उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और आसपास के पूर्वांचल इलाके में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का स्वरूप भी अब पूरी तरह से आधुनिक हो रहा है। इस क्षेत्र के मवेशी पालक पुरानी और रूढ़िवादी पद्धतियों से बाहर निकलकर पशुपालन के लिए विज्ञान आधारित व्यावसायिक दृष्टिकोण को अपना रहे हैं। इस परिवर्तन का सबसे बड़ा लक्ष्य दूध की पैदावार को अत्यधिक बढ़ाना तथा आने वाले कल के वास्ते बेहतरीन जेनेटिक्स वाले मवेशी विकसित करना है। इस पूरी प्रक्रिया में 'सेक्स सीमन' तकनीक एक बड़े गेम-चेंजर के रूप में सामने आई है। इस नई व्यवस्था ने न केवल क्षेत्रीय डेयरी उद्योग को एक पेशेवर दिशा दी है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में किसानों की आमदनी बढ़ाने का भी एक ठोस रास्ता तैयार किया है।
बछिया के जन्म की 90 प्रतिशत तक गारंटी
डेयरी उद्योग की पूरी बुनियाद मादा पशुओं पर टिकी होती है, क्योंकि वही आगे चलकर दूध का उत्पादन करती हैं। गोरखपुर के पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. शिवकुमार वर्मा समझाते हैं कि साधारण कृत्रिम गर्भाधान प्रक्रिया में जन्म लेने वाला बछड़ा नर होगा या मादा, इसकी संभावना आधी-आधी रहती है। लेकिन सेक्स सीमन के उपयोग से यह अनिश्चितता काफी हद तक खत्म हो जाती है। डॉ. वर्मा के अनुसार, इस आधुनिक विधि का इस्तेमाल करने पर लगभग 85 से 90 प्रतिशत मामलों में केवल मादा (बछिया) ही पैदा होती है।
मादा पशुओं की यह सुनिश्चितता किसानों को अनावश्यक खर्चों से बचाती है। पारंपरिक तरीके में, अगर नर बछड़ा पैदा होता है, तो उसका पालन-पोषण डेयरी के लिए घाटे का सौदा साबित होता है, क्योंकि वह दूध नहीं देता और खेती में अब ट्रैक्टरों के आ जाने से बैलों का उपयोग लगभग खत्म हो गया है। यही सबसे बड़ी वजह है कि आज भारी तादाद में पशुपालक इस तकनीक को अपने फार्म पर लागू कर रहे हैं।
नस्ल के अनुसार विशेष जेनेटिक सुधार
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मादा पैदा होना ही काफी नहीं है, बल्कि नस्ल का चयन भी उत्पादन तय करता है। डॉ. वर्मा रेखांकित करते हैं कि गोरखपुर क्षेत्र के पशुपालक आजकल जर्सी, थारपारकर, होल्स्टीन फ्रिजियन (एचएफ), हरियाणा के साथ-साथ साहीवाल और गिर प्रजाति की गायों को पालने में अधिक रुचि दिखा रहे हैं। इनमें से साहीवाल और गिर अपनी बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता, दूध देने की अच्छी खासी ताकत और भीषण गर्मी बर्दाश्त करने के लिए पहचानी जाती हैं। वहीं, जर्सी तथा एचएफ प्रजातियां भारी मात्रा में दूध देने के लिए वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हैं। भैंस पालने वालों की बात करें तो मुर्रा, जाफराबादी और भदावरी नस्लें उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई हैं।
इन सभी पशुओं के लिए उनकी विशिष्ट जेनेटिक वंशावली के आधार पर ही वर्गीकृत वीर्य मुहैया कराया जाता है। डॉ. वर्मा ने एक सटीक उदाहरण देते हुए बताया कि यदि कोई किसान अपनी एचएफ प्रजाति की गाय से अधिक दूध देने वाली बछिया प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अनिवार्य रूप से उसी नस्ल के सर्वोत्तम सांड वाला सीमन चुनना होगा। इसी तर्ज पर मुर्रा भैंस, साहीवाल या गिर गाय के लिए भी उनके अपने खास जेनेटिक सीमन स्ट्रॉ बाजार में मौजूद हैं। इस सावधानी भरे कदम से जानवरों की असली वंशावली सुरक्षित रहती है और आने वाली पीढ़ियों के भीतर दुग्ध देने की क्षमता में निरंतर सुधार देखा जाता है।
सफलता के लिए जरूरी सावधानियां और प्रबंधन
डॉ. वर्मा ने स्पष्ट किया है कि वर्गीकृत वीर्य का प्रयोग हर स्थिति में सफल नहीं होता। इसका उपयोग पूरी तरह से निरोगी और सटीक समय पर 'हीट' (प्रजनन चक्र) में आने वाली गाय या भैंस पर ही किया जाना चाहिए। साथ ही, गर्भाधान की यह पूरी प्रक्रिया किसी मान्यता प्राप्त पशु चिकित्सक अथवा अनुभवी पैरावेट की सख्त निगरानी में ही संपन्न होनी चाहिए।
पशु के गर्भधारण करने की दर को शत-प्रतिशत करने के लिए कई अन्य पहलुओं पर भी गौर करना आवश्यक है। किसानों को अपने जानवरों को एक अत्यधिक संतुलित आहार देना होता है। इसके अतिरिक्त, समय पर जरूरी वैक्सीन लगवाना और पशु बाड़े में स्वच्छता बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है। जब पशुपालक उन्नत प्रजनन विज्ञान को एक बेहतरीन फॉर्म प्रबंधन के साथ जोड़ देते हैं, तब वे कम मवेशी रखकर भी दूध की जबरदस्त पैदावार हासिल कर सकते हैं। यही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से आजकल गोरखपुर के ढेरों डेयरी मालिक विज्ञान आधारित तरीकों का उपयोग करके अपने खानदानी पेशे को एक बेहद मुनाफे वाले कारोबार में बदल रहे हैं।


















