजगार और आय को तेजी से बढ़ावा दे सकते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·51 मिनट पहले

यह आर्थिक बदलाव इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण भारत में कृषि आधारित उद्यम अब उच्च मूल्य वाली संपत्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। जिस प्रकार मुर्रा नस्ल के पशु और उनकी संतति लाखों के मूल्यांकन तक पहुँच रही है, उससे स्पष्ट है कि यह क्षेत्र अब अनौपचारिक खेती से निकलकर एक संगठित कमर्शियल डेयरी इकॉनमी में तब्दील हो रहा है, जो निवेशकों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए नए वित्तीय अवसर पैदा कर रहा है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

पूर्वांचल में मुर्रा नस्ल के प्रसार से डेयरी व्यवसाय की आर्थिकी तो मजबूत हो रही है, लेकिन इसके साथ पशु चोरी और नकली नस्ल बेचने के संगठित अपराधों का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। महंगे पशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस प्रशासन और पशुपालन विभाग को विशेष निगरानी तंत्र विकसित करना होगा, अन्यथा यह आर्थिक संपन्नता अपराधियों के निशाने पर आ सकती है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

पूर्वांचल में मुर्रा नस्ल के प्रसार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती तो मिल रही है, लेकिन इसके साथ ही पशुधन से जुड़े संगठित अपराधों और पुलिस प्रशासन के लिए नई चुनौतियों का अंदेशा भी बढ़ गया है। यदि समय रहते सुरक्षा और निगरानी का पुख्ता तंत्र नहीं बनाया गया, तो किसानों की यह बढ़ती समृद्धि अपराधियों के निशाने पर आ सकती है।

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