उत्तराखंड के सरोवर नगरी नैनीताल में 124वें नंदा देवी महोत्सव के आयोजन से चारों ओर उल्लास और भक्ति का माहौल बना हुआ है। कुमाऊं क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजी जाने वाली मां नंदा और मां सुनंदा के प्रति स्थानीय निवासियों के साथ दूर-दराज के भक्तों में अटूट आस्था देखने को मिल रही है। पूरे उत्सव में शाम के समय आयोजित होने वाला एक खास अनुष्ठान हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। यह अनुष्ठान मां नंदा-सुनंदा की पंच आरती है, जिसके पीछे यह गहरी मान्यता जुड़ी है कि प्रकृति के पांच मूलभूत तत्वों के जरिए देवी की नजर उतारी जाती है।
संध्या काल में शुरू होता है भक्तिमय अनुष्ठान
श्री राम सेवक सभा के पदाधिकारी डॉ. ललित तिवारी ने इस परंपरा के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की है। उनके अनुसार, मां नंदा-सुनंदा की यह पंच आरती प्रतिदिन शाम को ठीक 6:30 बजे प्रारंभ की जाती है। यह पावन अनुष्ठान लगभग एक घंटे तक निरंतर चलता है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए बहुत बड़ी तादाद में श्रद्धालु जुटते हैं। जैसे ही आरती का समय निकट आता है, प्रसिद्ध मां नयना देवी मंदिर का समूचा प्रांगण भक्तों की उपस्थिति से पूरी तरह भर जाता है।
इस पूरे धार्मिक अनुष्ठान की औपचारिक शुरुआत पंडित भगवत जोशी द्वारा कराई जाती है। आरती के समय वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर दिखाई देता है। पारंपरिक पहाड़ी वाद्य यंत्रों और ढोल-नगाड़ों की गूंज, मंदिर के विशाल घंटों की कर्णप्रिय आवाज और भक्तों के मुख से निकलने वाले मां नंदा-सुनंदा के गगनभेदी जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठता है।
प्रकृति के पांच तत्वों और विशेष सामग्रियों से पूजा
पंच आरती के पीछे के गूढ़ रहस्य को स्पष्ट करते हुए डॉ. ललित तिवारी बताते हैं कि लोक मान्यताओं और धार्मिक विधान में यह भाव निहित है कि जिस प्रकार किसी साधारण जन को नजर लग सकती है, उसी प्रकार मां को भी नजर लग सकती है। इसी भाव के तहत पंच तत्वों का स्मरण करते हुए मां की नजर उतारने की अनूठी रीत निभाई जाती है। यह प्रक्रिया भक्तों की अगाध श्रद्धा और समर्पण की गहरी भावना को दर्शाती है।
इस आरती के विधान में प्रकृति के पांच प्रमुख तत्वों आकाश, वायु, अग्नि, जल और मिट्टी का विधिवत आह्वान और स्मरण किया जाता है। पूजा को संपन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार की पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग होता है। इसमें मिट्टी के दीये, पवित्र जल से भरे हुए शंख, नवीन वस्त्र तथा आम और पीपल के पत्तों का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता है। इन सभी सामग्रियों और विशिष्ट पूजा विधियों के सामंजस्य से मां की नजर उतारने की रस्म पूरी की जाती है।
सूर्यास्त के बाद दिनभर की नजर उतारने का विधान
धार्मिक नियमों के मुताबिक, सूर्यास्त के तुरंत बाद होने वाली इस पंच आरती का आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक माना गया है। ऐसी मान्यता है कि दिनभर के पूजन और दर्शन के बाद शाम के समय यह आरती कर दिनभर की नजर उतारी जाती है। यही कारण है कि श्रद्धालुओं के लिए संध्या का यह समय अत्यंत पावन और फलदायी माना जाता है। दर्शनार्थी मां के दर्शन कर आरती में हाथ जोड़कर शामिल होते हैं और अपने जीवन की सुख-शांति व मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।
डॉ. ललित तिवारी ने यह भी स्पष्ट किया कि मां नयना देवी मंदिर में मां नंदा-सुनंदा के दिव्य आगमन और उनकी विधिवत प्राण प्रतिष्ठा होने के समय से ही हर शाम पंच आरती करने की यह समृद्ध परंपरा निरंतर चली आ रही है। यह मात्र एक सामान्य दैनिक पूजा भर नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही लोक संस्कृति और आराध्या के प्रति निष्ठा का जीवंत रूप है।
दूर-दराज से उमड़ते हैं श्रद्धालु, बंटता है गेहूं का प्रसाद
नंदा देवी महोत्सव के दिनों में इस भव्य पंच आरती का अलौकिक दृश्य देखने के लिए केवल नैनीताल शहर के ही नहीं, बल्कि आसपास के पर्वतीय अंचलों और काफी दूर-दराज के इलाकों से भी भारी संख्या में भक्त पहुंच रहे हैं। जैसे-जैसे शाम ढलती है, मंदिर परिसर में लोगों की कतारें लंबी होने लगती हैं। आरती के आरंभ होते ही समूचा वातावरण जयकारों से गुंजायमान हो जाता है। उपस्थित जनसमूह पूर्ण श्रद्धाभाव से नंदा-सुनंदा के विग्रह के दर्शन करता है और सामूहिक पूजा में लीन हो जाता है।
आरती के विधिवत संपन्न होने के पश्चात सभी उपस्थित श्रद्धालुओं के मध्य प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस अवसर पर विशेष रूप से गेहूं से तैयार किया गया पारंपरिक प्रसाद भी भक्तों को बांटा जाता है, जिसे लोग अत्यंत श्रद्धा से ग्रहण करते हैं। सामूहिक आस्था, पर्वतीय संस्कृति और पंचतत्वों की अवधारणा का यह सुंदर मेल नंदा देवी महोत्सव को एक अद्वितीय पहचान प्रदान करता है, जिससे हर शाम पूरा नैनीताल पूरी तरह नंदामय नजर आता है।



















