अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में जारी उठापटक और समुद्री परिवहन लागत में हुई अप्रत्याशित बढ़ोतरी के कारण सार्वजनिक क्षेत्र की भारतीय तेल विपणन कंपनियों पर वित्तीय दबाव गहराता जा रहा है। घरेलू स्तर पर बेचे जाने वाले एलपीजी सिलेंडरों की वास्तविक खरीद व वितरण लागत और ग्राहकों से ली जाने वाली नियंत्रित कीमत के बीच का अंतर बढ़ता हुआ अब 62,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया है। जुलाई के महीने में यह घाटा करीब 59,000 करोड़ रुपये के स्तर पर दर्ज किया गया था। यद्यपि केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली वित्तीय राहत ने कंपनियों को कुछ सहारा दिया है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जारी खिंचाव की वजह से लागत और खुदरा बिक्री मूल्य के बीच की खाई लगातार चौड़ी बनी हुई है।
लागत और खुदरा कीमत का बढ़ता अंतर
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 'अंडर-रिकवरी' का सीधा अर्थ उस अंतर से है जो कंपनियों को रसोई गैस आयात करने, उसे बॉटलिंग संयंत्रों तक लाने और वितरकों के माध्यम से उपभोक्ताओं के घर तक पहुंचाने में आई कुल लागत और बाजार में मिलने वाली नियंत्रित कीमत के बीच बनता है। आम भारतीय परिवारों के घरेलू बजट पर इसका तत्काल सीधा असर इसलिए महसूस नहीं होता क्योंकि खुदरा स्तर पर 14.2 किलोग्राम वाले रसोई गैस सिलेंडरों के दाम सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप और क्षतिपूर्ति तंत्र से सुरक्षित रखे जाते हैं। इसके उलट, तेल कंपनियों के लिए यह अंतर उनकी बैलेंस शीट पर जमा होने वाला एक बड़ा वित्तीय बोझ बन जाता है, जिससे उनकी परिचालन क्षमता और मार्जिन प्रभावित होते हैं।
सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, 14.2 किलोग्राम के एक सामान्य घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर कंपनियों को मिलने वाली अंतर्निहित सब्सिडी का स्तर लगभग 210 रुपये बैठ रहा था। यह अंतर अगस्त महीने में दर्ज किए गए करीब 188 रुपये के घाटे से अधिक है। हालांकि, जून के दौरान यह वित्तीय खाई और भी अधिक खतरनाक स्तर पर पहुंच गई थी, जब कंपनियों को प्रति सिलेंडर करीब 721 रुपये तक का अंतर खुद वहन करना पड़ा था।
पश्चिम एशिया संकट और आपूर्ति मार्ग में अवरोध
रसोई गैस की अंतरराष्ट्रीय लागत में आए इस उछाल की जड़ें पश्चिम एशिया क्षेत्र में 28 फरवरी से शुरू हुए सैन्य संघर्ष और उसके कारण पैदा हुए भू-राजनीतिक संकट से जुड़ी हैं। ऐतिहासिक रूप से भारत अपनी रसोई गैस की कुल खपत का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता आया है, जिसमें खाड़ी देशों का योगदान केंद्रीय रहा है। इस व्यापार में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता रहा है, जहां से भारतीय बंदरगाहों तक नियमित टैंकर पहुंचते थे।
इस जलडमरूमध्य मार्ग पर आवाजाही बाधित होने के बाद खाड़ी के प्रमुख उत्पादक देशों से होने वाली आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई। जहाजों की अनुपलब्धता और सुरक्षा जोखिमों के चलते भारतीय खरीदारों को तत्काल नए और वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय स्रोतों की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आपूर्ति श्रृंखला टूटने के कारण न केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार से गैस खरीदने की स्पॉट लागत बढ़ी, बल्कि बहुत बड़े गैस वाहक जहाजों के दैनिक किराए और कार्गो बीमा दरों में भी तेज उछाल दर्ज किया गया।
आयात का नया नक्शा और अमेरिकी हिस्सेदारी
