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हिमालयी राज्यों में मंडरा रहा नेपाल जैसी तबाही का खतरा, पर्यटकों के लिए चेतावनीदुनिया
29 अग॰ 2026, 6:03 pm (2 घंटे पहले)· 2

हिमालयी राज्यों में मंडरा रहा नेपाल जैसी तबाही का खतरा, पर्यटकों के लिए चेतावनी

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भीषण फ्लैश फ्लड के बाद भारत के पहाड़ी राज्यों में भी ग्लेशियल झीलों और बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। सरकार निगरानी और चेतावनी प्रणालियों को मजबूत कर रही है।

नेपाल और तिब्बत की सीमा के पास 26 अगस्त को आई भयानक फ्लैश फ्लड ने संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते जोखिम को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। जब ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर अलग हुआ, तो बर्फ, चट्टानों, मिट्टी और मलबे का एक तेज बहाव नदी घाटी में जा गिरा, जिससे एक बहुत बड़े इलाके में भारी तबाही मच गई। इस विनाशकारी घटना में 500 से अधिक लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।

इस दर्दनाक घटना ने एक बहुत बड़ा और प्रासंगिक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हिमालय के दूसरे हिस्सों में भी इस तरह की तबाही का खतरा बना हुआ है? विभिन्न रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि ऊंचाई वाले इलाकों में फैली ग्लेशियल झीलें किसी भी समय बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं। अगर इन प्राकृतिक झीलों के बांध टूट जाएं, तो अचानक से लाखों और करोड़ों लीटर पानी निचले इलाकों की तरफ बहकर आ सकता है, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के नाम से जाना जाता है।

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ग्लेशियल झीलें क्यों होती हैं अत्यधिक खतरनाक?

ग्लेशियरों के लगातार पिघलने और पीछे खिसकने की वजह से उनके आसपास पानी इकट्ठा होने लगता है जिससे झील का निर्माण होता है। कई बार इस झील के पानी को बर्फ, चट्टानों और मलबे से बने प्राकृतिक बांध रोककर रखते हैं। यदि भारी बारिश होती है, भूस्खलन होता है या फिर बर्फ और चट्टान के गिरने से यह प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट जाता है, तो पानी बेहद खतरनाक गति से नीचे की ओर दौड़ पड़ता है।

इस जलप्रलय के साथ केवल पानी ही नहीं बहता है, बल्कि अपने रास्ते में यह भयंकर चट्टानों, मिट्टी, बर्फ और भारी मलबे को भी अपने साथ समेट ले जाता है। यही मुख्य वजह है कि GLOF कुछ ही पलों में सड़कों, पुलों, मकानों, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और अन्य बुनियादी संरचनाओं को पूरी तरह तहस-नहस कर सकता है। नेपाल की हालिया आपदा में भी ग्लेशियर के ढहने के बाद आइस-रॉक एवलॉन्च और डेब्रीज फ्लो ने नदी में मलबे का अंबार लगा दिया था।

भारत के हिमालयी इलाकों में भी मंडरा रहा खतरा

भारत का पूरा हिमालयी क्षेत्र भी इस कुदरती खतरे से पूरी तरह अछूता नहीं है। देश की सरकार इन ग्लेशियल झीलों पर लगातार नजर बनाए हुए है और सबसे अधिक जोखिम वाली झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। वर्ष 2026 में केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम की अत्यधिक जोखिम वाली झीलों के वास्ते शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की बात कही गई है।

उत्तराखंड राज्य में बहुत बड़ी संख्या में ग्लेशियर और ऊंचाई पर स्थित झीलें मौजूद हैं। यहां की गहरी घाटियों से कई प्रमुख नदियां बहती हैं और इनके तटों पर तमाम सड़कें, गांव, प्रसिद्ध धार्मिक स्थल और पर्यटन केंद्र भी बसे हुए हैं। ऐसे हालात में ऊपरी इलाकों से अचानक पानी या मलबा आने पर नीचे के क्षेत्रों तक इसका असर पहुंचने में बिल्कुल भी वक्त नहीं लगता है।

