नोएडा के बहुचर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले निठारी कांड के मुख्य आरोपियों में से एक रहे सुरेंद्र कोली ने उत्तराखंड के धार्मिक स्थल हरिद्वार में फंदा लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली है। पिछले साल नवंबर महीने में देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में बरी किए जाने के बाद, सुरेंद्र कोली अपनी पुरानी और भयावह पहचान को पीछे छोड़कर एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश कर रहा था। जेल की सलाखों से बाहर आने के बाद वह अपने अतीत के काले पन्नों और समाज में लगे कलंक को धोना चाहता था। इसी मंशा के साथ उसने हरिद्वार का रुख किया था, जहां उसने अपनी असली पहचान छुपाकर 'सदाराम' नाम रख लिया था और वहां अपना गुजारा करने के लिए एक छोटी सी चाय की दुकान खोल ली थी। वह गरीबी और मुफलिसी के दौर से गुजर रहा था और अगले वर्ष हरिद्वार में आयोजित होने वाले भव्य कुंभ मेले को देखते हुए उसने इस धंधे में पैर जमाने की सोची थी ताकि वह अच्छी कमाई कर सके और अपने जीवन को एक नई व सकारात्मक दिशा दे सके।
यह पूरी घटना हरिद्वार के भूपतवाला क्षेत्र की है, जहां उसने सड़क किनारे चाय का एक छोटा सा खोखा किराए पर लिया था। स्थानीय लोगों के अनुसार, बीते रविवार को ही बेहद सादगी और पूजा-पाठ के साथ इस चाय की टपरी का बाकायदा उद्घाटन किया गया था। इस नए काम की शुरुआत के अवसर पर उसने आसपास के दुकानदारों और वहां से गुजरने वाले राहगीरों को मिठाइयां भी बांटी थीं। उस दुकान पर चाय बनाने और बेचने वाले इस शख्स को हर कोई केवल 'सदाराम' के नाम से ही पहचानता था। वहां मौजूद किसी भी व्यक्ति ने अपने सपने में भी यह नहीं सोचा होगा कि जो व्यक्ति चेहरे पर एक शांत मुस्कान लिए चाय की केतली थामे नजर आ रहा है, वह वास्तव में देश को हिलाकर रख देने वाले निठारी कांड का मुख्य चेहरा सुरेंद्र कोली है।
पहचान छिपाकर शांत जीवन जीने की कोशिश
स्थानीय दुकानदारों और निवासियों ने बताया कि सदाराम बेहद शांत स्वभाव का था और वह अन्य लोगों से बहुत ज्यादा मेल-जोल नहीं रखता था। वह अधिकांश समय मौन रहता था और अपनी दुकान के काम में ही व्यस्त रहता था। दुकान बंद होने के बाद वह उसी छोटी सी टपरी के भीतर ही सो जाता था और वहीं अपना गुजारा करता था। हरिद्वार आने के शुरुआती दिनों में उसने सिडकुल औद्योगिक क्षेत्र की एक नामी हाउसिंग सोसायटी में सुरक्षा गार्ड के रूप में भी नौकरी की थी। हालांकि, सुरक्षा गार्ड की उस नौकरी में मिलने वाले मामूली वेतन से उसका गुजारा मुश्किल हो रहा था, जिसके कारण उसने कुछ समय बाद वह नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उसने भूपतवाला इलाके में चाय की दुकान खोलने का मन बनाया और इस जगह को किराए पर ले लिया। उसे उम्मीद थी कि कुंभ मेले के दौरान आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की वजह से उसकी चाय की दुकान अच्छी चलेगी और वह अपनी आर्थिक तंगी से उबर पाएगा।
मानसिक तनाव और बेबसी का आलम
सुरेंद्र कोली को हरिद्वार में यह दुकान दिलाने में धर्मेंद्र कौशिक नामक एक स्थानीय युवक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। धर्मेंद्र ने पुलिस और अन्य लोगों को बताया कि कोली अक्सर बेहद अकेला और गहरे मानसिक तनाव में दिखाई देता था। वह अपनी भावनाओं को किसी से साझा नहीं करता था। अपनी मौत से ठीक एक दिन पहले, शनिवार को जब धर्मेंद्र उससे मिलने उसकी दुकान पर पहुंचे, तो सुरेंद्र काफी परेशान और हताश नजर आ रहा था। जब धर्मेंद्र ने उसकी इस उदासी का कारण पूछा, तो उसने बेहद भावुक होकर बताया कि उसके बच्चे का जन्मदिन है। वह अपने बच्चे के पास जाना चाहता था, लेकिन उसकी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं कि वह वहां जा सके। अपनी इस लाचारी और बेबसी को बताते हुए उसकी आंखों में आंसू थे। कोली की यह दयनीय स्थिति देखकर धर्मेंद्र का दिल पसीज गया और उन्होंने उसे दो हजार रुपये की नकद आर्थिक मदद दी, ताकि वह इन पैसों को अपने बच्चे के पास भेज सके और उसका जन्मदिन मनवा सके। हालांकि, धर्मेंद्र को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनकी यह मदद आखिरी साबित होगी और अगली ही सुबह सुरेंद्र मौत को गले लगा लेगा।
पुलिसिया तफ्तीश और दोहरे पहचान पत्र का रहस्य
रविवार की अगली सुबह जब दुकान नहीं खुली, तो लोगों को संदेह हुआ। जब अंदर देखा गया तो सुरेंद्र कोली का शव फंदे से लटका हुआ पाया गया। घटना की खबर मिलते ही स्थानीय पुलिस तुरंत हरकत में आई और घटनास्थल पर पहुंच गई। हरिद्वार शहर के पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) शिशुपाल सिंह नेगी ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि शुरुआती जांच और घटनास्थल के हालातों को देखते हुए यह मामला पूरी तरह से आत्महत्या का लग रहा है। पुलिस ने जब पूरे खोखे की बारीकी से तलाशी ली, तो वहां से दो अलग-अलग पतों और नामों वाले पहचान पत्र बरामद हुए। इनमें से पहला पहचान पत्र नोएडा के पते का था, जिस पर सुरेंद्र कोली पुत्र शंकरराम लिखा हुआ था। वहीं दूसरा पहचान पत्र उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के पते का था, जिस पर सदाराम पुत्र शंकरराम अंकित था। इस दोहरी पहचान के खुलासे ने पुलिस को भी चौंका दिया। फिलहाल पुलिस इस बात की गहराई से तफ्तीश कर रही है कि आखिरकार किस गंभीर तनाव या वजह से सुरेंद्र कोली को यह आत्मघाती कदम उठाना पड़ा। क्या वह अपने अतीत के उस काले साये और समाज के मानसिक दबाव को सहन नहीं कर पाया, या फिर उसके पारिवारिक और आर्थिक संकट ने उसे इस कदर तोड़ दिया कि उसने मौत चुनना ही बेहतर समझा।



















