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निजी सुरक्षा के नाम पर पड़ोसियों की जासूसी नहीं कर सकते कैमरे, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय की सीमाउत्तर प्रदेश
3 नव॰ 2026, 12:26 am (5 मिनट पहले)· 0

निजी सुरक्षा के नाम पर पड़ोसियों की जासूसी नहीं कर सकते कैमरे, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय की सीमा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि घर की रखवाली के लिए लगाए गए कैमरे पड़ोसियों के निजी जीवन में दखल नहीं दे सकते। कोर्ट ने विवादित कैमरे पर जिलाधिकारी को एक महीने में फैसला करने का निर्देश दिया है।

घरों की हिफाजत के लिए सर्विलांस तकनीक अपनाना आम बात हो चुका है, लेकिन सुरक्षा का यही इंतजाम जब पड़ोसियों की दैनिक गतिविधियों पर नजर रखने लगे तो कानूनी पचड़ा खड़ा हो जाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रिहायशी इलाकों में लगने वाले निगरानी कैमरों को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत के अनुसार कोई भी नागरिक सुरक्षा की आड़ में अपने पड़ोस में रहने वालों की व्यक्तिगत जिंदगी या आने जाने की आजादी पर नजर रखने का अधिकार नहीं रखता।

प्राइवेसी के उल्लंघन पर अदालत का कड़ा रुख

जस्टिस अजित कुमार तथा जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने इस कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए साफ किया कि निगरानी उपकरण लगाने की स्वतंत्रता असीमित नहीं है। पीठ ने रेखांकित किया कि कानून किसी को भी अपने पड़ोसियों के निजी दायरे में तांकझांक करने की इजाजत नहीं देता। अपने 26 अक्टूबर के न्यायिक आदेश में खंडपीठ ने स्पष्ट व्यवस्था देते हुए कहा,

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"हमारे विचार से कोई भी निजी सीसीटीवी कैमरा इस तरह नहीं लगाया जा सकता कि उससे पड़ोसी की निजता का हनन हो।"

रास्ते पर नजर रखने से जुड़ा था विवाद

यह मामला योगेंद्र मौर्य की तरफ से दाखिल की गई एक रिट याचिका के जरिए अदालत की चौखट तक पहुंचा था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनके पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति ने अपने निगरानी कैमरों का रुख इस तरह तय कर रखा है जिससे मौर्य के आवास का मुख्य आवागमन मार्ग सीधे लेंस के दायरे में आ गया है।

याचिका में विस्तार से दलील दी गई थी कि इस अनुचित निगरानी की वजह से घर के सदस्यों के अलावा वहां पहुंचने वाले अतिथियों की हर हलचल रिकॉर्ड हो रही थी। याचिकाकर्ता ने इस स्थिति को बुनियादी प्राइवेसी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों पर सीधा हमला करार दिया था।

कैमरे की दिशा पर एक माह में सुनवाई का आदेश

मामले में दोनों पक्षों का पक्ष सुनने के बाद खंडपीठ ने सीधे तौर पर उपकरण उतारने या उसका रुख बदलने का फरमान जारी नहीं किया। इसके बदले अदालत ने एक व्यावहारिक प्रशासनिक रास्ता सुझाया। पीठ ने याचिकाकर्ता को संबंधित जिले के जिलाधिकारी के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराने को कहा है।

अदालत ने प्रशासनिक तंत्र को समयबद्ध कार्रवाई की हिदायत देते हुए जिलाधिकारी को निर्देशित किया है कि जैसे ही आवेदन प्राप्त हो, उसके ठीक एक महीने की समयसीमा के भीतर दोनों पक्षों की जांच कर अंतिम निर्णय लिया जाए। इस आदेश से साफ हो गया है कि सुरक्षा के लिए उपकरण लगाते समय दिशा का ध्यान रखना अनिवार्य है।

सवाल-जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निजी कैमरों को लेकर क्या फैसला दिया?
अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी निजी निगरानी कैमरा इस प्रकार नहीं लगाया जा सकता जिससे पड़ोसी के निजी जीवन और प्राइवेसी का हनन हो।
यह मामला किस याचिकाकर्ता द्वारा अदालत में लाया गया था?
यह याचिका योगेंद्र मौर्य ने दायर की थी, जिन्होंने अपने पड़ोसी द्वारा लगाए गए कैमरे के कोण और निगरानी के तरीके को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत क्या थी?
शिकायत में कहा गया था कि पड़ोसी का कैमरा उनके आने-जाने के मुख्य रास्ते पर नजर रखता है, जिससे परिवार और मेहमानों की निजता बाधित हो रही थी।
हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी को क्या निर्देश जारी किया है?
कोर्ट ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता का आवेदन मिलने के एक महीने के अंदर मामले की जांच कर उचित निर्णय लें।
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