विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक और साहसिक पर्यटन केंद्र ऋषिकेश में पर्यटन का नया सीजन शुरू होते ही चहल-पहल तो बढ़ गई है, लेकिन इसके साथ ही शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। गंगा नदी के पावन तटों, भव्य घाटों, व्यस्त बाजारों और मुख्य संपर्क मार्गों पर हर दिन हजारों सैलानियों की मौजूदगी देखी जा रही है। विशेष रूप से सप्ताहांत और राष्ट्रीय छुट्टियों के दौरान शहर में वाहनों का इतना भारी जमावड़ा हो जाता है कि महज कुछ सौ मीटर की दूरी तय करने में गाड़ियों को घंटों का समय लग जाता है। आम यात्रियों और पर्यटकों के लिए यह लंबा ट्रैफिक जाम भले ही कुछ देर की झुंझलाहट और असुविधा का कारण हो, लेकिन जब इसी जाम के बीच जीवन-रक्षक एम्बुलेंस फंस जाती है, तो यह स्थिति किसी भी मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। शहर की भौगोलिक बनावट और संकरी सड़कें इस संकट को और गंभीर बना रही हैं।
प्रमुख पर्यटक गलियारों पर बढ़ा वाहनों का दबाव
ऋषिकेश की वैश्विक पहचान देश और दुनिया भर से आने वाले पर्यटकों के केंद्र के रूप में है। हर साल लाखों श्रद्धालु और सैलानी यहां संध्याकालीन गंगा आरती के अलौकिक दृश्य, योग और ध्यान के शिविरों, रिवर राफ्टिंग तथा अन्य साहसिक गतिविधियों का आनंद लेने पहुंचते हैं। हालांकि, पर्यटन में होने वाली इस भारी वृद्धि का सीधा दुष्प्रभाव स्थानीय सड़कों पर पड़ता है। हरिद्वार की दिशा से ऋषिकेश में प्रवेश करने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य मार्गों से लेकर तपोवन, राम झूला, लक्ष्मण झूला क्षेत्र और आसपास के अंदरूनी इलाकों में वाहनों का तांता लगा रहता है। इन इलाकों में अधिकांश सड़कों की चौड़ाई काफी सीमित है। जब एक बार किसी संकरे मोड़ या चौराहे पर वाहनों की रफ्तार धीमी होती है, तो पीछे गाड़ियों की किलोमीटर लंबी कतारें लग जाती हैं। सड़क किनारे अव्यवस्थित और अवैध तरीके से खड़े किए गए वाहन इस समस्या को कई गुना बढ़ा देते हैं।
जाम के बीच जीवन-रक्षक सेवाओं की कड़ी परीक्षा
इस पूरी ट्रैफिक अव्यवस्था में सबसे दर्दनाक स्थिति तब बनती है जब किसी बेहद गंभीर मरीज को तुरंत उच्च चिकित्सा केंद्र या अस्पताल ले जाने की आवश्यकता होती है। आपातकालीन सायरन की लगातार उठती आवाज के बावजूद एम्बुलेंस चालकों को आगे बढ़ने के लिए रत्ती भर जगह नहीं मिल पाती। संकरे रास्तों पर जब दोनों तरफ दोपहिया और चार पहिया वाहन आड़े-तिरछे खड़े हों और बीच की लेन में गाड़ियां बंपर-टू-बंपर फंसी हों, तो एम्बुलेंस चालक के पास आगे निकलने का कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसी स्थिति में अस्पताल पहुंचने का महत्वपूर्ण समय लगातार बर्बाद होता रहता है, जिससे मरीज की जान जोखिम में पड़ जाती है।
चालकों की आपबीती: हर सेकंड होती है सांसें थामने वाली जद्दोजहद
स्थानीय एम्बुलेंस परिचालन से जुड़े चालक कुलदीप ने बताया कि सड़कों के संकरेपन और बेकाबू ट्रैफिक का सीधा प्रभाव आपातकालीन मरीजों की शारीरिक स्थिति पर पड़ता है। उन्होंने एक हालिया घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक महिला मरीज की शारीरिक स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई थी और उन्हें अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था। ऐसी चिकित्सीय स्थिति में मरीज को बिना एक पल गंवाए अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पहुंचाना अनिवार्य था। हालांकि, जैसे ही एम्बुलेंस मुख्य मार्ग पर पहुंची, सामने गाड़ियों का विशाल मजमा लगा हुआ था। सायरन बजाने के बाद भी भीड़ और बेतरतीब खड़े वाहनों की वजह से रास्ता नहीं बन पा रहा था। उस कठिन समय में मरीज की बिगड़ती हालत को देखकर चालक के ऊपर अत्यधिक मनोवैज्ञानिक दबाव बन गया था, क्योंकि ऐसे गंभीर मामलों में हर एक मिनट मरीज के जीवन के लिए निर्णायक होता है।
आपातकालीन गलियारे और सामाजिक जिम्मेदारी की जरूरत
एम्बुलेंस चालक ने इस बात पर जोर दिया कि ट्रैफिक जाम में फंसे होने के दौरान चालक के लिए केवल वाहन चलाना ही एकमात्र चुनौती नहीं होती, बल्कि रास्ते की इस देरी के कारण मरीज के साथ अनहोनी होने का डर लगातार सताता रहता है। उन्होंने कहा, "अत्यधिक ट्रैफिक की वजह से गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।" उन्होंने अपील की कि यदि मुख्य मार्गों पर आपातकालीन वाहनों के लिए एक समर्पित खाली लेन की व्यवस्था की जाए या सायरन की आवाज सुनते ही अन्य वाहन चालक तुरंत अपनी गाड़ियों को सड़क के एक तरफ दबा लें, तो कई कीमती जिंदगियों को समय रहते बचाया जा सकता है। ऋषिकेश में बढ़ता यह ट्रैफिक संकट स्पष्ट करता है कि पर्यटन प्रबंधन के साथ-साथ आपातकालीन सेवाओं के निर्बाध आवागमन के लिए ठोस प्रशासनिक कदम और नागरिक जिम्मेदारी दोनों अत्यंत आवश्यक हैं।




















