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नेपाल की तबाही देख सहम गए लोग? जानिए इतिहास की वे 5 सबसे खौफनाक बाढ़ें जिनमें उजड़ गईं थीं बस्तियांदुनिया
29 अग॰ 2026, 7:22 pm (40 मिनट पहले)· 3

नेपाल की तबाही देख सहम गए लोग? जानिए इतिहास की वे 5 सबसे खौफनाक बाढ़ें जिनमें उजड़ गईं थीं बस्तियां

नेपाल में हाल ही में आई भीषण फ्लैश फ्लड के बाद मानवीय संकट गहरा गया है, जहां सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि दुनिया ने इससे भी कई गुना अधिक भयावह जल प्रलय देखे हैं, जिनमें लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी।

पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में आई अचानक बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस आपदा में मरने वालों की संख्या बढ़कर कम से कम 626 तक जा पहुंची है, जबकि 4451 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया है। इस बचाव अभियान में 187 विदेशी नागरिक और 114 भारतीय भी शामिल हैं। हालांकि अभी भी 24 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं और बड़े पैमाने पर हुए नुकसान के कारण लाखों लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, जिससे स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज जल प्रलय

भले ही आज की आधुनिक तकनीक और मौसम विभाग की चेतावनियां कुछ हद तक बचाव में मदद करती हैं, लेकिन मानव इतिहास में ऐसे कई विनाशकारी दौर आए हैं जब पानी के आगे बड़े-बड़े शहर और बस्तियां नेस्तनाबूद हो गईं। कई मौकों पर नदियों ने अपने रास्ते अचानक बदल लिए तो कहीं बांध टूटने से ऐसा सैलाब आया कि लोगों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। इन भीषण आपदाओं में लाखों लोगों की जान चली गई और पानी उतरने के बाद शुरू हुआ असली संघर्ष, जिसमें भुखमरी, भयंकर बीमारियां और बड़े पैमाने पर विस्थापन ने बचा-कुचा जीवन भी तबाह कर दिया।

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चीन की 1931 की महाबाढ़

मानव इतिहास की सबसे घातक और विनाशकारी बाढ़ों की सूची में साल 1931 की चीन की बाढ़ का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। उस साल अगस्त के महीने में लगातार मूसलाधार बारिश हुई और पहाड़ों पर जमी बर्फ पिघलने लगी, जिससे यांग्त्से, हुआंग हे यानी येलो रिवर और हुआई नदी अपने चरम पर उफान पर आ गईं। इस जल प्रलय का दायरा इतना बड़ा था कि लगभग 88 हजार वर्ग किलोमीटर उपजाऊ जमीन पूरी तरह पानी में डूब गई, जबकि 21 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका आंशिक रूप से इसकी चपेट में आ गया। इस कुदरती कहर के चलते लगभग 8 करोड़ लोग बेघर हो गए और उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर होना पड़ा।

बीमारियों और अकाल का तांडव

इस आपदा में तबाही सिर्फ बाढ़ के आने तक सीमित नहीं रही, बल्कि पानी थमने के बाद असली संकट ने सिर उठाया। पानी की गुणवत्ता खराब होने से महामारियां फैल गईं और खाने-पीने के सामान की भारी किल्लत पैदा हो गई, जिससे हालात बद से बदतर हो गए। अलग-अलग ऐतिहासिक अनुमानों पर गौर करें तो इस पूरी आपदा में 8 लाख 50 हजार से लेकर 40 लाख तक लोगों की मौत होने का आकलन किया जाता है। हालांकि राष्ट्रीय बाढ़ राहत आयोग की 1931-32 की रिपोर्ट में केवल डूबने से मरने वालों का आंकड़ा लगभग 1 लाख 40 हजार बताया गया है, लेकिन यदि इसमें बीमारी और अकाल से दम तोड़ने वालों को भी जोड़ दिया जाए तो यह संख्या कई गुना अधिक बैठती है।

