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पश्चिम बंगाल वोटर लिस्ट विवाद: 37 लाख याचिकाओं के निपटारे में लगेंगे 12 साल, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बतायापश्चिम बंगाल
21 सित॰ 2026, 7:44 am (2 घंटे पहले)· 1

पश्चिम बंगाल वोटर लिस्ट विवाद: 37 लाख याचिकाओं के निपटारे में लगेंगे 12 साल, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन से बाहर हुए 37 लाख से अधिक नागरिकों की अपीलों को निपटाने में मौजूदा गति से 12 वर्ष से अधिक समय लग सकता है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा पेश कर ट्रिब्यूनल की संख्या बढ़ाने और घर से सुनवाई की अनुमति मांगी है।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत सूची से बाहर किए गए नागरिकों के मताधिकार पर गहरा संकट खड़ा हो गया है। सर्वोच्च अदालत के आदेश पर गठित अपीलीय ट्रिब्यूनल जिस धीमी गति से काम कर रहे हैं, उससे इन सभी लंबित मामलों के समाधान में एक दशक से भी लंबा वक्त लगने का अनुमान है। चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए नए हलफनामे के विवरण बताते हैं कि लाखों नागरिकों के नामों की समीक्षा पूरी होने में लगभग 12 साल 2 महीने तक का समय लग सकता है।

ट्रिब्यूनल के फैसलों की वर्तमान गति और लंबित मामलों का अंबार

आंकड़ों के अनुसार, अपीलीय निकायों ने अप्रैल के मध्य में अपनी कार्यवाही शुरू की थी। इसके बाद से बीते पांच महीनों की समयावधि में ये ट्रिब्यूनल कुल 1,26,194 आवेदनों का ही अंतिम समाधान निकाल पाए हैं। यदि शनिवार और रविवार जैसे सार्वजनिक अवकाशों को भी कार्य दिवस मानते हुए गणना की जाए, तब भी प्रत्येक महीने औसतन सिर्फ 25,238 मामलों में ही आदेश पारित हो सके हैं। दूसरी तरफ, 16 सितंबर तक ट्रिब्यूनल के समक्ष विचाराधीन अपीलों की कुल संख्या बढ़कर 37,05,235 तक पहुंच चुकी है।

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यदि यह मान भी लिया जाए कि अपीलीय ट्रिब्यूनल बिना किसी साप्ताहिक अवकाश के सप्ताह के सातों दिन लगातार काम जारी रखते हैं, तो भी 37 लाख से अधिक बकाया मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए 146 महीने दरकार होंगे। यह अवधि 12 साल और 2 महीने के बराबर बैठती है। इतनी लंबी प्रक्रिया का स्पष्ट अर्थ यह निकलता है कि जिन नागरिकों के नाम सूची से हटाए गए हैं, वे आगामी कई लोकसभा चुनावों, विधानसभा चुनावों तथा स्थानीय निकाय चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित रह सकते हैं।

क्षमता विस्तार के लिए चुनाव आयोग की सिफारिशें

मामलों के इस विशाल ढेर को देखते हुए चुनाव आयोग ने स्वीकार किया है कि वर्तमान प्रशासनिक ढांचा और कार्यरत ट्रिब्यूनलों की तादाद इतनी बड़ी चुनौती से निपटने के लिए बेहद कम है। इसी कारण आयोग ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि राज्य में अपीलीय ट्रिब्यूनलों की संख्या को वर्तमान 24 से बढ़ाकर 42 कर दिया जाए। यह संख्या राज्य में मौजूद कुल संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के बराबर होगी।

टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन द्वारा दायर याचिका के उत्तर में आयोग ने अदालत को सूचित किया कि ट्रिब्यूनलों की संख्या लगभग दोगुनी करने से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी लाई जा सकेगी। इसके साथ ही, न्यायिक अधिकारियों को अपने आवास से काम करने और डिजिटल माध्यम से सुनवाई आयोजित करने की छूट देने का आग्रह किया गया है, जिससे आवागमन में लगने वाला समय बचे और कार्य की गति बढ़ाई जा सके।

मानक संचालन प्रक्रिया और कानूनी ढांचा

ट्रिब्यूनल के कामकाज के तरीकों पर दाखिल एक अन्य अर्जी के जवाब में चुनाव आयोग ने स्थिति स्पष्ट की। आयोग ने रेखांकित किया कि इन ट्रिब्यूनलों का गठन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया गया था। इनकी कार्यप्रणाली को सुचारु रूप से चलाने के लिए बनाई गई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) एक विशेष समिति द्वारा तैयार की गई है, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश भी शामिल रहे हैं।

हलफनामे में आयोग ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहतें अपीलीय व्यवस्था के आंतरिक कामकाज, प्रक्रिया और नागरिकों की उस तक पहुंच से जुड़ी हैं। लिहाजा, यह पूरी व्यवस्था संबंधित अधिकारियों के लिए तय एसओपी के दायरे में आती है। आयोग के अनुसार, इन व्यवस्थाओं की व्यावहारिकता, संचालन के तौर-तरीके और उनके अमल से जुड़े निर्णय संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनलों के विवेक पर ही छोड़ दिए जाने चाहिए।