हिमाचल और सिक्किम में बढ़ाई गई निगरानी

हिमाचल प्रदेश में भी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी की जा रही है। सरकारी स्तर पर हुए अध्ययनों में चंद्रा बेसिन की समुद्र टापू और गेपांग गाथ जैसी ग्लेशियल झीलों के क्षेत्रफल और उनमें पानी की मात्रा में लंबे समय में विस्तार दर्ज किया गया है। इन्हें संभावित GLOF जोखिम के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील माना जाता है। इसके अलावा राज्य में बादल फटने, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाएं भी गहरी चिंता का विषय बनी हुई हैं। केंद्र सरकार ने 2026 में हिमाचल में बढ़ती चरम मौसम की घटनाओं का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए विशेषज्ञों की एक विशेष टीम का गठन किया है।

सिक्किम में ग्लेशियल झीलों का खतरा विशेष रूप से बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। साल 2023 में साउथ ल्होनाक झील से जुड़ी GLOF की घटना ने पूरे राज्य में भारी तबाही मचाई थी। इस दुखद हादसे के बाद झीलों की मॉनिटरिंग और जोखिम के आकलन पर प्रशासन का ध्यान काफी बढ़ गया है। 2026 में सिक्किम को ग्लेशियल झीलों की प्रोफाइलिंग और रिस्क असेसमेंट के वास्ते स्वदेशी मॉनिटरिंग टेक्नोलॉजी भी मुहैया कराई गई है।

लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश की स्थिति

लद्दाख क्षेत्र में भी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की संख्या काफी ज्यादा अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार यहां 0.25 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 3,219 ग्लेशियल झीलों की एक पूरी इन्वेंट्री तैयार की जा चुकी है। इनमें से सबसे अधिक जोखिम वाली झीलों के लिए GLOF रिस्क मॉडलिंग का काम भी पूरा कर लिया गया है। पूर्वी हिमालय की गोद में बसा अरुणाचल प्रदेश भी इस संभावित जोखिम की निगरानी वाले राज्यों में प्रमुखता से शामिल है। यहां ग्लेशियल झीलों, बर्फ और पहाड़ी ढलानों में होने वाले बदलावों पर पैनी नजर रखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि किसी भी ऊंचे स्थान पर घटने वाली घटना का प्रभाव नीचे की नदी घाटियों तक बहुत तेजी से पहुंचता है।

सिर्फ झीलें ही नहीं, ग्लेशियर का टूटना भी है बड़ा खतरा

नेपाल की इस दुर्घटना से एक और अहम बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि हिमालयी क्षेत्र में खतरा केवल GLOF तक ही सीमित नहीं है। ग्लेशियर के बड़े हिस्से का टूटकर नीचे गिरना, आइस-रॉक एवलॉन्च, भूस्खलन और अचानक होने वाला डेब्रीज फ्लो भी बहुत बड़ी फ्लैश फ्लड पैदा कर सकता है। इसका मतलब यह है कि किसी क्षेत्र में यदि कोई ग्लेशियल झील मौजूद न भी हो, तब भी वहां अचानक ग्लेशियर या पहाड़ी ढलान के ढह जाने से भयंकर बाढ़ आ सकती है। यही वजह है कि हिमालयी आपदा प्रबंधन के लिए केवल झीलों की निगरानी काफी नहीं है, बल्कि ग्लेशियरों, ढलानों, नदियों और मौसम की एक साथ निगरानी रखना बेहद जरूरी हो जाता है।

पर्यटकों के लिए क्यों बढ़ जाता है पहाड़ों में जोखिम?

