25 साल की एक छात्रा किसी आंदोलन में उतरती है और कुछ ही दिनों में जेल की सलाखों के पीछे पहुंच जाती है, यह सुनने में जितना असामान्य लगता है, दिल्ली यूनिवर्सिटी की ग्रेजुएट आकृति चौधरी के साथ ठीक ऐसा ही हुआ। अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और बाद में उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA लगा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें करीब पांच महीने तक न्यायिक हिरासत में बिताने पड़े। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न सिर्फ उनकी हिरासत को गैरकानूनी करार देकर रद्द किया है, बल्कि उन्हें 5 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश भी दिया है, और सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह रकम सरकारी खजाने से नहीं बल्कि सीधे गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम की सैलरी से वसूली जाएगी।
गिरफ्तारी से पांच महीने की हिरासत तक
आकृति चौधरी की कहानी नोएडा में चल रहे वर्कर्स प्रोटेस्ट से जुड़ी है, जहां वे शामिल हुई थीं। प्रदर्शन के दौरान उन्हें हिरासत में लिया गया और उसके तुरंत बाद प्रशासन ने उन पर NSA जैसा सख्त कानून लगा दिया, जो आमतौर पर बेहद गंभीर मामलों में इस्तेमाल होता है। इस एक फैसले ने आकृति को करीब पांच महीने तक जेल में रहने पर मजबूर कर दिया। जब मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा तो दो जजों की बेंच ने पूरे मामले की बारीकी से जांच की और पाया कि जिस आधार पर उन्हें हिरासत में रखा गया था, उसमें ही गंभीर खामियां थीं। यही वजह रही कि कोर्ट ने NSA के तहत हुई उनकी हिरासत को पूरी तरह रद्द कर दिया।
डीएम का आचरण उपहास के योग्य: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बेहद तीखी टिप्पणी की। बेंच ने कहा कि डीएम मेधा रूपम का आचरण उपहास के योग्य था और ऐसा प्रतीत होता है कि एक शांतिपूर्ण छात्र कार्यकर्ता को जानबूझकर दूसरों के लिए उदाहरण बनाने की कोशिश की गई, ताकि भविष्य में कोई और प्रदर्शन करने की हिम्मत न करे। कोर्ट ने इसे सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सत्ता के दुरुपयोग जैसा माना। इसी वजह से अदालत ने आदेश दिया कि डीएम मेधा रूपम और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपनी नाराजगी उनके सेवा रिकॉर्ड में भी दर्ज की जाए, ताकि भविष्य में इसका हिसाब रखा जा सके।
मुआवजा सरकारी खजाने से नहीं, डीएम की सैलरी से
आमतौर पर ऐसे मामलों में मुआवजे की रकम सरकारी खजाने से चुकाई जाती है, लेकिन इस बार हाईकोर्ट ने अलग रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ आदेश दिया कि आकृति चौधरी को दिया जाने वाला 5 लाख रुपए का मुआवजा डीएम मेधा रूपम की निजी सैलरी से वसूला जाए। इस फैसले को अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि गलत फैसलों की कीमत अब सिर्फ सरकारी खजाना नहीं बल्कि जिम्मेदार अधिकारी को खुद भी चुकानी पड़ सकती है।
अफसरों की वफादारी संविधान के प्रति, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने IAS और IPS अधिकारियों को उनके संवैधानिक दायित्वों की याद भी दिलाई। कोर्ट ने कहा कि इन अधिकारियों की निष्ठा राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति होनी चाहिए। अदालत ने आगे यह भी चेताया कि अगर अधिकारी अपनी इस बुनियादी जिम्मेदारी को भूल गए, तो उत्तर प्रदेश एक 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' में तब्दील होने का जोखिम उठा सकता है। यह टिप्पणी दिखाती है कि कोर्ट ने इस मामले को सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी तक सीमित न रखकर, प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही से जोड़कर देखा।





















