उत्तराखंड के भीतर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) अभियान के दौरान सामने आए आवेदनों को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर सरगर्मी बढ़ गई है। राज्य निर्वाचन मशीनरी ने साफ किया है कि करीब 95 हजार मतदाताओं के रिकॉर्ड में डेटा विसंगतियां दर्ज होने और सत्यापन के दौरान जरूरी प्रमाण न मिलने के चलते सिस्टम के जरिए स्वतः फॉर्म 7 तैयार हुए। इस पूरी तकनीकी व प्रशासनिक कवायद को लेकर जहां निर्वाचन अधिकारी नियमों के पालन की बात कह रहे हैं, वहीं मुख्य विपक्षी दल ने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटने का आरोप लगाकर प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।
लॉजिकल विसंगतियों के चलते सिस्टम ने तैयार किए आवेदन
निर्वाचन तंत्र की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड में एसआईआर के तहत कुल 1.73 लाख फॉर्म 7 आवेदन दर्ज किए गए हैं। इन कुल आवेदनों में से 95 हजार से अधिक मामले ऐसे हैं जो किसी व्यक्ति द्वारा मैन्युअली दाखिल नहीं किए गए, बल्कि सॉफ्टवेयर आधारित सत्यापन व्यवस्था के जरिए खुद-ब-खुद यानी ऑटो-जेनरेट हुए हैं। इसका मतलब यह हुआ कि सूची से नाम हटाने या आपत्ति दर्ज कराने वाले कुल आवेदनों में 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी इसी ऑटोमेटेड व्यवस्था की रही है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने इस संबंध में बताया कि इन चिन्हित मामलों के चुनावी विवरण में लॉजिकल विसंगति दर्ज हुई थी। जब संबंधित नागरिकों को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया और वे प्रमाण नहीं दे सके, अथवा सुनवाई में खुद या परिवार का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा, तब संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ईआरओ) या सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (एईआरओ) ने ईसीआई-नेट (ECI-Net) पोर्टल पर उन्हें अयोग्य दर्ज किया। इस प्रविष्टि के बाद सिस्टम ने नियमों के अनुसार फॉर्म 7 तैयार कर नामों को सूची से विलोपन के लिए आगे बढ़ा दिया।
ड्राफ्ट सूची के बाद शुरू हुआ आपत्तियों का दौर
राज्य के भीतर मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की ड्राफ्ट सूची 14 जुलाई को सार्वजनिक की गई थी। इस ड्राफ्ट में संशोधन से पहले की सूची की तुलना में 8.26 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम घटे थे। मतदाताओं की यह कमी संशोधन से पहले दर्ज कुल वोटरों की संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक बैठती है।
जुलाई माह की 14 तारीख को जारी उस ड्राफ्ट सूची में करीब 79 लाख मतदाताओं के नाम शामिल किए गए थे। हालांकि, जब इस विस्तृत सूची का सॉफ्टवेयर से मिलान और परीक्षण हुआ, तो लगभग 19 लाख प्रविष्टियों में लॉजिकल विसंगतियां सामने आईं। इसके बाद चुनाव संचालन तंत्र ने सभी संबंधित लोगों को अपना पक्ष रखने और आवश्यक दस्तावेज दिखाने के लिए सुनवाई का औपचारिक अवसर प्रदान किया था। इन्हीं 19 लाख मामलों की जांच पड़ताल के क्रम में करीब 95 हजार लोग ऐसे पाए गए जो नोटिस और सुनवाई के बावजूद पात्रता साबित करने वाले साक्ष्य पेश नहीं कर सके, जिसके चलते सिस्टम ने उनके फॉर्म 7 जारी किए।
क्या होती है लॉजिकल विसंगति और यह कैसे काम करती है
अधिकारियों ने तकनीकी पहलू को स्पष्ट करते हुए बताया कि किसी रिकॉर्ड में लॉजिकल विसंगति सामने आने का सीधा मतलब यह नहीं होता कि वह वोटर अयोग्य हो गया है। दरअसल, यह भारतीय निर्वाचन आयोग के ईरोनेट (ERONET) सॉफ्टवेयर द्वारा तैयार किया जाने वाला एक स्वचालित अलर्ट होता है, जो डेटाबेस में किसी असमानता या असामान्य प्रविष्टि को पकड़ता है।
इस सॉफ्टवेयर अलर्ट के दायरे में कई तरह के विसंगतिपूर्ण मामले आ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, मतदाता के नाम की वर्तनी में भारी अंतर होना, सगे भाई-बहनों की दर्ज उम्र में असामान्य फर्क दिखना, माता-पिता और उनकी संतानों की आयु में तार्किक अंतर न होना, या फिर किसी परिवार में माता-पिता के छह से ज्यादा बच्चे दर्ज होना शामिल हैं। ऐसा कोई भी अलर्ट आने पर संबंधित व्यक्ति का नाम सीधे मतदाता सूची से नहीं काटा जाता, बल्कि व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि नागरिक को अपने अभिलेख दिखाकर स्थिति स्पष्ट करने का पूरा मौका मिले।
