लखनऊ से आ रही सियासी हलचल ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर तस्वीर साफ करनी शुरू कर दी है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों के तालमेल पर चल रही बातचीत में 2017 के विधानसभा चुनाव वाला पुराना फॉर्मूला फिर से सामने आ रहा है, जिसके तहत कांग्रेस को 115 से 125 सीटें मिलने की चर्चा है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और प्रदेश के कई नेताओं के बीच हुई बैठक के बाद यह संकेत मिला है कि इंडिया गठबंधन इस बार एकजुट होकर ही भारतीय जनता पार्टी को टक्कर देने के मूड में है। लेकिन जैसे ही यह संभावित फॉर्मूला चर्चा में आया, सियासी हलकों में सवाल उठने लगा कि 2017 के नाकाम प्रयोग को दोहराना विपक्ष के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा, या फिर बीजेपी ने इसकी काट पहले से तैयार कर रखी है।
गठबंधन के पीछे का गणित
अगर सपा और कांग्रेस 2017 वाले फॉर्मूले पर साथ चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं, तो प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर मुकाबला सीधे एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच बंट सकता है। अखिलेश यादव अपने पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक यानी पीडीए कार्ड के सहारे मैदान में उतरेंगे, जबकि राहुल गांधी संविधान बचाओ अभियान की अपनी मुहिम को आगे बढ़ाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि यही दोनों नैरेटिव मिलकर 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष को फायदा पहुंचा चुके हैं, और यही वजह है कि इंडिया गठबंधन इस कामयाबी को 2027 तक बनाए रखने की कोशिश में जुटा है।
2017 का दांव, कितना कारगर
हालांकि 2017 के अनुभव को देखें तो तस्वीर पूरी तरह गुलाबी नहीं थी। उस चुनाव में सपा और कांग्रेस साथ लड़े थे, लेकिन सपा का वोट पूरी तरह कांग्रेस को और कांग्रेस का वोट पूरी तरह सपा को ट्रांसफर नहीं हो सका था। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच सीटों की अदला-बदली और टिकट को लेकर खींचतान भी बड़ी दिक्कत बनी थी। ऐसे में अगर यह फॉर्मूला दोबारा लागू होता है, तो दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि कार्यकर्ताओं के बीच का असंतोष कैसे शांत किया जाए और वोटों की अदला-बदली को हकीकत में कैसे बदला जाए।
बीजेपी की काट, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का नारा
विपक्ष की इस संभावित गोलबंदी की भनक लगते ही भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने 2027 में जीत की हैट्रिक लगाने के लिए कई स्तर पर योजना बनाई है। विपक्ष के जातीय और अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण का जवाब देने के लिए बीजेपी राष्ट्रवाद और व्यापक हिंदू एकजुटता के नारे को और तेज करेगी। इसके साथ ही पार्टी राशन वितरण, किसान सम्मान निधि, आवास योजना और बुलडोजर मॉडल के नाम से मशहूर कानून-व्यवस्था के मुद्दों को भुनाकर अपने साइलेंट वोटर खासकर महिला मतदाताओं को साधे रखने के लिए बड़ा अभियान चलाने की तैयारी में है।
ब्राह्मण और गैर-यादव ओबीसी वोटों पर बीजेपी का फोकस
सपा के सामाजिक आधार में सेंध लगाने के लिए बीजेपी ने संगठन स्तर पर बदलाव और पद आवंटन की कवायद पहले ही शुरू कर दी है। पार्टी की नजर राज्य के ब्राह्मण, कुर्मी, मौर्य, निषाद और गैर-जाटव दलित मतदाताओं पर है। राम मंदिर के पहले सीईओ के तौर पर जितेंद्र मिश्र की नियुक्ति हो या फिर दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का उपराज्यपाल बनाने का फैसला, बीजेपी इन दोनों फैसलों को सामाजिक संदेश के तौर पर जमकर भुनाएगी। साथ ही पार्टी 2017 के उस दौर की याद दिलाने से भी नहीं चूकेगी, जब जनता ने अखिलेश-राहुल की जोड़ी को सिरे से नकार दिया था। बीजेपी का प्रचार यही रहेगा कि कांग्रेस अपने वजूद को बचाए रखने के लिए सपा की बैसाखी का सहारा ले रही है।
कैडर की ताकत और 2029 पर असर
कुल मिलाकर बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार उसका मजबूत कैडर है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी के मुकाबले बीजेपी हर बूथ पर अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की जमीनी रणनीति पर काम कर रही है। यही वजह है कि 2027 का यूपी चुनाव सिर्फ एक राज्य के नतीजे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर 2029 की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में भी दिखेगा। अगर सपा और कांग्रेस 2017 वाले फॉर्मूले पर आगे बढ़ते हैं, तो देखने वाली बात यह होगी कि वे अपने कार्यकर्ताओं के बीच के मतभेद कैसे सुलझाते हैं। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी की रणनीति एकदम साफ है, विपक्ष की हर चाल का जवाब संगठन की ताकत, लाभार्थी योजनाओं और हिंदुत्व के मेल से देना।


















