हिंदू परंपरा में पूर्वजों के प्रति सम्मान, आदर और कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व पितृ पक्ष 26 सितंबर से प्रारंभ होने जा रहा है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलने वाला यह 16 दिवसीय काल पितरों के तर्पण, पिंडदान और विशेष अनुष्ठानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन निर्धारित तिथियों पर विधिपूर्वक किए गए तर्पण से जीवन की कई बाधाएं शांत होती हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि के नए रास्ते खुलते हैं। हर साल श्रद्धालु इस कालखंड की प्रतीक्षा करते हैं ताकि वैदिक परंपराओं के अनुसार अपने कुल के पितरों की शांति के लिए अनुष्ठान संपन्न कर सकें। हालांकि, कई बार गंभीर आर्थिक विपन्नता के चलते लोगों के मन में यह चिंता उत्पन्न हो जाती है कि आवश्यक धन के बिना पितरों का कल्याण और उनकी संतुष्टि कैसे संभव हो पाएगी। धर्मग्रंथों में इस स्थिति के लिए भी बेहद सहज और प्रभावी समाधान दिए गए हैं।
श्रद्धा भाव से जुड़ा है श्राद्ध का मूल मर्म
हरिद्वार में स्थित सुप्रसिद्ध प्राचीन नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी के अनुसार, श्राद्ध का सीधा और गहरा संबंध श्रद्धा की पवित्रता से है। भौतिक संसाधनों या अत्यधिक व्यय की तुलना में हृदय की सच्ची भावना और आदर का भाव पितरों तक सीधे पहुंचता है, जिससे वे संतुष्ट होकर अपने लोक को प्रस्थान करते हैं। पंडित मनोज त्रिपाठी स्पष्ट करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा हो और उसके पास कर्मकांड अथवा भोज के आयोजन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन न हों, तो उसे बिल्कुल भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति अपने पितरों की निर्दिष्ट श्राद्ध तिथि पर केवल निर्मल एवं शुद्ध जल लेकर पूर्ण आदर के साथ अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए तर्पण कर सकता है।
जल में खड़े होकर हाथ उठाकर क्षमा प्रार्थना का विधान
आर्थिक तंगी से जूझ रहे जातकों के लिए एक अत्यंत सरल किंतु प्रभावी विधि का उल्लेख करते हुए मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि व्यक्ति किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने के दौरान जल के भीतर खड़े होकर यह अनुष्ठान कर सकता है। जातक को जल में खड़े रहकर भगवान सूर्य नारायण के सम्मुख दोनों हाथ ऊपर उठाने चाहिए और अत्यंत सच्चे मन तथा निष्कपट श्रद्धा से प्रार्थना करनी चाहिए।
प्रार्थना के दौरान व्यक्ति को यह भाव व्यक्त करना चाहिए कि हे सूर्य नारायण देव और हे मेरे पूज्य पूर्वजो, इस समय मेरे पास आपके श्राद्ध के निमित्त धन का अभाव है और मेरे पास केवल मेरी सच्ची श्रद्धा, कृतज्ञता और पवित्र भाव ही शेष हैं। कृपया मेरी इस विवशता को समझते हुए मेरे इन भावों को स्वीकार करें और मुझे क्षमा प्रदान करें। इसके साथ ही यह संकल्प दोहराएं कि आगामी समय में जब भी ईश्वर सामर्थ्य प्रदान करेगा, तब पूरे शास्त्रीय विधि-विधान के साथ श्राद्ध कर्म संपन्न किया जाएगा। धार्मिक आस्था के अनुसार, इस अत्यंत निष्कपट और भावपूर्ण प्रार्थना से पितर तृप्त होकर प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को इतना सामर्थ्य तथा आशीर्वाद प्रदान करते हैं कि वे अगली बार पूर्ण उल्लास और विधि के साथ श्राद्ध कर सकें।
घर पर श्राद्ध और दामाद व दौहित्र के सत्कार का महत्व
जो श्रद्धालु किसी कारणवश हरिद्वार के नारायणी शिला जैसे प्रमुख धार्मिक तीर्थस्थलों पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में असमर्थ हैं, वे अपने निवास स्थान पर ही श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण कर सकते हैं। मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि शास्त्रों में वर्णित आठ अत्यंत पवित्र घटकों में दौहित्र यानी बेटी का बेटा और दामाद प्रमुख स्थान रखते हैं। श्राद्ध की तिथि पर अपने दामाद अथवा दौहित्र को सम्मानपूर्वक घर आमंत्रित कर भोजन कराने और उनके दर्शन मात्र से पूर्वज अत्यंत प्रसन्न होते हैं तथा परिवार को अपनी पूर्ण कृपा व आशीर्वाद प्रदान करते हैं।





















