पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत सूची से बाहर किए गए नागरिकों के मताधिकार पर गहरा संकट खड़ा हो गया है। सर्वोच्च अदालत के आदेश पर गठित अपीलीय ट्रिब्यूनल जिस धीमी गति से काम कर रहे हैं, उससे इन सभी लंबित मामलों के समाधान में एक दशक से भी लंबा वक्त लगने का अनुमान है। चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए नए हलफनामे के विवरण बताते हैं कि लाखों नागरिकों के नामों की समीक्षा पूरी होने में लगभग 12 साल 2 महीने तक का समय लग सकता है।
ट्रिब्यूनल के फैसलों की वर्तमान गति और लंबित मामलों का अंबार
आंकड़ों के अनुसार, अपीलीय निकायों ने अप्रैल के मध्य में अपनी कार्यवाही शुरू की थी। इसके बाद से बीते पांच महीनों की समयावधि में ये ट्रिब्यूनल कुल 1,26,194 आवेदनों का ही अंतिम समाधान निकाल पाए हैं। यदि शनिवार और रविवार जैसे सार्वजनिक अवकाशों को भी कार्य दिवस मानते हुए गणना की जाए, तब भी प्रत्येक महीने औसतन सिर्फ 25,238 मामलों में ही आदेश पारित हो सके हैं। दूसरी तरफ, 16 सितंबर तक ट्रिब्यूनल के समक्ष विचाराधीन अपीलों की कुल संख्या बढ़कर 37,05,235 तक पहुंच चुकी है।
यदि यह मान भी लिया जाए कि अपीलीय ट्रिब्यूनल बिना किसी साप्ताहिक अवकाश के सप्ताह के सातों दिन लगातार काम जारी रखते हैं, तो भी 37 लाख से अधिक बकाया मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए 146 महीने दरकार होंगे। यह अवधि 12 साल और 2 महीने के बराबर बैठती है। इतनी लंबी प्रक्रिया का स्पष्ट अर्थ यह निकलता है कि जिन नागरिकों के नाम सूची से हटाए गए हैं, वे आगामी कई लोकसभा चुनावों, विधानसभा चुनावों तथा स्थानीय निकाय चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित रह सकते हैं।
क्षमता विस्तार के लिए चुनाव आयोग की सिफारिशें
मामलों के इस विशाल ढेर को देखते हुए चुनाव आयोग ने स्वीकार किया है कि वर्तमान प्रशासनिक ढांचा और कार्यरत ट्रिब्यूनलों की तादाद इतनी बड़ी चुनौती से निपटने के लिए बेहद कम है। इसी कारण आयोग ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि राज्य में अपीलीय ट्रिब्यूनलों की संख्या को वर्तमान 24 से बढ़ाकर 42 कर दिया जाए। यह संख्या राज्य में मौजूद कुल संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के बराबर होगी।
टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन द्वारा दायर याचिका के उत्तर में आयोग ने अदालत को सूचित किया कि ट्रिब्यूनलों की संख्या लगभग दोगुनी करने से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी लाई जा सकेगी। इसके साथ ही, न्यायिक अधिकारियों को अपने आवास से काम करने और डिजिटल माध्यम से सुनवाई आयोजित करने की छूट देने का आग्रह किया गया है, जिससे आवागमन में लगने वाला समय बचे और कार्य की गति बढ़ाई जा सके।
मानक संचालन प्रक्रिया और कानूनी ढांचा
ट्रिब्यूनल के कामकाज के तरीकों पर दाखिल एक अन्य अर्जी के जवाब में चुनाव आयोग ने स्थिति स्पष्ट की। आयोग ने रेखांकित किया कि इन ट्रिब्यूनलों का गठन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया गया था। इनकी कार्यप्रणाली को सुचारु रूप से चलाने के लिए बनाई गई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) एक विशेष समिति द्वारा तैयार की गई है, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश भी शामिल रहे हैं।
हलफनामे में आयोग ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहतें अपीलीय व्यवस्था के आंतरिक कामकाज, प्रक्रिया और नागरिकों की उस तक पहुंच से जुड़ी हैं। लिहाजा, यह पूरी व्यवस्था संबंधित अधिकारियों के लिए तय एसओपी के दायरे में आती है। आयोग के अनुसार, इन व्यवस्थाओं की व्यावहारिकता, संचालन के तौर-तरीके और उनके अमल से जुड़े निर्णय संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनलों के विवेक पर ही छोड़ दिए जाने चाहिए।
























