उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थल नैनीताल में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक श्री नन्दा देवी महोत्सव अपनी शानदार विरासत के 124 साल पूरे कर चुका है। यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह इस पहाड़ी क्षेत्र के बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का एक जीवंत दस्तावेज भी है। दशकों के इस लंबे सफर में मेले की सूरत काफी हद तक बदल चुकी है। जहां कभी स्थानीय जरूरत की चीजें बिकती थीं, वहां अब आधुनिक ब्रांड और मनोरंजन के साधन दिखाई देते हैं। हालांकि, इन बदलावों के बीच मां नन्दा-सुनन्दा के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था आज भी वैसी ही बनी हुई है।
मूर्तियों के निर्माण की पारंपरिक यात्रा
श्री राम सेवक सभा के वरिष्ठ पदाधिकारियों के अनुसार, इस ऐतिहासिक उत्सव के शुरुआती दिनों में मां नन्दा-सुनन्दा की मूर्तियों को बनाने के लिए चांदी का उपयोग किया जाता था। समय बीतने के साथ, इस परंपरा में प्रकृति का समावेश हुआ और केले के पेड़ों तथा अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से मूर्तियां बनाने की प्रथा शुरू हुई। आज भी इसी पारंपरिक पद्धति का कड़ाई से पालन किया जाता है। मूर्ति निर्माण के लिए केले के पेड़ों को लाने से लेकर उनके विसर्जन तक की प्रक्रिया बेहद पवित्र मानी जाती है और इसमें सभी पारंपरिक नियमों का पालन किया जाता है।
तिरपाल की झोपड़ियों से लेकर आधुनिक बाजारों तक
इस मेले का इतिहास केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराने समय में यह इस पूरे क्षेत्र का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। श्री राम सेवक सभा के मुकेश जोशी (मंटू), जो पिछले चार से पांच दशकों से इस मेले को बहुत करीब से देख रहे हैं, बताते हैं कि उनके बचपन के दिनों में मेले का नजारा आज से बिल्कुल अलग था। उस समय दुकानें बहुत सीमित होती थीं और उन्हें बांस, पॉलीथिन तथा तिरपाल की मदद से तैयार किया जाता था। इसके बाद के वर्षों में लोहे के टीन की चद्दरों से बनी दुकानों का दौर आया, जो कई दशकों तक मेले की मुख्य पहचान बनी रहीं।
घरेलू सामान की खरीदारी का सबसे बड़ा जरिया
मुकेश जोशी याद करते हैं कि पुराने समय में लोग इस मेले का इंतजार सालभर करते थे, क्योंकि यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं था बल्कि घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने का एकमात्र जरिया था। उस दौर में मेले में लोहे की कड़ाही, टब, विभिन्न प्रकार के बर्तन, खेती-किसानी के औजार और घरेलू उपयोग की अन्य वस्तुएं सबसे ज्यादा बिकती थीं। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए यह आवश्यक सामान खरीदने का सबसे बड़ा अवसर होता था। बच्चों के लिए गुब्बारे और लकड़ी व मिट्टी के साधारण खिलौने ही सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करते थे। लेकिन आज इस बाजार में कपड़ों, आधुनिक सजावटी सामानों, प्लास्टिक के खिलौनों और विविध व्यंजनों की भरमार है।
जर्मन हैंगर और कैनोपी से मिला नया लुक
मेले की व्यवस्था और उसके स्वरूप में आया सबसे बड़ा बदलाव हाल के वर्षों में देखा गया है। मुकेश जोशी के अनुसार, लंबे समय तक चलने वाली टीन की दुकानों की जगह अब आधुनिक कैनोपी और जर्मन हैंगर ने ले ली है। इस बदलाव का श्रेय तत्कालीन जिलाधिकारी वंदना सिंह को जाता है, जिनके प्रयासों से मेले के आयोजन को एक नया और बेहद व्यवस्थित ढांचा मिला। जर्मन हैंगर लगने से न केवल दुकानदारों को पहाड़ों में होने वाली अचानक बारिश से सुरक्षा मिली है, बल्कि मेले का पूरा लेआउट भी बेहद आकर्षक और अंतरराष्ट्रीय स्तर का दिखने लगा है। अब देश के कोने-कोने से बड़े कारोबारी अपनी दुकानों के साथ यहां पहुंचते हैं।
निबंधों में बसती थी मेले की यादें
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए मुकेश जोशी बताते हैं कि स्कूल के दिनों में बच्चों को नन्दा देवी महोत्सव पर निबंध लिखने के लिए कहा जाता था। इस गृहकार्य के माध्यम से बच्चे मेले के हर पहलू से गहराई से जुड़ते थे। उन्हें निबंध में यह लिखना होता था कि केले के पेड़ कैसे लाए जाते हैं, मूर्तियों का निर्माण कैसे होता है और मेले का सामाजिक महत्व क्या है। इस शैक्षणिक गतिविधि के कारण नई पीढ़ी अपनी समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं के प्रति जागरूक और उत्सुक बनी रहती थी।
बदलते वक्त के साथ बदलती पसंद
श्री राम सेवक सभा के एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. ललित तिवारी बताते हैं कि पिछले 124 वर्षों में मेले के व्यावसायिक स्वरूप में भारी बदलाव आया है। वे एक बेहद दिलचस्प उदाहरण साझा करते हुए बताते हैं कि लगभग 15 साल पहले मेले में लोहे के परात की भारी मांग हुआ करती थी। लोग दूर-दूर से विशेष रूप से लोहे के परात खरीदने यहां आते थे। यह दिखाता है कि किस तरह समय के साथ लोगों की प्राथमिकताएं और बाजार की मांग बदलती रही है। आज भले ही लोहे के बर्तनों की जगह आधुनिक घरेलू उपकरणों और फैशनेबल उत्पादों ने ले ली हो, लेकिन नन्दा देवी मेले का यह भव्य बाजार, रोमांचक झूले और स्वादिष्ट व्यंजनों के स्टॉल आज भी नैनीताल की सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।




