साल 1887 की येलो रिवर की तबाही

साल 1887 में चीन की प्रसिद्ध येलो रिवर ने एक बार फिर भयानक और विकराल रूप धारण कर लिया। सितंबर और अक्टूबर के महीनों में नदी के मजबूत तटबंध अचानक टूट गए, जिससे पानी अनियंत्रित होकर रिहायशी इलाकों में फैल गया। देखते ही देखते लगभग 50 हजार वर्ग किलोमीटर का पूरा क्षेत्र पानी में डूब गया। बाढ़ के बाद फैली भयंकर महामारियों और अकाल ने स्थिति को और अधिक असहनीय बना दिया। विभिन्न अनुमानों के अनुसार इस त्रासदी में 9 लाख से लेकर 20 लाख लोगों की जान चली गई। अमेरिकी राजनयिक दस्तावेजों में भी यह दर्ज है कि अकेले हेनान प्रांत में लगभग 25 लाख लोग प्रभावित हुए थे और भारी जनहानि हुई थी।

युद्ध की रणनीति और बाढ़ का मेल

साल 1938 की बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि यह इंसानी रणनीतियों और युद्ध के निर्णयों का भी एक घातक परिणाम थी। दूसरे चीन-जापान युद्ध के दौरान जब जापानी सेना तेजी से चीन के भीतर बढ़ती चली आ रही थी, तो उसे रोकने के लिए चीनी राष्ट्रीय सेना ने एक बेहद खतरनाक योजना बनाई। इसी रणनीति के तहत 9 जून 1938 को काईफेंग के पास येलो रिवर के तटबंधों को जानबूझकर तोड़ दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि पानी तीव्र गति से रिहायशी इलाकों में फैल गया और लगभग 54 हजार वर्ग किलोमीटर का भूभाग जलमग्न हो गया।

विस्थापन और अकाल का प्रकोप

तटबंध टूटने के बाद आई इस कृत्रिम और प्राकृतिक बाढ़ के पश्चात अकाल और भयंकर बीमारियों ने तबाही के दायरे को और अधिक विस्तृत कर दिया। अलग-अलग अनुमान बताते हैं कि इस दौरान 5 लाख से 9 लाख लोगों की मौत हुई, जबकि कुछ विशेष रिसर्च में मरने वालों की संख्या 8 लाख से भी अधिक बताई गई है। इस पूरी घटना के कारण लगभग 40 लाख लोग अपने घरों से उजड़कर विस्थापित होने को मजबूर हो गए। युद्ध की इस रणनीतिक भूल ने आम जनता की जिंदगी को नर्क बना दिया था।

बांगकियाओ बांध टूटने की त्रासदी

अगस्त 1975 में टाइफून नीना ने चीन के हेनान प्रांत में इतनी भीषण बारिश कराई कि वहां की स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो गई। इस मूसलाधार बारिश के दबाव को बांगकियाओ बांध और क्षेत्र के 61 अन्य बांध झेल नहीं पाए और वे टूट गए। इसके बाद जो पानी का रेला निकला, वह किसी सामान्य बाढ़ की तरह नहीं था। चश्मदीदों और रिपोर्टों के अनुसार बाढ़ की यह लहर लगभग 10 मीटर ऊंची और कई किलोमीटर चौड़ी थी, जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले गई।

भयंकर जानमाल का नुकसान

सरकारी आंकड़ों के दस्तावेजों में इस भीषण बाढ़ से सीधे तौर पर करीब 26 हजार मौतें दर्ज की गईं, जिसके बाद फैली महामारी और अकाल ने लगभग 1 लाख 45 हजार और लोगों की जिंदगी छीन ली। हालांकि कई गैर-सरकारी और स्वतंत्र अनुमानों में कुल मौतों का यह आंकड़ा 2 लाख 20 हजार से भी ज्यादा बताया गया है। इस आपदा का दायरा इतना व्यापक था कि इससे 1 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए। पानी के इस तांडव ने पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था और जनजीवन को हिलाकर रख दिया था।

इतिहास का सबसे घातक भोला चक्रवात

तारीख 12 से 13 नवंबर 1970 को बंगाल की खाड़ी में उठा भोला चक्रवात दुनिया के इतिहास में दर्ज सबसे घातक और विनाशकारी तूफानों में शुमार किया जाता है। इस भयंकर तूफान के साथ समुद्र से करीब 10.5 मीटर ऊंची तूफानी लहर उठी, जिसने तटीय इलाकों में कोहराम मचा दिया। उस समय बांग्लादेश का यह भूभाग पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था, और चक्रवात के कारण समुद्र का खारा पानी बड़े पैमाने पर रिहायशी बस्तियों में घुस गया।