पारंपरिक खाड़ी मार्गों में पैदा हुए संकट के बीच भारत के एलपीजी आयात तंत्र में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिला है। जहाजों की आवाजाही को ट्रैक करने वाले केपलर के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियों ने संयुक्त राज्य अमेरिका से होने वाली अपनी खरीद में रिकॉर्ड तेजी दर्ज की है। अगस्त के दौरान भारत ने अमेरिका से करीब 0.62 मिलियन टन रसोई गैस का आयात किया, जबकि जुलाई के महीने में यह आंकड़ा करीब 0.89 मिलियन टन रहा था।
अगस्त के कुल आयातित माल में अमेरिकी कार्गो की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई, जिससे संयुक्त राज्य अमेरिका इस अवधि के दौरान भारत का सबसे बड़ा एकल रसोई गैस आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा। इसके विपरीत, पारंपरिक खाड़ी देशों से आने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट आई। अगस्त में संयुक्त अरब अमीरात से होने वाला आयात घटकर करीब 1.4 लाख टन रह गया, जबकि कतर से केवल 60,000 टन एलपीजी भारत पहुंची। सबसे नाटकीय बदलाव सऊदी अरब के मामले में देखा गया, जहां से केपलर के आंकड़ों के अनुसार जुलाई और अगस्त दोनों ही महीनों में भारत को बिल्कुल भी एलपीजी की आपूर्ति नहीं हुई। इसी अवधि में अल्जीरिया एक नए और भरोसेमंद सप्लायर के तौर पर उभरा, जिसने अगस्त में करीब 1.1 लाख टन रसोई गैस भेजकर भारत के तीसरे सबसे बड़े स्रोत का स्थान हासिल कर लिया।
सस्ती गैस पर भारी पड़ता लंबा समुद्री सफर
हालांकि अमेरिकी बाजार से एलपीजी खरीदने की रणनीति ने भारत को अपने ऊर्जा आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने में मदद दी, लेकिन भौगोलिक दूरी की वजह से कुल लागत समीकरण काफी जटिल हो गया। अमेरिकी एलपीजी का सौदा मोंट बेल्व्यू बेंचमार्क के आधार पर तय किया जाता है। अगस्त के दौरान यह बेंचमार्क लगभग 0.68 डॉलर प्रति गैलन रहा, जो मोटे तौर पर 360 डॉलर प्रति टन के बराबर था। यह आधार मूल्य सऊदी अरब के अनुबंध मूल्य की तुलना में काफी सस्ता था।
इस सस्ते मूल्य का पूरा लाभ भारतीय कंपनियों को नहीं मिल सका, क्योंकि अमेरिका के मैक्सिको की खाड़ी तट से भारत तक का समुद्री सफर खाड़ी देशों के मुकाबले कई गुना लंबा है। इक्विरस के सितंबर में जारी विश्लेषण के अनुसार, ह्यूस्टन से एशिया के बंदरगाहों तक वीएलजीसी जहाजों की माल ढुलाई दरें अगस्त में 300 डॉलर प्रति टन के स्तर को पार कर गईं। अप्रैल के महीने में यही भाड़ा 200 डॉलर प्रति टन से थोड़ा ऊपर चल रहा था। 100 डॉलर प्रति टन से अधिक की इस अतिरिक्त परिवहन लागत ने सस्ते अमेरिकी बेंचमार्क से मिलने वाले वित्तीय मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा खत्म कर दिया।
बढ़ती घरेलू मांग के बीच वित्तीय चुनौतियां
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और ढुलाई के संकट के बीच देश के भीतर रसोई गैस की खपत में कोई कमी नहीं आई है। अगस्त के महीने में भारत का कुल एलपीजी आयात मासिक आधार पर 14.5 प्रतिशत बढ़ा। इसी दौरान देश के भीतर कुल एलपीजी खपत बढ़कर करीब 2.42 मिलियन टन पर पहुंच गई, जो पिछले छह महीनों का उच्चतम स्तर है।
बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारतीय रिफाइनरियों और तेल विपणन कंपनियों को दूरदराज के देशों से अधिक कार्गो अनुबंधित करने पड़े हैं। आयात के इस बदलते मिश्रण ने यह साफ कर दिया है कि भले ही देश में रसोई गैस का प्रवाह बिना किसी बाधा के बनाए रखा गया हो, लेकिन ऊंची खरीद लागत और महंगे माल भाड़े ने सार्वजनिक तेल कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर गहरा दबाव बना दिया है। आने वाले महीनों में वैश्विक कीमतों का रुख और सरकारी क्षतिपूर्ति की मात्रा ही तय करेगी कि इन कंपनियों का वित्तीय बोझ किस हद तक संतुलित हो पाता है।





