हिमालयी पर्यटन स्थलों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां की सड़कें, होटल, कैंपिंग साइट्स और ट्रेकिंग रूट्स अक्सर किसी नदी या नाले के बहुत अधिक करीब होते हैं। सुंदर दृश्यों का आनंद लेने के लिए कई बार पर्यटक ऐसे स्थानों पर ठहर जाते हैं, जहां अचानक पानी आ जाने की स्थिति में बाहर निकलने के रास्ते बेहद सीमित होते हैं। नेपाल की वर्तमान आपदा में भी तमाम विदेशी सैलानी और तीर्थयात्री इसकी चपेट में आए हैं। प्रभावित क्षेत्र प्रसिद्ध कैलाश-मानसरोवर यात्रा के रास्तों से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ था।

इसलिए पहाड़ों में सफर करते समय केवल मौसम के साफ होने को देखकर खुद को पूरी तरह सुरक्षित मान लेना बिल्कुल सही नहीं है। स्थानीय प्रशासन की चेतावनियों, मौसम विभाग के ताजा अलर्ट और नदी के जलस्तर में होने वाले अचानक बदलावों को हमेशा पूरी गंभीरता के साथ लेना चाहिए। नदी के किनारे कैंपिंग करना, सोना या खराब मौसम के दौरान किसी पुल या संकरी घाटी में रुकना खतरे को कई गुना बढ़ा सकता है।

क्या इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं को रोका जा सकता है?

किसी भी ग्लेशियर या प्राकृतिक झील को अपनी इच्छा से पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है, लेकिन आधुनिक तकनीकों की मदद से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन, सेंसर्स, कैमरों और नदी के जलस्तर को मापने वाले उपकरणों का लगातार उपयोग किया जा रहा है ताकि समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

सवाल-जवाब

नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल ही में कौन सी आपदा आई थी?
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक भीषण फ्लैश फ्लड आई थी जिसमें 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग लापता हैं।
GLOF का क्या अर्थ होता है?
GLOF का पूरा नाम Glacial Lake Outburst Flood है, जिसका अर्थ ग्लेशियल झील के प्राकृतिक बांध टूटने से अचानक आने वाली बाढ़ है।
भारत सरकार किन राज्यों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी कर रही है?
सरकार जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम की उच्च जोखिम वाली झीलों की निगरानी कर रही है।
सिक्किम में कौन सी झील से जुड़ी बड़ी घटना हुई थी?
सिक्किम में 2023 के दौरान साउथ ल्होनाक झील से जुड़ी GLOF की घटना ने राज्य में भारी तबाही मचाई थी।
लद्दाख में कितनी ग्लेशियल झीलों की इन्वेंट्री तैयार की गई है?
लद्दाख में 0.25 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 3,219 ग्लेशियल झीलों की इन्वेंट्री तैयार की गई है।
पर्यटकों को पहाड़ों में घूमते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
पर्यटकों को नदी के किनारे कैंपिंग करने से बचना चाहिए और स्थानीय प्रशासन व मौसम विभाग की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए।
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टिप्पणियाँ 2

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·1 घंटे पहले

नेपाल सीमा की यह आपदा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक बुनियादी ढांचा विकास अब सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय संकट का रूप ले रहे हैं। अमेरिका और अन्य वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी यह एक चेतावनी है कि आपदा प्रबंधन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में भारी निवेश केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए अनिवार्य है।

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·1 घंटे पहले

कार्लोस मेंडोज़ा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना होगा कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में भू-राजनीतिक सीमाएँ जलवायु आपदाओं को नहीं मानतीं। नेपाल और तिब्बत सीमा पर हुई घटना ने यह साबित कर दिया है कि ट्रांस-बाउंड्री नदियाँ और साझा ग्लेशियल खतरे पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करते हैं। जब तक भारत और पाकिस्तान सहित पूरा उपमहाद्वीप जलवायु लचीलेपन और डेटा-साझाकरण के लिए एक क्षेत्रीय दृष्टिकोण नहीं अपनाता, तब तक बुनियादी ढांचे और मानवीय जीवन पर मंडराता यह संकट और गहराता जाएगा, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।

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