अकल्पनीय तबाही और वैश्विक आंकड़े

पानी की इस विशाल और ताकतवर दीवार ने देखते ही देखते पूरे के पूरे गांवों और बस्तियों को अपनी आगोश में ले लिया। विश्व मौसम विज्ञान संगठन और एनओएए के आंकड़ों के अनुसार इस भयंकर आपदा में 3 लाख से 5 लाख के बीच लोगों की मौत हुई। इसी भयानक मानवीय क्षति के कारण भोला चक्रवात को आज भी दुनिया का सबसे घातक चक्रवात माना जाता है। इन तमाम ऐतिहासिक आपदाओं में एक बात समान रूप से देखने को मिलती है कि बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद भी खतरा टलता नहीं है, बल्कि उसके बाद शुरू होने वाली बीमारियां और संसाधनों की कमी और ज्यादा जानें लेती हैं।

सवाल-जवाब

नेपाल की हालिया फ्लैश फ्लड में अब तक कितने लोगों की मौत हुई है?
नेपाल में आई बाढ़ के कारण मरने वालों का आंकड़ा बढ़कर कम से कम 626 तक पहुंच गया है।
नेपाल की बाढ़ में कितने भारतीय नागरिकों को बचाया गया है?
बचाव अभियानों के दौरान कुल 114 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया है।
इतिहास की सबसे घातक बाढ़ किस वर्ष और कहां आई थी?
इतिहास की सबसे घातक बाढ़ अगस्त 1931 में चीन में आई थी, जिसमें यांग्त्से और येलो रिवर उफान पर थीं।
1931 की चीन की बाढ़ से लगभग कितने लोग प्रभावित हुए थे?
1931 की इस भीषण आपदा से करीब 8 करोड़ लोग बेघर हो गए थे।
1938 की चीन की बाढ़ का मुख्य कारण क्या था?
जापानी सेना को रोकने के लिए चीनी राष्ट्रीय सेना द्वारा काईफेंग के पास येलो रिवर के तटबंधों को तोड़ दिया गया था।
बांगकियाओ बांध किस वर्ष और कहां टूटा था?
अगस्त 1975 में टाइफून नीना के दौरान चीन के हेनान प्रांत में बांगकियाओ बांध टूट गया था।
भोला चक्रवात कब और कहां आया था?
भोला चक्रवात 12-13 नवंबर 1970 को बंगाल की खाड़ी में आया था, जिसने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान को प्रभावित किया था।
भोला चक्रवात में कितने लोगों की जान गई थी?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार भोला चक्रवात में 3 लाख से 5 लाख लोगों की मौत हुई थी।
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टिप्पणियाँ 2

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·26 मिनट पहले

नेपाल की वर्तमान फ्लैश फ्लड और ऐतिहासिक आपदाओं का यह तुलनात्मक अध्ययन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते भू-राजनीतिक और आर्थिक जोखिमों को रेखांकित करता है। जैसे-जैसे दक्षिण एशिया में चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं, क्षेत्रीय कूटनीति और आपदा प्रबंधन में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना अनिवार्य हो गया है। भविष्य में सीमा पार जल साझाकरण और पूर्व चेतावनी प्रणालियों पर अधिक क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी ताकि मानवीय संकट को टाला जा सके।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·25 मिनट पहले

युकी तनाका के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया में जलवायु आपदाएं अब केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि सीमा पार सुरक्षा संकट बन चुकी हैं। नेपाल की इस त्रासदी ने यह साबित कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में पारिस्थितिकीय असंतुलन से निचले इलाकों की अर्थव्यवस्था और स्थिरता खतरे में पड़ जाती है। ऐसे में, पारंपरिक सुरक्षा की परिभाषा से आगे बढ़कर क्षेत्रीय जल-नीति और साझा आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी, अन्यथा बढ़ती मौसमी चरमपंथ की घटनाएं इस क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने को दीर्घकालिक नुकसान पहुँचाती रहेंगी।

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