उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की आबोहवा में बॉडी आर्ट यानी टैटू बनवाने का चलन हर आयु वर्ग के नागरिकों में रफ्तार पकड़ रहा है। शरीर पर स्याही से आकृतियां उकेरना अब केवल दिखावे या स्टाइल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यक्तिगत भावनाओं, आत्मीय रिश्तों और धार्मिक निष्ठा को जाहिर करने का सशक्त जरिया बन गया है। शहर के लोग अपनी मां के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए उनका चेहरा या नाम त्वचा पर खुदवा रहे हैं, तो वहीं कई लोग अपने साथी के प्रति लगाव प्रकट करने हेतु कलात्मक रूप से नाम लिखवा रहे हैं। नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियों में अपने आदर्शों और प्रेरणास्रोत हस्तियों के हुबहू चेहरे बनवाने की ललक भी स्पष्ट रूप से नजर आ रही है।
देहरादून की टैटू कलाकार निशा गुरुंग के अनुसार इन दिनों चुने जा रहे पैटर्न्स में अंतरराष्ट्रीय संस्कृति और वैश्विक विरासत का गहरा प्रभाव दिखाई दे रहा है। दून के युवा विदेशी पारंपरिक कलाकृतियों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। इस क्रम में जापान की लोककथाओं और परंपराओं से जुड़े ड्रैगन तथा समुराई योद्धाओं के रेखाचित्रों को खूब तरजीह दी जा रही है। इसके साथ ही प्राचीन मिस्र की रहस्यमयी विरासत, जैसे कि ममीकरण और मृत्यु से जुड़े देवता एनुबिस और सुरक्षा का प्रतीक मानी जाने वाली आई ऑफ होरस की कलाकृतियों की भी खासी लोकप्रियता है। लोग इन सदियों पुराने सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से अपनी आंतरिक सोच और पहचान को बयां करने में गर्व महसूस कर रहे हैं।
पीढ़ी और उम्र के अनुसार पसंद का दायरा
निशा गुरुंग का मानना है कि शरीर पर कलाकृतियां तराशने की पसंद समय के चक्र के साथ बदलती रहती है और विभिन्न पीढ़ियों की रुचि में बड़ा अंतर दिखता है। युवा तबका मुख्य रूप से वन्यजीवों, जापानी एनिमे किरदारों और विभिन्न दार्शनिक चिन्हों को अपने शरीर पर सजाना पसंद करता है। दूसरी ओर युवतियों और महिलाओं में बारीक और मिनिमल डिजाइंस की मांग सबसे ज्यादा है, जिनमें छोटे फूल, तितलियां और महीन कलात्मक रेखाएं शामिल हैं। इसके अलावा परिवार या जीवनसाथी के नाम को अक्षरों में ढालने का चलन हर पीढ़ी में सदाबहार बना हुआ है। उम्र बढ़ने के साथ लोगों की प्राथमिकताओं में अध्यात्म और आस्था का पुट साफ तौर पर गहराने लगता है।
आध्यात्मिक आस्था और सेलिब्रिटी टैटू का असर
चालीस वर्ष की उम्र पार कर चुके लोग मुख्य रूप से धार्मिक विषयों पर आधारित टैटू बनवाना पसंद करते हैं। ऐसे ग्राहकों की पहली पसंद 'ॐ', भगवान शिव का त्रिशूल और विभिन्न देवी-देवताओं के विग्रह होते हैं, जिन्हें वे अपनी भक्ति और श्रद्धा के प्रतीक के तौर पर धारण करते हैं। इसके समानांतर, प्रसिद्ध गायकों, फिल्मी अभिनेताओं और हस्तियों के शरीर पर बने टैटू की नकल करने का क्रेज भी प्रशंसकों में बना रहता है, भले ही कई बार उन चिन्हों का गूढ़ अर्थ उन्हें स्पष्ट न हो।
स्थायी रूप देने से पहले अस्थाई टैटू का परीक्षण
त्वचा पर हमेशा रहने वाली स्याही लगवाने को लेकर कई लोग हिचकिचाते भी हैं, इसलिए वे शुरुआत में अस्थाई टैटू बनवाकर उसके प्रभाव और रूप को जांचते हैं। जब चर्चित फिल्म 'चक दे इंडिया' की अभिनेत्री चित्रांशी रावत देहरादून में शूटिंग के सिलसिले में पहुंची थीं, तब निशा गुरुंग ने उनके लिए भी एक अस्थाई टैटू तैयार किया था। जो शौकीन इस बात को लेकर असमंजस में होते हैं कि कोई डिजाइन उनके व्यक्तित्व पर कैसा दिखेगा, वे पहले कुछ दिनों तक अस्थाई रूप से उसे अपनाते हैं और पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही उसे स्थायी रूप में ढलवाते हैं।



















