उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान जो भयानक हिंसा हुई थी, उसकी गहराई से जांच करने वाले न्यायिक आयोग ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट राज्य कैबिनेट के सामने पेश कर दी है. लगभग 450 पन्नों का यह भारी-भरकम दस्तावेज मंगलवार को सरकार के सामने रखा गया. प्राप्त जानकारी के अनुसार, आयोग ने पिछले साल अगस्त के महीने में ही अपने सभी निष्कर्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंप दिए थे. अब राज्य सरकार ने इस संवेदनशील रिपोर्ट को विधानसभा के आगामी मानसून सत्र के दौरान पटल पर रखने की पूरी तैयारी कर ली है. इस रिपोर्ट में न केवल हिंसा के तात्कालिक कारणों का जिक्र है, बल्कि शहर की बदलती सामाजिक संरचना और पुराने विवादों की एक लंबी कहानी भी विस्तार से बताई गई है.
सियासी बयानबाजी और दो गुटों की लड़ाई
जांच आयोग के दस्तावेजों में साफ तौर पर बताया गया है कि नवंबर महीने में भड़की उस हिंसा की सबसे अहम वजह समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क का एक भड़काऊ बयान था. आयोग ने अपनी जांच में पाया कि 22 नवंबर 2024 को सांसद ने सार्वजनिक मंच से कहा था कि उनका समुदाय इस देश का मालिक है, कोई नौकर या गुलाम नहीं. रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि इस बयान ने आग में घी का काम किया और शहर का माहौल रातों-रात बिगड़ गया. सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि यह तनाव केवल दो अलग-अलग धर्मों के बीच नहीं था. सांसद के बयान के बाद स्थानीय पठान और तुर्क समुदाय के बीच वर्चस्व की एक पुरानी लड़ाई अचानक तेज हो गई. इसी आपसी खींचतान और तनाव के बीच जो अंधाधुंध फायरिंग हुई, उसमें चार लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी.
जनसंख्या के आंकड़ों में भारी उलटफेर
इस 450 पन्नों की रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा संभल नगर पालिका क्षेत्र की डेमोग्राफी यानी जनसंख्या के बदलते स्वरूप पर केंद्रित है. जांच दल ने दावा किया है कि आजादी के समय शहर में हिंदुओं की आबादी लगभग 45 प्रतिशत हुआ करती थी. लेकिन आज के समय में यह आंकड़ा बुरी तरह गिरकर मात्र 15 प्रतिशत के आसपास रह गया है. न्यायिक आयोग ने इतनी बड़ी गिरावट के पीछे कई गंभीर कारण गिनाए हैं. रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि दशकों तक शहर में हुए दंगों, लगातार होने वाली हिंसा, धर्मांतरण के मामलों और लोगों के पलायन के कारण यह भारी बदलाव देखने को मिला. आबादी के इस गिरते ग्राफ ने शहर में होने वाले विवादों की पूरी प्रकृति को ही बदल कर रख दिया है.
विवादों का बदलता स्वरूप
आयोग ने शहर में होने वाले टकरावों को जनसंख्या के हिसाब से दो अलग-अलग चरणों में बांटा है. रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जब तक शहर में हिंदुओं की आबादी 40 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई थी, तब तक दंगों, लव जिहाद और जबरन धर्मांतरण जैसी साजिशों के जरिए मुख्य रूप से उन्हें ही निशाना बनाया जाता रहा. लेकिन जैसे ही यह आबादी घटकर 20 प्रतिशत के नीचे आ गई, टकराव का पूरा पैटर्न बदल गया. हिंदुओं की संख्या कम होने के बाद इलाके में दबदबे की जंग मुख्य रूप से पठान और तुर्क समुदाय के बीच शुरू हो गई. पिछले काफी समय से शहर में इन्हीं दोनों गुटों के बीच एक अघोषित तनाव बना हुआ है, जिसने 24 नवंबर की घटना में एक हिंसक रूप ले लिया.
आठ दशकों के खूनी इतिहास का कच्चा चिट्ठा
वर्तमान हालात को बेहतर ढंग से समझने के लिए, इस रिपोर्ट में साल 1936 से लेकर 2019 तक के सभी पुराने दंगों का पूरा रिकॉर्ड भी शामिल किया गया है. इन 83 सालों के इतिहास में शहर ने कुल 15 बड़े सांप्रदायिक दंगे झेले हैं, जिनमें कुल 213 लोगों की जान गई. इन मौतों का जो आंकड़ा रिपोर्ट में दिया गया है, वह काफी चौंकाने वाला है. मारे गए 213 लोगों में से 209 मृतक हिंदू समुदाय से थे. वहीं इन सभी 15 दंगों में कुल मिलाकर सिर्फ चार मुस्लिमों की जान गई, जिनमें से दो की मौत 1992 के दौरान और अन्य दो की जान 2019 की घटनाओं में गई थी. आयोग ने विशेष तौर पर 29 मार्च 1978 को होली के त्यौहार के ठीक बाद हुई एक भयानक हिंसा का जिक्र किया है, जिसमें अकेले 184 हिंदुओं को मार दिया गया था.
धार्मिक स्थलों पर अवैध कब्जा और विदेशी साजिश
इतिहास के पन्नों को खंगालने के साथ-साथ, जांच दल ने शहर की ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों की स्थिति का भी जायजा लिया. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि समय बीतने के साथ शहर के 68 महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों और 19 पावन कुओं पर पूरी तरह से अवैध अतिक्रमण कर लिया गया है. इसके अलावा, हालिया हिंसा के तारों को विदेशी ताकतों से भी जोड़ा गया है. आयोग ने शारिक साठा नाम के एक कुख्यात गैंगस्टर का खास तौर पर उल्लेख किया है. जांच में पाया गया कि इस अपराधी के संबंध सीधे तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़े एक जाली नोट गिरोह के साथ रहे हैं. विदेशी कनेक्शन के इस दावे को तब और मजबूती मिली जब हिंसा शांत होने के बाद पुलिस की तलाशी अभियान में कई हथियार बरामद हुए. इनमें से एक विदेशी पिस्टल ऐसी भी थी जिस पर स्पष्ट अक्षरों में 'मेड इन यूएसए' लिखा हुआ था.
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल
एक विदेशी 'मेड इन यूएसए' हथियार की बरामदगी और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के साथ सीधे संपर्क के खुलासे ने इस पूरी घटना को एक साधारण कानून-व्यवस्था के मुद्दे से निकालकर राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में ला खड़ा किया है. अब पुलिस और जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस पूरे नेटवर्क को बेनकाब करने की है, जिसके जरिए इतने खतरनाक विदेशी हथियार जिले की सीमाओं के भीतर पहुंचे और उपद्रवियों के हाथों तक जा पहुंचे. इसके साथ ही, 68 धार्मिक स्थलों और 19 ऐतिहासिक कुओं पर हुए सुनियोजित कब्जे ने पिछले कई दशकों के प्रशासनिक कामकाज और स्थानीय अधिकारियों की भूमिका पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं. जैसे ही उत्तर प्रदेश सरकार इन 450 पन्नों के अहम दस्तावेज को विधानसभा में पेश करेगी, सदन के भीतर तीखी बहस होना तय है. जहां एक ओर विपक्षी दल 1936 से लेकर अब तक के आंकड़ों और जांच के तरीकों पर कड़े सवाल उठाएंगे, वहीं सत्तारूढ़ दल इन निष्कर्षों के आधार पर संवेदनशील इलाकों में और अधिक सख्त कदम उठाने की वकालत कर सकता है.



