सवाल-जवाब

पश्चिम बंगाल में अपीलीय ट्रिब्यूनल के पास कुल कितने मामले लंबित हैं?
16 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार अपीलीय ट्रिब्यूनल के पास कुल 37,05,235 मामले लंबित हैं।
मौजूदा गति से इन सभी अपीलों के निपटारे में कितना समय लग सकता है?
यदि ट्रिब्यूनल हफ्ते के सातों दिन लगातार काम करें, तब भी सभी मामलों के निपटारे में करीब 146 महीने यानी 12 साल 2 महीने का समय लगेगा।
पिछले पांच महीनों में ट्रिब्यूनल ने कितनी अर्जियों का निपटारा किया है?
अप्रैल के मध्य से शुरू होकर पिछले पांच महीनों में ट्रिब्यूनल केवल 1,26,194 अर्जियों का निपटारा कर पाए हैं, जो औसतन प्रति माह 25,238 मामले हैं।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से ट्रिब्यूनल की संख्या बढ़ाने के संबंध में क्या अनुरोध किया है?
चुनाव आयोग ने राज्य में ट्रिब्यूनल की संख्या 24 से बढ़ाकर 42 करने की मांग की है, जो राज्य के संसदीय क्षेत्रों की संख्या के बराबर है।
क्या न्यायिक कर्मचारियों के लिए घर से काम करने की अनुमति मांगी गई है?
हाँ, चुनाव आयोग ने न्यायिक कर्मचारियों को घर से सुनवाई करने और काम करने की अनुमति मांगी है ताकि आने-जाने का समय बचाकर काम में तेजी लाई जा सके।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·56 मिनट पहले

यह रिपोर्ट लोकतांत्रिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों पर प्रशासनिक गतिरोध के गहरे प्रभाव को उजागर करती है। 12 साल का लंबा समय न केवल चुनाव आयोग की क्षमता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे संस्थागत विलंब नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित कर सकता है। हालांकि यह मामला राजनीति और चुनाव से जुड़ा है, लेकिन यह घटनाक्रम हमें शिक्षा और युवा नीति के उस पहलू से भी जोड़ता है जहाँ प्रशासनिक देरी से छात्रों और युवाओं के भविष्य व नीतिगत लाभों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ाने और डिजिटल सुनवाई जैसे प्रस्ताव यदि समय पर लागू नहीं हुए, तो यह संवैधानिक संकट को और गहरा सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

पश्चिम बंगाल की इस प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था में 37 लाख से अधिक मामलों के निपटारे में 12 साल का वक्त लगना केवल मताधिकार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश के वित्तीय और लोकतांत्रिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव डालता है। चुनावी प्रक्रिया में ऐसी लंबी अनिश्चितता राज्य के कॉर्पोरेट निवेश, बिज़नेस सेंटीमेंट और आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित कर सकती है क्योंकि निवेशक राजनीतिक और नीतिगत स्थिरता को प्राथमिकता देते हैं। यदि चुनाव आयोग की ट्रिब्यूनल बढ़ाने और डिजिटल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं होती है, तो यह लोकतांत्रिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर एक गंभीर संकट बन सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

पश्चिम बंगाल के इस मतदाता सूची विवाद में 37 लाख से अधिक नागरिकों का एक दशक से अधिक समय तक मताधिकार से वंचित रहना भारतीय संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती है। चुनाव आयोग द्वारा ट्रिब्यूनल की संख्या 24 से बढ़ाकर 42 करने और डिजिटल सुनवाई की अनुमति मांगने का प्रस्ताव यह स्पष्ट करता है कि मौजूदा प्रशासनिक ढांचा इस विशाल भार को उठाने में असमर्थ है। यदि सर्वोच्च न्यायालय इस पर शीघ्र और व्यावहारिक निर्णय नहीं लेता है, तो प्रशासनिक देरी का यह संकट संवैधानिक और न्यायिक प्रणाली की कार्यकुशलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह मामला प्रशासनिक और कानूनी तंत्र की गंभीर विफलता को उजागर करता है। जब किसी नागरिक को मताधिकार से 12 साल से अधिक समय तक वंचित रहना पड़े, तो यह केवल देरी नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। चुनाव आयोग द्वारा ट्रिब्यूनलों की संख्या 24 से 42 करने और वर्क-फ्रॉम-होम की मांग से स्पष्ट है कि मौजूदा बुनियादी ढांचा इस विशाल दबाव को झेलने में असमर्थ है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस पर तुरंत और कड़े निर्देश नहीं देता, तो आगामी चुनावों में लाखों वैध मतदाता अपने हकों की लड़ाई लड़ते रह जाएंगे और न्यायिक प्रक्रिया का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

यह प्रशासनिक चुनौती सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य चुनावी राज्यों में भी ऐसा ढांचागत संकट पैदा कर सकती है। यदि 37 लाख नागरिकों के मामलों का निपटारा इस गति से चला, तो चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। ट्रिब्यूनलों की संख्या 24 से 42 करने और डिजिटल सुनवाई जैसे उपाय केवल तात्कालिक राहत हैं। मूल समस्या यह है कि भारी संख्या में नाम हटने की इस प्रक्रिया में प्रशासनिक मशीनरी की शुरुआती तैयारी बेहद कमजोर रही, जिसका सीधा असर अब आम नागरिकों के मताधिकार पर पड़ रहा है।

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