उत्तर प्रदेश के सहारनपुर शहर के बीचोंबीच बहने वाली पौराणिक पांवधोई नदी कभी पूरे इलाके की जीवनरेखा मानी जाती थी। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पहले तपोभूमि रहे इस क्षेत्र में तपस्वियों की भक्ति से प्रसन्न होकर गंगा की यह पवित्र जलधारा सीधे जमीन से प्रकट हुई थी। यह पावन धारा शहर के कई प्राचीन शिव मंदिरों के चरणों को पखारते हुए आगे बढ़ती थी, जहां श्रद्धालु स्नान और पूजन के लिए जुटते थे। हालांकि समय के साथ संरक्षण के अभाव और लगातार गिरती गंदगी के कारण आज यह ऐतिहासिक नदी एक संकरे और बदबूदार नाले जैसी स्थिति में पहुंच चुकी है।
तपस्या और आस्था से जुड़ी है पांवधोई की उत्पत्ति
इस जलधारा का इतिहास गहन तपस्या और धार्मिक सद्भाव से गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यताओं के अनुसार, गंगा के अनन्य भक्त बाबा लालदास ने इस क्षेत्र में सैकड़ों वर्षों तक कठोर तप साधना की थी। वह हर सुबह गंगा स्नान के लिए हरिद्वार जाया करते थे। उनके परम मित्र हाजी शाह कमाल थे, जिनकी मजार आज भी बाबा लालदास के बाड़े के समीप स्थित है। मान्यता है कि बाबा लालदास की निश्छल भक्ति और कठोर साधना से प्रसन्न होकर मां गंगा स्वयं सहारनपुर की धरती से प्रकट हुईं। सहारनपुर शहर से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित सकलापुरी गांव में आज भी इस नदी का मूल जल स्रोत जमीन से प्राकृतिक रूप से फूटता दिखाई देता है।
सकलेश्वर महादेव से लेकर ढमोला संगम तक का धार्मिक मार्ग
सकलापुरी में धरती से फूटने के बाद यह पवित्र धारा सबसे पहले वहां स्थित सकलेश्वर महादेव के चरणों को स्पर्श करती है। इसके बाद जलधारा आगे बढ़कर बाबा लालदास घाट पर बने शिवालय के चरणों को पखारती है। अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए यह नदी भूतेश्वर मंदिर, पुल खुमरान और दाल मंडी पुल पर स्थापित भगवान शिव के मंदिरों से होकर गुजरती है। धार्मिक दृष्टि से यह पूरा मार्ग बेहद पूजनीय माना जाता है, क्योंकि पूरी यात्रा के दौरान यह नदी केवल और केवल देवाधिदेव महादेव के मंदिरों और उनके चरणों को छूते हुए आगे बढ़ती है। इसके बाद यह धारा आगे जाकर पास के एक गांव से निकलने वाली ढमोला नदी में विलीन हो जाती है, जो बाद में हिंडन नदी का मुख्य हिस्सा बन जाती है।
घाटों पर जुटते थे श्रद्धालु, लगते थे बैसाखी और छठ के बड़े मेले
साहित्यकार डॉक्टर वीरेंद्र आज़म बताते हैं कि इस नदी का प्राचीन और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। पूर्व में बाबा लालदास आश्रम और दाल मंडी पुल के पास पक्के घाटों पर पानी में उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं, जो आज भी मौजूद हैं। इन घाटों पर दशहरे, बैसाखी और छठ पूजा जैसे प्रमुख पर्वों के अवसर पर भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते थे और विशाल मेलों का आयोजन होता था। स्थानीय नागरिक और दूरदराज से आने वाले भक्त इन सीढ़ियों पर पवित्र स्नान करते थे और तट पर बने शिवालयों में जल चढ़ाकर पूजा-अर्चना करते थे।
करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नाले में तब्दील हुई जीवनरेखा
सहारनपुर की जीवनरेखा कही जाने वाली यह ऐतिहासिक नदी अब गंभीर उपेक्षा का शिकार हो चुकी है। नदी के जीर्णोद्धार और इसे स्वच्छ बनाने के नाम पर सरकारी स्तर पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, परंतु जमीनी हालात में कोई सुधार नहीं दिखा। वर्तमान में नदी के उद्गम स्रोत से मिलने वाला प्राकृतिक स्वच्छ जल बेहद कम हो गया है, जबकि आसपास की घनी बस्तियों और घरों से निकलने वाला गंदा पानी भारी मात्रा में इसमें सीधे बहाया जा रहा है। जिस पावन जलधारा में कभी लोग आस्था की डुबकी लगाते थे, वह अब प्रशासनिक उदासीनता और शहरी अपशिष्ट के कारण केवल एक बदबूदार गंदा नाला बनकर सिमट गई है।



