सुनवाई की कार्यप्रणाली और दस्तावेजों का परीक्षण
जब किसी मतदाता को लॉजिकल विसंगति के संबंध में नोटिस जारी कर सुनवाई के लिए बुलाया जाता है, तो उसे निर्धारित तारीख, समय और स्थल पर ईआरओ या एईआरओ के समक्ष उपस्थित होना होता है। नागरिक को अपनी व्यक्तिगत पहचान, स्थायी अथवा वर्तमान निवास, जन्मतिथि व आयु और मतदाता सूची से जुड़े तथ्यों की पुष्टि के लिए मान्य साक्ष्य पेश करने होते हैं।
इस प्रक्रिया में कौन से दस्तावेज देने होंगे, यह पूरी तरह से उस विसंगति के स्वरूप पर निर्भर करता है जो सॉफ्टवेयर ने पकड़ी थी। यदि सुनवाई कर रहे अधिकारी प्रस्तुत साक्ष्यों और दस्तावेजों से पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं, तो विसंगति का निपटारा वोटर के पक्ष में कर दिया जाता है और उसका नाम सूची में सुरक्षित बना रहता है। लेकिन यदि संबंधित व्यक्ति सुनवाई में उपस्थित नहीं होता, परिवार के किसी सदस्य को नहीं भेजता अथवा वैध प्रमाण पत्र नहीं दे पाता, तो अधिकारी उसे पोर्टल पर अयोग्य मार्क कर देते हैं, जिसके बाद स्वतः फॉर्म 7 तैयार होकर नाम विलोपन की दिशा में आगे बढ़ जाता है।
फॉर्म 7 को लेकर कांग्रेस की राजनीतिक चिंताएं
निर्वाचन नियमों में फॉर्म 7 का उपयोग किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने या उस पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए निर्धारित है। इसका कानूनी इस्तेमाल मृत व्यक्तियों के नाम हटाने, दोहरे पंजीकरण को दुरुस्त करने, स्थायी रूप से मकान या क्षेत्र बदलने अथवा वैधानिक अयोग्यता के मामलों में प्रविष्टियां हटाने के लिए किया जाता है। हालांकि, उत्तराखंड में एसआईआर के दौरान 1.73 लाख फॉर्म 7 आने के बाद विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे गंभीर राजनीतिक मुद्दा बना दिया है और आरोप लगाया है कि इन फॉर्मों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग कर नाम काटे जा रहे हैं। इसके विपरीत, मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और आयोग के तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक संचालित हो रही है।
उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और एआईसीसी सदस्य सूर्यकांत धस्माना ने विशेष रूप से ऊधम सिंह नगर जिले की पांच विधानसभा सीटों पर चिंता प्रकट की है। इन सीटों में किच्छा, गदरपुर, खटीमा, नानकमत्ता और रुद्रपुर शामिल हैं, जहां बड़ी संख्या में फॉर्म 7 दाखिल होने की बात कही गई है। कांग्रेस का आरोप है कि विशेष रूप से उन इलाकों में वोटरों के नाम हटाने के लिए इस व्यवस्था का गलत इस्तेमाल हो रहा है जिन्हें पार्टी अपना मजबूत जनाधार मानती है।
विधायक से जुड़ी आपत्ति पर उठे सवाल
हाल ही में मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मुलाकात करने पहुंचे कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के सदस्य और पूर्व विधायक मनोज रावत ने भी इस प्रक्रिया पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने दावा किया कि फॉर्म 7 के माध्यम से वास्तविक मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कांग्रेस विधायक फुरकान अहमद से जुड़ा एक मामला सामने रखा।
मनोज रावत के अनुसार, विधायक फुरकान अहमद के खिलाफ एक ऐसे व्यक्ति के नाम से आपत्ति दर्ज कराई गई थी, जिसका नाम खुद विधायक के नाम से काफी मिलता-जुलता था। बाद में संबंधित व्यक्ति ने औपचारिक हलफनामा पेश कर यह स्पष्ट किया कि उसने ऐसी कोई आपत्ति कभी दर्ज नहीं कराई थी। विपक्ष का कहना है कि इस तरह के फर्जीवाड़े की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि कोई भी वास्तविक मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न हो सके।



















