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उत्तराखंड के बागेश्वर में पीठ पर 60 किलो चारे का गट्ठर लादकर 15 किमी का पथरीला सफर तय करती हैं महिलाएंउत्तराखंड
15 अक्तू॰ 2026, 8:49 am (2 घंटे पहले)· 0

उत्तराखंड के बागेश्वर में पीठ पर 60 किलो चारे का गट्ठर लादकर 15 किमी का पथरीला सफर तय करती हैं महिलाएं

बागेश्वर और आसपास के कुमाऊं क्षेत्र में महिलाएं अपने मवेशियों के लिए जंगलों से भारी घास काटकर दुर्गम ढलानों से लाती हैं, जो स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ है।

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में ग्रामीण जनजीवन की दिनचर्या में महिलाओं का श्रम सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बागेश्वर जिले और उसके समीपवर्ती पहाड़ी इलाकों में घरेलू जिम्मेदारियों के अतिरिक्त कृषि तथा पशुपालन का पूरा दायित्व मुख्य रूप से महिलाओं के कंधों पर रहता है। इन दैनिक कार्यों में सबसे अधिक शारीरिक श्रम और जोखिम वाला काम मवेशियों के लिए वनों से हरा चारा काटकर घर तक पहुंचाना है। प्रतिदिन सुबह से ही महिलाएं उबड़-खाबड़ पगडंडियों, तीखी चढ़ाइयों और गहरी ढलानों से गुजरते हुए घास के विशाल गट्ठर अपनी पीठ पर लादकर मीलों का सफर पूरा करती हैं। बाहर से देखने पर यह दिनचर्या भले ही बेहद सामान्य लगे, परंतु इसके लिए असीम शारीरिक क्षमता, संतुलन और धैर्य की आवश्यकता होती है।

प्रतिदिन 50 से 60 किलोग्राम तक चारे का वजन उठाने की चुनौती

पहाड़ी अंचलों में पशुपालन अधिकांश परिवारों के जीविकोपार्जन का प्रमुख आधार है। स्थानीय जानकार प्रेमा कोरंगा के अनुसार, पर्वतीय गांवों में गाय, भैंस और बैलों के पोषण हेतु चारे का बंदोबस्त करना दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग माना जाता है। इस जरूरत को पूरा करने के लिए महिलाएं प्रातःकाल अथवा दोपहर के समय दूरदराज के जंगलों और खेतों के समीप घास काटने निकलती हैं। घंटों दरांती से घास काटकर उसका एक विशाल गट्ठर तैयार किया जाता है, जिसका वजन विभिन्न स्थानों पर 50 से 60 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।

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संतुलन और पारंपरिक तकनीक से संभालती हैं भारी गट्ठर

इस अत्यधिक भारी बोझ को लंबी दूरी तक ढोने के लिए ग्रामीण महिलाएं पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक तकनीकों का सहारा लेती हैं। घास की कटाई पूरी होने के पश्चात उसे व्यवस्थित रूप से एकत्र कर मजबूत रस्सियों से कसा जाता है। इसके उपरांत गट्ठर को पीठ पर टिकाया जाता है और रस्सी के सिरों को सिर के ऊपर से एक विशेष पट्टी (नामलो) की तरह सहारा देकर बांधा जाता है। सिर और माथे पर भार का यह वितरण चलते समय शरीर के गुरुत्व केंद्र को बनाए रखने में सहायता करता है, जिससे संकरी पगडंडियों पर संतुलन बिगड़ने की आशंका कम हो जाती है।

15 किलोमीटर तक की दूरी और मौसम की दोहरी मार

पर्वतीय बस्तियों के निकटवर्ती क्षेत्रों में पर्याप्त चारा उपलब्ध न होने के कारण महिलाओं को घास के मैदानों की खोज में अत्यंत दूर जाना पड़ता है। अनेक इलाकों में उपयुक्त चारागाह अथवा वन क्षेत्र घरों से 5 से 15 किलोमीटर तक की दूरी पर स्थित होते हैं। इतनी लंबी दूरी तय करते हुए महिलाओं को पथरीले मार्गों, तीखे मोड़ों, खड़ी चढ़ाई और फिसलन भरी उतराई से गुजरना पड़ता है। वर्षा ऋतु के दौरान रास्तों पर कीचड़ और फिसलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जबकि ग्रीष्मकाल में तेज धूप और पेयजल की किल्लत इस श्रमसाध्य यात्रा को और अधिक कष्टकारी बना देती है।

कुमाऊं की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाज की वास्तविक रीढ़

कुमाऊं अंचल की महिलाओं की यह दिनचर्या केवल घास लाने तक ही सीमित नहीं है। वे खेतों की जुताई-बुवाई, पशुओं की देखभाल, दूध दुहने, बच्चों के लालन-पालन से लेकर घर-गृहस्थी के सभी आवश्यक दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करती हैं। पहाड़ के ग्रामीण जीवन चक्र और आर्थिक स्थिरता को सुचारू बनाए रखने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रायः इस कठोर परिश्रम को पहाड़ी जीवन की एक सामान्य रीत मानकर अनदेखा कर दिया जाता है, जबकि इसके पीछे अत्यधिक समय, मानसिक दृढ़ता और असीम शारीरिक ऊर्जा समर्पित होती है। कुमाऊं की महिलाओं की यह कार्यप्रणाली दर्शाती है कि पर्वतीय क्षेत्रों का परिदृश्य जितना मनोरम दिखता है, वहां के जीवन को संचालित रखने में उतना ही कठिन संघर्ष समाहित है।

सवाल-जवाब

बागेश्वर में महिलाएं रोजाना घास लाने के लिए कितनी दूर जाती हैं?
महिलाएं घास और चारे की तलाश में अपने घरों से 5 से 15 किलोमीटर दूर घने जंगलों और घास के मैदानों तक जाती हैं।
महिलाएं पीठ पर कितना भारी घास का गट्ठर उठाती हैं?
स्थानीय जानकार प्रेमा कोरंगा के अनुसार, कुछ स्थानों पर महिलाएं अपनी पीठ पर 50 से 60 किलोग्राम तक भारी घास का गट्ठर लादकर लाती हैं।
घास के भारी गट्ठर को पहाड़ी रास्तों पर कैसे संभाला जाता है?
महिलाएं घास को रस्सी से कसकर बांधती हैं और रस्सी अथवा पट्टी का सहारा सिर पर लगाकर पीठ पर भार का संतुलन बनाती हैं।
घास लाते समय महिलाओं को किन मुख्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है?
उन्हें ऊबड़-खाबड़ और संकरे रास्तों के साथ बारिश में फिसलन तथा गर्मियों में पेयजल की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
पहाड़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की क्या भूमिका है?
महिलाएं चारे की व्यवस्था के साथ-साथ खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और घरेलू जिम्मेदारियों को संभालकर स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनती हैं।
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