उत्तराखंड की हसीन वादियां केवल अपने दिलकश नजारों के लिए ही मशहूर नहीं हैं, बल्कि यहां की पारंपारिक खेती और खानपान भी अपनी एक अलग धाक रखता है। पर्वतीय मिट्टी में पैदा होने वाली पहाड़ी मूली इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। मैदानी इलाकों में मिलने वाली सामान्य मूली की तुलना में इसका रंग, रूप, बनावट और स्वाद पूरी तरह जुदा होता है। सदियों से यह स्थानीय निवासियों की थाली का एक जरूरी हिस्सा रही है। इसे केवल कच्चे सलाद के तौर पर ही नहीं खाया जाता, बल्कि इसकी सूखी और रसेदार सब्जियां बनाने के साथ-साथ इसका चटपटा अचार भी तैयार किया जाता है।
दो प्रमुख आकारों में उपज और अनोखी बनावट
पर्वतीय क्षेत्रों के स्थानीय निवासियों के अनुसार, पहाड़ों में मुख्य रूप से दो किस्मों की मूली उगाई और देखी जाती है। इनमें एक किस्म बिल्कुल गोल आकार की होती है, जबकि दूसरी किस्म लंबी आकृति की होती है। इनका समग्र आकार और बनावट मैदानी मूली से काफी अलग महसूस होती है। ऊंचे पहाड़ों की आबोहवा, सर्द जलवायु और स्थानीय मिट्टी में तैयार होने के कारण इस मूली का रूप-रंग और बनावट काफी अनूठी हो जाती है। विभिन्न घाटियों और क्षेत्रों की ऊंचाई के अनुसार इसके रंग और आकार में भी हल्का अंतर देखने को मिल सकता है।
तीखा स्वाद, महक और पत्तों का अनूठा उपयोग
पहाड़ी मूली अपने तेज, तीखे जायके और अलग ही सौंधी खुशबू के लिए पहचानी जाती है। मैदानी मूली की तुलना में इसका स्वाद अधिक तीक्ष्ण होता है, जो पहाड़ी व्यंजनों में एक खास जान फूंक देता है। पारंपरिक खानपान में रुचि रखने वालों के लिए यह एक बेहद पसंदीदा सब्जी बन चुकी है। इस सब्जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका कोई भी हिस्सा व्यर्थ नहीं जाता। लोग सिर्फ इसकी जमीन के भीतर रहने वाली जड़ को ही नहीं खाते, बल्कि इसके कोमल तनों और गहरे हरे पत्तों का भी भरपूर इस्तेमाल करते हैं। पहाड़ों में इन पत्तों की स्वादिष्ट भुजिया सब्जी बनाई जाती है और इन्हें उड़द या अन्य दालों में मिलाकर भी पकाया जाता है। इस तरह एक ही पौधे के अलग-अलग अंगों से कई तरह के लजीज पकवान तैयार किए जाते हैं।
पोषक तत्वों का भंडार और चिकित्सीय सलाह
स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी पहाड़ी मूली को बहुत गुणकारी माना जाता है। नैनीताल स्थित बीडी पांडे जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. एमएस दुग्ताल का कहना है कि मूली में प्रचुर मात्रा में पानी और फाइबर मौजूद होता है। इसके साथ ही इसमें विटामिन सी, पोटेशियम, मैंगनीज और आयरन जैसे जरूरी खनिज तथा पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने और आंतों की सेहत को बेहतर बनाने में मददगार साबित होता है। डॉ. एमएस दुग्ताल के मुताबिक, मूली और इसके पत्तों को रोजमर्रा के संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पीलिया या लिवर संबंधी गंभीर बीमारियों में इसे किसी इलाज या दवा का विकल्प नहीं मानना चाहिए, हालांकि रोगी इसे अपने सामान्य आहार में शामिल कर सकते हैं।
उपलब्धता का समय और बाजार के भाव
नैनीताल के स्थानीय सब्जी विक्रेता दीपेश के अनुसार, पहाड़ी मूली पूरे साल बाजार में नहीं मिलती बल्कि इसका एक निश्चित सीजन होता है। पर्वतीय अंचलों में यह मुख्य रूप से जुलाई से अक्टूबर के महीनों के बीच उपलब्ध रहती है। इसके विपरीत, मैदानी इलाकों में मूली की आवक आमतौर पर सर्दियों के मौसम में सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। सीमित समय के लिए मिलने के कारण इसका स्वाद स्थानीय लोगों के साथ-साथ पहाड़ों की सैर पर आने वाले सैलानियों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। दीपेश ने बताया कि नैनीताल के बाजारों में यह मूली लगभग 50 से 60 रुपये के भाव पर मिल जाती है। मौसम की स्थिति, मूली के आकार और अलग-अलग स्थानीय मंडियों के अनुसार इसकी कीमतों में थोड़ा उतार-चढ़ाव आ सकता है। नैनीताल भ्रमण पर आने वाले कई पर्यटक वापसी के समय स्थानीय उपज और पारंपरिक सब्जियां अपने साथ घर ले जाना पसंद करते हैं, जिससे पहाड़ी मूली पर्यटकों के बीच भी अपनी खास पहचान बनाए हुए है।
नैनीताल के आसपास के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र
नैनीताल जनपद के इर्द-गिर्द कई ऐसे ग्रामीण इलाके हैं जो अपनी विशेष पहाड़ी मूली की खेती और बिक्री के लिए प्रसिद्ध हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार नयना गांव, बल्दियाखान और खुर्पाताल क्षेत्रों में उगने वाली मूली अपने लाजवाब स्वाद और खास आकार के लिए दूर-दूर तक जानी जाती है। इन इलाकों की खास भौगोलिक परिस्थितियां, ढलानों की मिट्टी और स्थानीय किसानों द्वारा अपनाए जाने वाले पारंपरिक कृषि तौर-तरीके ही इस मूली को मैदानी सब्जियों से बिल्कुल अलग और बेमिसाल स्वाद प्रदान करते हैं।























