गंगा किनारे बसी धर्मनगरी हरिद्वार आस्था और मोक्ष की स्थली के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जहाँ प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान और दर्शन के लिए पहुँचते हैं। इसी पावन नगरी के साथ मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरक प्रसंग जुड़ा हुआ है। बापू अपने जीवनकाल में कई बार इस तीर्थ क्षेत्र में आए, लेकिन वर्ष 1915 के कुंभ मेले के दौरान हर की पौड़ी पर घटित घटनाक्रम ने उनके अंतर्मन को गहराई से झकझोर कर रख दिया था। इस यात्रा ने उनके रहन-सहन और जनमानस के प्रति दृष्टिकोण को एक नई दिशा दी।
गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर भारत भ्रमण और सेवा शिविर
वरिष्ठ पुरोहित और गांधीवादी अध्येता पंडित पुरुषोत्तम शर्मा के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटने के बाद बापू अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के परामर्श पर पूरे भारत को प्रत्यक्ष समझने के लिए भ्रमण पर निकले थे। देश की विविधता और आम जनजीवन का वास्तविक रूप देखने के लिए उन्होंने 1915 के हरिद्वार कुंभ में जाने का निश्चय किया। इस यात्रा के दौरान वे खुली बोगी वाली रेलगाड़ी से लगभग 50 से 60 स्वयंसेवकों के साथ हरिद्वार स्टेशन पहुँचे थे। उन्होंने नगर के श्रवणनाथ नगर स्थित एक बाग में अपना सेवा शिविर स्थापित किया और श्रद्धालुओं की सहायता में जुट गए।
हर की पौड़ी पर वस्त्र त्याग और सादगी का संकल्प
हरिद्वार प्रवास के दौरान हर की पौड़ी पर एक पुरोहित ने बापू से धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराया, किंतु अनुष्ठान पूर्ण होने के उपरांत उनसे दक्षिणा स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वहीं मेले परिसर में जब मोहनदास करमचंद गांधी ने आम निर्धन जनता और महिलाओं की अत्यंत विपन्न स्थिति तथा उनके फटेहाल वस्त्र देखे, तो उनका हृदय अत्यंत व्यथित हो उठा। जनसाधारण के इस कष्ट को देखकर उन्होंने हर की पौड़ी के पावन तट पर ही अपनी पैंट और शर्ट त्यागने का निर्णय लिया। इसके उपरांत उन्होंने केवल एक सादी धोती धारण कर ली, जो आगे चलकर जीवनपर्यंत उनकी विशिष्ट पहचान और पहनावा बन गई।
गुरुकुल कांगड़ी प्रवास और महात्मा गांधी मार्ग का इतिहास
हरिद्वार के साथ बापू का नाता केवल 1915 तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके बाद भी वे निरंतर यहाँ आते रहे। आर्य समाज के प्रमुख नेता और गुरुकुल के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद बापू को कांगड़ी स्थित गुरुकुल लेकर गए थे, जहाँ गांधी जी ने विद्यार्थियों से संवाद स्थापित किया। बाद में जब स्वामी श्रद्धानंद का देहावसान हुआ, तब बापू पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित करने हरिद्वार पहुँचे थे। अपनी यात्राओं के दौरान हरिद्वार रेलवे स्टेशन से मायापुर, शंकराचार्य चौक और कनखल होते हुए जिस मार्ग से बापू गुरुकुल गए थे, उसी ऐतिहासिक मार्ग को वर्तमान में महात्मा गांधी मार्ग के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार गंगा के पावन तट ने उनके सार्वजनिक जीवन और सादगी के संकल्प को आकार देने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।























